रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २५ )
मगध तथा कैकय देश की राजाओं की कौशल्या, सुमित्रा तथा कैकेयी नामक कन्याओं ने राजा दशरथ को पति के रूप में प्राप्त किया । दशरथ अपनी तीनों रानियों के साथ ऐसा जान पड़ते थे मानों पृथ्वी पर राज्य करने के निमित्त स्वयं इन्द्र ही प्रभाव, उत्साह एवं मन्त्र नामकी अपनी तीन शक्तियों के साथ अवतार लेकर चले आये हैं ।
दशरथ ने युद्ध में इन्द्र की सहायता करके अपने बाणों से उनके शत्रुओं का नाश करके देवताओं की स्त्रियों का डर दूर कर दिया था । उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ किये थे । अकेले रथ पर चढ़कर युद्ध करने वाले इन्द्र से भी आगे चलने वाले दशरथने सूर्य पर छाई हुई युद्ध की धूल राक्षसों के खून से सींच-सींचकर दबा दी थी । राजा दशरथ की चतुर नीति से उनके पास बहुत सा धन इकट्ठा हो गया था जिससे वे अपनी प्रजाओं का उपकार करते थे । विष्णु के समान पराक्रमी, वसन्त के समान प्रसन्न और कामदेव के समान सुन्दर राजा दशरथ ने भी सुन्दरी स्त्रियों के साथ उस प्रफुल्लित वसन्त ऋतु का आनन्द लिया और फिर भी उनके मन में आखेट खेलने की इच्छा होने लगी । मन्त्रियों से सलाह कर वे आखेट के लिए निकल पड़े । जंगल में हरिण, सूकर, भैंसे, बारहसिंहे, सिंह, हाथियां, चामर मृग आदि का शिकार खेलते हुए एक दिन रुरु मृग का पीछा करते हुए अपने साथियों से दूर भटक गये घोड़े पर चढ़े हुए तमसा नदी के तट पर निकल गये जहां तपस्वियों के आश्रम बने हुए थे । वहां जल में कोई घड़ा भर रहा था । राजा ने समझा कि यह कोई हाथी है । उन्होंने उसका लक्ष्य कर झट शब्दवेधी बाण चला दिया । सहसा कोई चिल्ला उठा हाय पिता ? यह सुनकर राजा का माथा ठनका । पास जाकर देखा कि बाणों से विधा घड़े पर झुका हुआ कोई मुनिकुमार है । जब राजा ने उसके वंश का परिचय पूछा तो उसने बताया कि मेरे पिता वैश्य हैं और माता शूद्रा है । मुझे मेरे अन्धे माता-पिता के पास पहुँचा दो । तब राजा ने उसे उनके पास पहुँचा कर बताया कि भूल से मैंने आपके पुत्र पर बाण चला दिया है । यह सुनते ही वे रोने लगे और उन्होंने कहा पुत्र की छाती से बाण निकाल दो । बाण निकालते ही उसके प्राणपखेरू निकल गये । इस पर उसने शाप दिया कि जाओ तुम भी हमारे समान बुढ़ापे में पुत्र शोक से प्राण छोड़ोगे । राजा ने कहा कि मैं आपके शाप को वरदान समझता हूँ क्योंकि इसी बहाने मुझे पुत्र का मुख तो देखने का सौभाग्य प्राप्त होगा । यह कहकर राजा ने पुनः कहा—मैं तो आपके बध के