रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
पृष्ठ 467, कुल 735 में से
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रघुवंशमहाकाव्ये
प्राणैर्दशरथप्रीतेर्दशरथसख्यस्यानृणमृणैविमुक्तं गृध्रं जटायुषमपश्यतां दृष्टवन्तौ । दृष्टेलंङि रूपम् ।
भावार्थ — सीता को ढूंढ़ते हुए राम और लक्ष्मण दोनों ने मार्गमें देखा कि जटायु के पङ्ख कट गये थे और उसके प्राण कण्ठ तक आ गये थे, किन्तु उसने सीता के हरण करने वाले रावण से लड़कर अपने मित्र दशरथ का ऋण चुका दिया था ॥ ५४ ॥
स रावणहृतां ताभ्यां वचसाऽऽचष्ट मैथिलीम् ।
आत्मनः सुमहत्कर्म व्रणैरावेद्य संस्थितः ॥ ५५ ॥
अन्वयः— सः रावणहृतां मैथिलीं ताभ्यां वचसा आचष्ट, आत्मनः सुमहत्कार्यं व्रणैः आवेद्य संस्थितः ।
स इति । स जटायू रावणहृतां मैथिलीं ताभ्यां रामलक्ष्मणाभ्याम् । 'क्रिया-ग्रहणमपि कर्तव्यम्' इति संप्रदानत्वाच्चतुर्थी । वचसा वाग्वृत्त्याऽऽचष्ट । आत्मनः सुमहत्कर्म युद्धरूपं व्रणैरावेद्य संस्थितो मृतः ।
भावार्थ— वह जटायु राम और लक्ष्मण से बतलाया कि सीता को रावण हर ले गया है । जटायु के घावों को देखकर ही यह स्पष्ट हो रहा था कि वह कितने जी जान से रावण से लड़ा था । बाद उसका प्राण निकल गया ॥५५॥
तयोस्तस्मिन्नवीभूतपितृव्यापत्तिशोकयोः ।
पितरीवाग्निसंस्कारात्पराववृतिरे क्रियाः ॥ ५६ ॥
अन्वयः— नवीभूतपितृव्यापत्तिशोकयोः तयोः तस्मिन् पितरि इव अग्निसंस्कारात् पराः क्रिया ववृतिरे ।
तयोरिति । व्यापत्तिर्मरणं नवीभूतः पितृव्यापत्तिशोको पितुः दशरथस्य व्यापत्तेर्मरणस्य शोकः ययोस्तौ तयो राघवयोस्तस्मिन्गृध्रे पितरीवाग्निसंस्कारादग्निसंस्कारमारभ्य परा उत्तराः क्रिया ववृतिरेऽवर्तन्त । तस्य पितृवदौर्ध्वदैहिकं चक्रतुरित्यर्थः ।
भावार्थ — जटायु केवल इतना ही कहकर चल बसा । उसके मरने से राम और लक्ष्मण को उतना ही शोक हुआ जितना उन्हें अपने पिता दशरथ के मरने पर हुआ था । बाद उसका विधिवत् दाह संस्कार करके पिता के समान ही उन्होंने उसका प्रेत आदि कर्म किया ॥ ५६ ॥
वधनिर्धूतशापस्य कबन्धस्योपदेशतः ।
मुमुक्षुः सख्यं रामस्य समानव्यसने हरौ ॥ ५७ ॥