रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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को मारकर स्वयं वीरगति को प्राप्त हुए। जैसे कुमुदों को खिलानेवाले चन्द्रमा के अस्त होने पर चांदनी भी स्वयं अस्त हो जाती है वैसे ही कुमुद्वती भी कुश के साथ सती हो गयी। युद्ध में जाते समय कुश ने जो आज्ञा दी थी उसी के अनुसार मन्त्रियों ने उनके पुत्र अतिथि को राजा बनाया। उनके शिर पर गिरती हुई अभिषेक की धारा ऐसी सुन्दर लगती थी कि मानो शिवजी के शिर पर गंगाजी की धारा गिर रही हो। मन्त्रों से पवित्र जल से स्नान करते समय उनके शरीर का तेज अधिक बढ़ता जा रहा था। अभिषेक के बाद ब्राह्मणों को उन्होंने काफी धन दिया। अयोध्या के बड़े-बड़े मन्दिरों में देवताओं की पूजा की गयी और उन्होंने राजा अतिथि पर कृपा की। अभिषेक के समय बड़ा उत्सव मनाया गया। जैसे वृक्ष को फला-फूला देखकर जान लिया जाता है कि विशेष फल लगेंगे वैसे ही अतिथि के प्रसन्न मुख को देखकर सेवक जान जाते थे कि इनसे विशेष धन मिलेगा आलप छोड़कर अतिथि ने प्रजा का काम किया। राजा अतिथि ने जो मुँह से कहा उसे पूरा किया। जिसको कुछ दे दिया उससे लिया नहीं। यौवन, सौन्दर्य, ऐश्वर्य जिनके पास रहता है वे मतवाले हो जाते हैं, पर राजा अतिथि के पास सब थे फिर भी उनमें अभिमान नहीं था। वे बड़े राजनीतिज्ञ थे। उनकी बातें गुप्त रहती थी, कार्य होने पर ही मालूम पड़ता था। जैसे खुले आकाश में सूर्य की किरणों के फैल जाने से कुछ भी छिपा नहीं रहता वैसे ही अतिथि ने चारों ओर दूतों का ऐसा जाल बिछा दिया कि प्रजा की कोई बात उनसे छिपी नहीं थी। राजाओं के लिए शास्त्रों ने दिन और रात के जो कर्तव्य निर्धारित किये हैं उन सबको राजा अतिथि विश्वास के साथ करते थे। उनकी गुप्तचर व्यवस्था बड़ी सुन्दर थी, किसी को पता नहीं चलता था। जो भी कार्य वे करते थे वे सभी कल्याणकारी होते थे। उन्होंने काम और अर्थ के लिए धर्म को कभी नहीं छोड़ा। वे तीनों के साथ एक-सा व्यवहार करते थे। उन्होंने धन इकट्ठा इसलिए किया कि समय पर दीनों को दिया जाय और लोककल्याण का काम हो। कुश के प्रयत्न से बढ़ी हुई शस्त्रास्त्र चलाना जाननेवाली जो सेना थी उसे अतिथि अपने शरीर के समान प्यार करते थे। जैसे सर्प के शिर से मणि नहीं निकाली जा सकती वैसे ही शत्रु इनकी शक्तियों को अपनी ओर नहीं खींच सकते थे। उन्होंने विघ्नों से तपस्वियों की रक्षा की, चोरों से प्रजाओं की सम्पत्तियों को बचाया। जिस प्रकार वे रक्षा कर रहे थे पृथ्वी भी उसी प्रकार उन्हें ऐश्वर्य देती थी। खानों