रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २७ )
मांगा कि मैं देवताओं के हाथ से न मारा जा सकूँ' । अतः मैं राजा दशरथ के यहाँ जन्म लेकर अपने बाणों से उसके शिरों को काटकर पृथ्वी को भेंट कर दूँगा। अब आप लोग निडर होकर अपने-अपने विमानों पर चढ़कर आकाश घूमिए तथा रावण के पुष्पक विमान का डर छोड़ दीजिए। जैसे सूखे खेत पर पानी बरसाकर बादल निकल जाय वैसे ही मधुर वचन से देवताओं को तृप्त कर वे अन्तर्धान हो गये।
इधर ज्यों ही राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त हुआ त्यों ही यज्ञाग्नि से एक पुरुष प्रगट हुआ, जिसके हाथ में खीर भरा हुआ सोने का कटोरा था। जैसे इन्द्र ने समुद्र से निकले हुए अमृत कलश को अपने हाथ में ले लिया वैसे ही राजा दशरथ ने भी उस दिव्य पुरुष के हाथ से वह खीर ले ली। खीर के रूप में विष्णु से पाये हुए क्षीर को राजा दशरथ ने कौशल्या और कैकेयी में बराबर बाँट दिया। पुनः उन दोनों ने अपनी-अपनी खीर का आधा-आधा भाग अपनी प्रिय सपत्नी सुमित्रा को दे दिया। परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने लोक कल्याण के लिए विष्णु के अंश से भरे गर्भ को धारण किया। यद्यपि विष्णु का एक ही रूप है पर जैसे निर्मल जल में चन्द्रमा के अनेक प्रतिबिम्ब पड़ जाते हैं वैसे ही वे तीनों रानियों के गर्भो में अलग-अलग निवास कर रहे थे। कौशल्या जी के गर्भ से श्री राम, कैकेयी के गर्भ से भरत जी तथा सुमित्रा जी के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न दो जोड़वा पुत्र उत्पन्न हुए । अयोध्या में बड़ा हर्ष और उत्सव मनाया गया तथा लङ्का में रावण के मुकुटमणि पृथ्वी पर गिर पड़े, मानो राक्षसों की लक्ष्मी की आंसू ढुलक रही हो। जातकर्म आदि संस्कार हो जाने पर चारो राजकुमार बढ़ने लगे, चारो कुमार मानो धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के रूप माने जाने लगे और गुरु वसिष्ठजी के घर ब्रह्मचर्य पूर्वक विद्याभ्यास करने लगे।
एकादश सर्ग
एक दिन विश्वामित्रजी राजा दशरथ के पास आये और उन्होंने कहा कि मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए राम को मेरे साथ भेज दीजिए। यद्यपि दशरथ ने राम-लक्ष्मण को बड़ी तपस्या से वृद्धावस्था में पाया था पर ऋषि के प्रभाव से प्रभावित हो तत्काल उन्होंने राम-लक्ष्मण को उनके साथ भेज दिया। पिता की आज्ञा से दोनों राजकुमार धनुष लेकर विश्वामित्रजी के पीछे चल दिये। राजा