रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३५ )
स्वीकार कर लक्ष्मण के चले जाने पर दुःख के कारण सीताजी कुररी पक्षी के समान विलाप करने लगीं, जिससे समस्त वन करुणामय हो गया—मोरों ने नाचना, पेड़ों ने पुष्प तथा हरिणों ने चबाते हुए कुशों को छोड़ दिया। कुश और समिधा को लेने के लिए आश्रम से बाहर निकले हुए वाल्मीकि मुनि रोने के शब्द का अनुसरण करते हुए सीता के सम्मुख आकर बोले—वत्से ! मैं समाधिदृष्टि से जानता हूँ कि राम ने मिथ्यावाद से क्षुब्ध होकर तुम्हारा त्याग किया है। तुम दूसरे देश में स्थित पिता के ही घर में आ गयी हो, तुम्हारे श्वसुर दशरथ मेरे मित्र थे तथा तुम्हारे पिता जनक सबको ज्ञान देने वाले हैं और तुम पतिव्रताओं में अग्रगण्य हो । तपस्वियों से शान्त इस तपोवन में रहो, तुम्हारी सन्तति का संस्कार कर्म विधिवत् हो जायेगा । शोक को दूर करने वाली तमसा में स्नान कर देवपूजन करती हुई मुनि-कुमारियों के साथ रहो । इस प्रकार आश्वासन देकर अपने आश्रम पर सीता को ले जाकर तपस्विनियों के साथ एक पर्णकुटी में रख दिया । वहाँ वे मुनि-कुमारियों के साथ रहकर नियम से समय बिताने लगीं ।
इधर लक्ष्मण ने श्रीराम के पास आकर सारा समाचार कह सुनाया, जिसे सुनकर श्रीराम के नेत्रों से आँसू गिरने लगे, क्योंकि उन्होंने तो सीता को घर से निकाला था, हृदय से नहीं ।
अनन्तर वे शोक को हटाकर प्रजाओं का पालन करने लगे । उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया, बल्कि अश्वमेध यज्ञ में स्वर्णमयी सीता की मूर्ति बनाकर उसे सम्पन्न किया । यह सुनकर सीताजी ने परित्याग-दुःख को किसी प्रकार सहन किया ।
पञ्चदश सर्ग
सीताजी का परित्याग कर देने के बाद रामचन्द्रजी ने किसी दूसरी स्त्री से विवाह नहीं किया । एक दिन यमुना तटवर्ती कुछ तपस्वियों ने श्रीराम के पास आकर प्रार्थना की कि लवणासुर के उपद्रव के कारण हमारी यज्ञक्रियाएँ बन्द हो गयी हैं। राम ने उनके विघ्न दूर करने की प्रतिज्ञा की, क्यों कि धर्म की रक्षा करने के लिए ही तो उन्होंने पृथ्वी पर अवतार लिया था। राम ने उन मुनियों की रक्षा का भार शत्रुघ्न को सौंपा । जब शत्रुघ्न रथ पर सवार होकर चले तब राम ने उन्हें आशीर्वाद दिया और वे वनों की छटा देखते हुए चल पड़े ।