भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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( २६ )

योग्य हूँ मेरे लिए क्या आज्ञा है ? यह सुनकर मुनि ने कहा—हम और हमारी स्त्री अब अपने पुत्र के साथ ही मर जायेंगे । अतः आप हमारे लिए ईंधन और आग जुटा दो । राजा ने तत्काल इंधन और आग जुटा दी । वे चिता में साथ मर कर स्वर्ग सिधार गये और राजा अपने पाप से अधीर होकर मुनि का शाप लेकर अपने घर लौटे ।

दशम सर्ग

इन्द्र के समान तेजस्वी राजा दशरथ को पृथ्वी पर राज्य करते-करते लग-भग दश हजार वर्ष बीत गये । उन्हें कोई सन्तान नहीं हुई । तब ऋष्यशृंग की प्रधानता में ऋषियों ने सन्तान के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ कराना प्रारम्भ किया । उसी समय रावण के अत्याचार से घबड़ाकर देवता लोग ज्यों ही क्षीरसागर में विष्णु की शरण में गये त्यों ही भगवान् विष्णु योग निद्रा से उठ गये । शेष-शायी विष्णु के चरण कमल को लक्ष्मी जी गोद में लेकर पलोट रही हैं, सुनहले वस्त्र पहने हुए विष्णु के वक्षःस्थल पर कौस्तुभ मणि चमक रहा था भृगुलता-श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित था । गरुड़ जी बड़ी नम्रता से हाथ जोड़े खड़े थे । देवताओं ने भगवान् विष्णु को प्रणाम कर उनकी स्तुति करने लगे और कहे कि जैसे समुद्र के रत्न, सूर्य की किरणें नहीं गिनी जा सकतीं और पृथ्वी के कण नहीं गिने जा सकते वैसे ही स्तुति करके आपका चरित वर्णन नहीं किया जा सकता है । प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने उनसे कुशल प्रश्न पूछा, जिसके उत्तर में देवताओं ने कहा—आज कल ऐसे राक्षस उत्पन्न हो गये हैं जिन्होंने संसार की मर्यादा भंग कर सर्वत्र हाहाकार मचा दिया है । यह सुनकर वे बोले देवताओं ! जैसे संसार के जीवों को सत्त्व, रज तथा तम दबा देता है वैसे ही आपके तेज और बल को रावण दबा बैठा है इसलिए रावण को मिटा देना मेरा और इन्द्र का काम है, आग की सहायता के लिए वायु से कहना नहीं पड़ता है, वह तो स्वयं आग को उभाड़ देता है । शिवजी को प्रसन्न करने के लिए रावण ने अपने नव शिर काटकर चढ़ा दिया है । मालूम पड़ता है कि दशवाँ शिर मेरे चक्र से कटने के लिए रख छोड़ा है । ब्रह्माजी ने जो वरदान दे दिया है उसी से मैं उसका चढ़ाना उसी प्रकार सहता हूँ जैसे अपने ऊपर चढ़ते हुए सांप को चन्दन वृक्ष सह लेता है । जब ब्रह्माजी उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए तब उसने यही वर