रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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हुआ पुरस्कार भी लौटा दिया। जब श्रीराम ने उनसे पूछा कि तुम्हें यह किसने सिखाया है और किस कवि की रचना है? तब उन्होंने वाल्मीकिजी का नाम बता दिया। तब अपने भाइयों के साथ वाल्मीकिजी के पास जाकर प्रणामपूर्वक उन्होंने अपने को छोड़कर सारा राज्य उनके चरणों में भेंट कर दिया। दयालु ऋषि ने श्रीराम से कहा—ये दोनों गायक कुमार सीताजी के गर्भ से उत्पन्न हुए हैं और तुम्हारे पुत्र हैं। अब तुम्हें चाहिए कि सीता को स्वीकार कर लो। तब श्रीराम ने कहा—मुनिवर! आपकी पतोहू सीता लङ्का में मेरे सामने ही अग्नि में शुद्ध हो चुकी है, पर रावण की दुष्टता से मेरी प्रजा को विश्वास नहीं होता। अतः यदि सीता अपनी शुद्धता का प्रमाण देकर प्रजा को विश्वास दिलाये तब मैं आपकी आज्ञा से पुत्रों के साथ इन्हें स्वीकार कर सकता हूँ। श्रीराम की प्रतिज्ञा सुनकर वाल्मीकिजी ने शिष्यों को भेजकर सीताजी को बुलाया और दूसरे दिन इकट्ठी हुई प्रजा के सामने वाल्मीकिजी लव, कुश और सीताजी को साथ लेकर श्रीराम के आगे उपस्थित हुए। उन्हें देखते ही सब लोगों ने अपना शिर नीचे कर लिया, क्योंकि उन्हें लज्जा लगी कि हम लोगों ने व्यर्थ ही इस साध्वी पर कलङ्क लगाया। वाल्मीकिजी ने सीताजी से कहा—बेटी! अपने पति के आगे जनता का सन्देह दूर कर दो। तदनुसार शिष्यों द्वारा लाया गया गंगाजल हाथ में लेकर सीताजी ने आचमन करके कहा—यदि मन, वचन, कर्म किसी प्रकार से भी अपना पातिव्रत्य भंग न किया हो तो हे पृथ्वी माता! तुम मुझे अपनी गोद में ले लो। सीताजी के ऐसा कहते ही पृथ्वी फटी, उसमें से बिजली के समान चमकीला तेजोमण्डल निकला। उसके बीच सिंहासन पर बैठी हुई पृथ्वी प्रगट होकर सीताजी को अपनी गोद में लेकर पाताल में समा गयी। किसी प्रकार यज्ञ समाप्त कर श्रीराम ने सबको छुट्टी दे दी। श्रीराम ने भरत को सिन्धु देश का राज्य दिया, भरत ने गन्धर्वों को जीतकर अपने योग्य पुत्र तक्ष और पुष्कल को तक्ष और पुष्कल दिया। राम की आज्ञा से लक्ष्मण ने अपने दोनों पुत्र अङ्गद और चित्रकेतु को कारापथ का राजा बनाया। यह सब हो जाने पर एक दिन काल ने आकर श्रीराम से एकान्त में मिलकर वैकुण्ठ चलने की प्रार्थना की। बाद श्रीराम ने कुश को कुशावती का राजा बनाया और लव को शरावती का। पुनः अग्निहोत्र की आग लेकर उत्तर की तरफ चल दिये और गोप्रतर में सरयू स्नान कर विमान पर चढ़कर स्वर्ग चले गये।