रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
पृष्ठ 55, कुल 735 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४०. )
एक दिन कुश की इच्छा हुई कि सरयू के जल में स्त्रियों के साथ विहार करें । अन्त में वे उनके साथ जलक्रीड़ा में लीन हो गये । स्त्रियों के साथ सरयू में जलक्रीडा करते हुए वे ऐसे प्रतीत होते थे मानो देवराज इन्द्र आकाशगंगा में अप्सराओं के साथ जलक्रीड़ा करते हों । अगस्त्य ऋषि ने श्रीराम को जो जैत्र आभूषण दिया था उसे राम ने कुश को राज्य के समय ही दे दिया था । क्रीड़ा करते समय वह रत्न जल में गिर गया, किसी को पता तक नहीं चला । बाद कुश ने उसे ढूंढने के लिए धीवरों को आज्ञा दी, पर वह मिल न सका । तब धीवरों ने कहा—महाराज, मालूम पड़ता है कि इस जल में रहनेवाले कुमुद नामक नाग ने लोभ से उसे चुरा लिया है। तब कुश ने क्रोध कर तट पर खड़े होकर धनुष को ठीक किया ओर उसपर नागों को नाश करनेवाला अस्त्र चढ़ा लिया । उस धनुष के चढ़ाते ही उस जल से अचानक ही एक कन्या को आगे किये हुए नागराज कुमुद इस प्रकार निकले मानो लक्ष्मी को लेकर कल्पवृक्ष निकल रहा हो । वह प्रणाम करके बोला—राजन् ! यह मेरी कन्या गेंद खेल रही थी, उसकी थपकी से गेंद ऊपर उछल गया । उसे देखने के लिए जब आंखें ऊपर उठायीं तो देखा कि यह आपका आभूषण तारे के समान नीचे गिर रहा है। इसने झट उसे पकड़ लिया। आप इसे लीजिए और यह मेरी छोटी बहन कुमुद्वती जीवनभर आपकी सेवा करेगी, आप अपनी पत्नी के रूप में इसे स्वीकार करें। कुश ने आभूषण लेकर कहा कि आज से आप मेरे सम्बन्धी बन गये । बाद कुमुद ने अपने कुटुम्बियों को बुलाकर बड़े धूमधामसे कुमुद्वती का कुश से विवाह कर दिया । अनन्तर उसके साथ आनन्दपूर्वक कुश राज्य करने लगे ।
सप्तदश सर्ग
जैसे रात के ब्राह्म मुहूर्त में बुद्धि को नयापन मिल जाता है वैसे ही कुश को कुमुद्वती से अतिथि नामक पुत्र प्राप्त हुआ । जैसे सूर्य अपने प्रकाश से उत्तर और दक्षिण दोनों दिशाओं को पवित्र कर देता है वैसे ही सुशिक्षित अतिथि ने माता और पिता के दोनों कुलों को पवित्र कर दिया । कुश ने चतुर्विध विद्याओं के अध्ययन के बाद राजकन्याओं से अतिथि का विवाह कर दिया । अतिथि भी कुश के समान ही कुलीन, शूर और जितेन्द्रिय थे । इसलिए कुश अपने पुत्र को अपना ही दूसरा रूप समझते थे । अपने कुल के अनुसार कुश भी एक बार युद्ध में इन्द्र की सहायता करने के लिए गये थे । वे शक्तिशाली दुर्जय राक्षस