भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 495, कुल 735 में से

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४३६ रघुवंशमहाकाव्ये

उद्भिन्नविद्युद्वलयो घनस्ते द्वितीयमाभरणं वलयमामुखतीवार्पयतीव । चण्डी- त्वनेन कोपनशीलत्वाद्व्रीतः क्षिप्रं त्वां मुञ्चति मेघ इति व्यज्यते । भाषार्थ—हे प्रिये ! जब तुम कौतुकवश अपना हाथ विमान से बाहर निकालकर बादल को छूने लगती हो तो तुम्हारे मणिबन्ध चारों तरफ बिजली चमक जाती है उस समय मालूम पड़ता है मानो वह बादल तुम्हारे हाथ में दूसरा कंकण पहना रहा हो ॥ २१ ॥

अमी जनस्थानमपोढविघ्नं मत्वा समारब्धनवोटजानि । अभ्यासते चीरभृतो यथास्वं चिरोज्झितान्याश्रममण्डलानि ॥ २२ ॥

अन्वयः—अमी चीरभृतः जनस्थानम् अपोढविघ्नं मत्वा समारब्धनवोटजानि चिरोज्झितानि आश्रममण्डलानि यथास्वं अभ्यासते ।

अमी इति । अमी चीरभृतस्तापसा जनस्थानमपोढविघ्नमपास्यविघ्नं मत्वा ज्ञात्वा समारब्धा नवा उटजाः पर्णशाला येषु तानि । 'पर्णशालोटजोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । चिरोज्झितानि राक्षसभयादित्यर्थः । आश्रममण्डलान्याश्रमविभागान्य- थास्वं स्वमनतिक्रम्याभ्यासतेऽधितिष्ठन्ति ।

भावार्थ—प्रिये ! नीचे देखो, रावण आदि राक्षसों के मारे जाने की बात सुनकर वल्कल वस्त्रधारी इन तपस्वियों ने समझ लिया है कि अब कोई बाधा नहीं रही । इसलिए ये नई २ कुटिया बनाकर बहुत दिनों से छोड़े हुए आश्रमों में पहले के समान निवास कर रहे हैं ॥ २२ ॥

सैषा स्थली यत्र विचिन्वता त्वां भ्रष्टं मया नूपुरमेकमुर्व्याम् । अदृश्यत त्वच्चरणारविन्दविश्लेषदुःखादिव बद्धमौनम् ॥ २३ ॥

अन्वयः—सा स्थली एषा यत्र त्वां विचिन्वता मया त्वच्चरणारविन्द- विश्लेषदुःखात् इव बद्धमौनं उर्व्यां भ्रष्टं एकं नूपुरं अदृश्यत ।

सैषेति । सा पूर्वानुभूता स्थल्येषा दृश्यत इत्यर्थः । यत्र स्थल्यां त्वां विचिन्वताऽन्विष्यता मया । त्वच्चरणारविन्देन यो विश्लेषो वियोगस्तेन यद् दुःखं तस्मादिव बद्धमौनं निःशब्दम् । उर्व्यां भ्रष्टमेकं नूपुरं मञ्जीरः । 'मञ्जीरो -नूपुरोऽस्त्रियाम्' इत्यमरः । अदृश्यत दृष्टम् । हेतूत्प्रेक्षा ।

भावार्थ—प्रिये ! देखो यह वही स्थान है जहाँ तुम्हें ढूंढते हुए मैंने पृथ्वी पर पड़े हुए तुम्हारे एक नूपुर को पाया था । गुप-चुप पड़ा हुआ वह ऐसा मालूम पड़ रहा था मानों तुम्हारे चरणों से अलग हो जाने के दुःख से चुप हो गया हो ॥ २३ ॥

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