रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३७ )
श्रीराम के पूछने पर शत्रुघ्न ने सारी बातें तो बतायीं पर सीताजी के पुत्र होने की चर्चा नहीं की, क्योंकि वाल्मीकिजी ने उनसे कह रखा था कि समय आने पर मैं स्वयं दोनों पुत्रों को राम को सौंप दूँगा।
कुछ दिनों के बाद एक ब्राह्मण अपने मृत पुत्र को ड्योढ़ी पर अपनी गोद से उतारकर फूट-फूटकर रोने लगा। जब राम ने उसके शोक का कारण पूछा तो उन्हें बड़ी लज्जा हुई क्योंकि इक्ष्वाकु वंश के राजाओं के राज्य में किसी की अकाल-मृत्यु नहीं होती थी। यह कहकर यमराज को जीतने की इच्छा से पुष्पक विमान का स्मरण कर उसपर चढ़कर चलने लगे तो आकाश-वाणी हुई कि श्रीराम ! आपके राज्य में वर्ण सम्बन्धी दोष आ गया है, उसे खोजकर दूर करो। यह सुनकर श्रीराम पृथ्वी पर चक्कर लगाने लगे। घूमते-घूमते एक स्थान पर उन्होंने देखा कि एक पेड़ की शाखा पर उलटा लटका एक मनुष्य नीचे जलती हुई आग का धुआँ पी-पीकर तप कर रहा है। तब उन्होंने उससे पूछा—तुम कौन हो और क्या कर रहे हो ? तब वह बोला—मैं इन्द्रपद पाने के लिए तप कर रहा हूँ। मेरा नाम शम्बूक है और मैं शूद्र हूँ। तब राम ने सोचा कि इसके अनधिकार कर्म से पाप फैल रहा है, फलस्वरूप ब्राह्मण का पुत्र मर गया है। अतः इससे विरत करने के लिए बाण उठाकर उसका शिर काट गिराया। राजा का दण्ड पाने से शूद्र को सद्गति मिल गयी और ब्राह्मण का पुत्र जी उठा। कुछ दिन के बाद राम ने अश्वमेध के लिए घोड़ा छोड़ा। देश के ऋषि, महर्षि एवं राजर्षि इकट्ठे होने लगे। बिना पत्नी के यज्ञ होना सम्भव नहीं था, राम ने दूसरा विवाह भी नहीं किया था, अतः सोने की सीता बनाकर राम ने अपनी पत्नी के रूप में बैठाकर यज्ञ आरम्भ किया। वाल्मीकिजी के शिष्य सीता के पुत्र लव-कुश उनकी आज्ञा से उनका बनाया हुआ रामायण गाते हुए इधर-उधर घूमने लगे। किन्नरों के समान मधुर कंठवाले बालकों के गीत सुनकर यह बात राम के कानों तक भी पहुँची। उन्होंने बालकों को बुलाकर भाइयों के साथ उनके गीत एवं रूप की मधुरता को आश्चर्य के साथ देखा और सुना। सारी सभा स्तब्ध हो गयी। एकटक होकर श्रीराम और उन दोनों बालकों का एकदम मिलता-जुलता रूप रङ्ग देखा। उनमें अन्तर केवल इतना ही था कि वे दोनों अभी कुमार थे तथा वन-वासियों के वस्त्र पहने हुए थे तथा श्रीराम प्रौढ़ थे एवं राजसी वस्त्र पहने हुए थे। जनता को उस समय और आश्चर्य हुआ जब उन्होंने प्रेम से श्रीराम का दिया