भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 488, कुल 735 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 488

त्रयोदशः सर्गः ४२६

पुत्रों ने उस घोड़े की खोज करने के लिए सारी पृथ्वी को खोद डाला। उसी से यह समुद्र इतना बड़ा लम्बा चौड़ा बन गया। इसलिए यह हम लोगों का पूज्य है॥ ३ ॥

गर्भं दधत्यर्कमरीचयोऽस्माद्वृद्धिमत्राश्नुवते वसूनि ।
अविन्धनं वह्निमसो बिभर्ति प्रह्लादनं ज्योतिरजन्यनेन ॥ ४ ॥

अन्वयः—अर्कमरीचयः अस्मात् गर्भं दधति अत्र वसूनि वृद्धिं अश्नुवते, असौ अविन्धनं वह्निं बिभर्ति, अनेन प्रह्लादनं ज्योतिः अजनि ।

गर्भमिति । अर्कमरीचयोऽस्मादब्धेः अपादानात् गर्भमम्मयं दधति वृष्ट्यर्थमित्यर्थः । अयमर्थो दशमसर्गे 'ताभिर्गर्भः०' इत्यत्र स्पष्टीकृतः । अयं लोकोपकारीति भावः । अत्राब्धौ वसूनि धनानि । 'धने रत्ने वसुस्मृतम्' इति विश्वः । विवृद्धिमश्नुवते प्राप्नुवन्ति संपन्नानित्यर्थः । असावाप इन्धनं दाह्यं यस्य तद्दाहकं वह्निं बिभर्ति । अपकारेऽप्याश्रितं न त्यजतीति भावः । अनेन प्रह्लादनमाह्लादकं ज्योतिश्चन्द्रोऽजनि जनितम् । जनेर्ण्यन्तात्कर्मणि लुङ् । सौम्य इति भावः ।

भाषार्थ—यह समुद्र बड़े काम का है, देखो इसी में से सूर्य की किरणें जल खींचती हैं और पृथ्वी पर बरसती हैं। इसी में रत्न बढ़ते हैं, यह अपनी गोद में अपने शत्रु बड़वानल को भी पालता है और इसी ने संसार के प्रकाशक चन्द्रमा को उत्पन्न किया है ॥ ४ ॥

तां तामवस्थां प्रतिपद्यमानं स्थितं दश व्याप्य दिशो महिम्ना ।
विष्णोरिवास्यानवधारणीयमीदृक्तया रूपमियत्तया वा ॥ ५ ॥

अन्वयः—तां तां अवस्थां प्रतिपद्यमानं महिम्ना दश दिशः व्याप्य स्थितम् विष्णो इव अस्य रूपं ईदृक्तया इयत्तया वा अनवधारणीयम् । ( अस्ति ) ।

तां तामिति । तां तामनेकाम् "नित्यवीप्सयोः" इति वीप्सायां द्विरुक्तिः । अवस्थामक्षोभाद्यवस्थां विष्णुपक्षे सत्त्वाद्यवस्थां प्रतिपद्यमानं भजमानं महिम्ना दश दिशो व्याप्य स्थितं विष्णोरिवास्य रत्नाकरस्य रूपं स्वरूपमुक्तरीत्या बहुप्रकारत्वाद्व्यापकत्वाच्चेदृक्तयेयत्तया वा प्रकारतः परिमाणतश्चानवधारणीयं दुर्निरूपम् ।

भाषार्थ—यह समुद्र सदा अपना रूप भी बदलता रहता है और यह इतना बड़ा है कि दशों दिशाओं में दूर तक फैला हुआ है, इसलिए जिस प्रकार भगवान विष्णु के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि वे ऐसे और इतने बड़े हैं उसी प्रकार इसके विषय में भी यह नहीं कहा जा सकता है कि ऐसा और इतना बड़ा है ॥ ५ ॥