भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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शत्रुघ्न के साथ कुछ सेना भी गयी जो वैसे ही व्यर्थ थी जैसे 'अध्ययन' शब्द में इङ् धातु से लगा हुआ अधि उपसर्ग व्यर्थ है। मार्ग में जाते हुए शत्रुघ्न ने पहली रात महर्षि वाल्मीकि के आश्रम पर निवास कर बितायी। वाल्मीकिजी ने अपने तप के प्रभाव से शत्रुघ्न का बड़ा सत्कार किया। उसी रात को वन-वास के समय से निवास करती हुई उनकी भाभीजी को दो पुत्र उत्पन्न हुए। यह सुनकर शत्रुघ्नजी का मन खिल उठा। दूसरे दिन हाथ जोड़कर मुनि से आज्ञा लेकर शत्रुघ्न आगे बढ़े। जिस समय वे मधुवन नगर में पहुँचे उसी समय रावण की बहिन कुम्भीनसी का बेटा लवणासुर पशुओं को मारकर अपने नगर में लौट रहा था। शत्रुघ्न ने देखा कि यह अवसर ठीक है, क्योंकि उसके हाथ में भाला नहीं है। बस, शत्रुघ्न ने उसे घेरकर प्रहार करना शुरू कर दिया। उधर लवणासुर ने भी गरजकर एक पेड़ उखाड़कर शत्रुघ्न पर प्रहार किया, पर बीच में ही उन्होंने अपने बाणों से उसे चूर-चूर कर दिया। बाद शत्रु ने एक शिला उठाकर शत्रुघ्न पर फेंकी, पर शत्रुघ्न ने ऐन्द्र अस्त्र चलाकर उसे भी चूर-चूर कर दिया। तब वह राक्षस बवण्डर के समान शत्रुघ्न पर टूट पड़ा पर उन्होंने वैष्णव अस्त्र से प्रहार कर उसे यमपुर भेज दिया। उसे मारने के बाद शत्रुघ्न को अनुभव हुआ कि मेघनाद को मारनेवाले लक्ष्मण का मैं सच्चा भाई हूँ।

लवणासुर के वध से प्रसन्न होकर मुनियों ने शत्रुघ्न को खूब आशीर्वाद दिया और शत्रुघ्न ने यमुना के किनारे मथुरा नाम की नगरी बसायी जहाँ संयमी और सुखी लोग रहने लगे।

इधर मन्त्रद्रष्टा वाल्मीकिजी ने दशरथ तथा जनक दोनों के मित्र होने के नाते सीताजी के पुत्रों का जातकर्म आदि संस्कार बड़ी विधि से किया। ज्येष्ठ पुत्र के उत्पन्न होते समय सीताजी की प्रसव-पीड़ा गाय की पूँछ के बालों से दूर की थी और छोटे पुत्र के समय कुश से दूर की थी इसलिए उनका नाम लव और कुश रखा। जब वे बच्चे बड़े हुए तब ऋषि ने उन्हें वेद-वेदाङ्ग पढ़ाया और फिर अपनी रचना आदिकाव्य रामायण का गान कराया। उन दोनों ने अपनी माँ के आगे राम का यश गा-गाकर उनका मन बहलाया। लौटते समय शत्रुघ्न वाल्मीकि के आश्रम पर इसलिए नहीं गये कि मेरे सत्कार में ऋषि का अमूल्य समय नष्ट होगा। शत्रुघ्न ने सीधे अयोध्या आकर राजसभा में जाकर श्रीराम को प्रणाम किया और सारा समाचार कह सुनाया। श्रीराम सब सुनकर बड़े प्रभावित हुए और शत्रुघ्न को गले लगाकर उनका बड़ा सत्कार किया :