भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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ने रत्न दिये, खेतों ने अन्न दिया और वनों ने उन्हें हाथी दिये। इस प्रकार सभी उपायों से राजनीति चलाते हुए मन्त्रियों की सहायता से उपायों का निर्विघ्न फल प्राप्त किया। युद्धक्षेत्र में अतिथि को देखकर शत्रुओं के छक्के छूट जाते थे और वे प्राण लेकर भाग जाते थे। जो अतिथि के पास जाते थे उन्हें वे पर्याप्त धन दे देते थे। जैसे देवता लोग इन्द्र की आज्ञा मानते हैं वैसे ही राजा लोग अतिथि की आज्ञा मानते थे। अश्वमेध के समय जिन ब्राह्मणों ने यज्ञ कराया उनका सत्कार अतिथि ने कुबेर के समान किया। इन्द्र ने उनके राज्य में वर्षा की, धर्मराज ने धर्मवृद्धि की, यमराज ने रोग बढ़ना रोक दिया और कुबेर ने इनका राजकोष भर दिया। इस प्रकार सभी लोकपालों ने इनके प्रताप से प्रसन्न होकर इनकी सहायता की।

अष्टादश सर्ग

शत्रुओं का नाश करनेवाले राजा अतिथि की रानी निषधराज की कुमारी थी। उससे अतिथि ने निषध पर्वत के समान बलवान् एक पुत्र उत्पन्न किया जिसका नाम निषध रखा। जैसे समय की वर्षा से खेतों को देखकर संसार के प्राणी प्रसन्न हो जाते हैं वैसे ही अत्यन्त प्रतापी युवराज निषध को देखकर राजा अतिथि भी प्रसन्न हुए। कुमुद्वती के पुत्र अतिथि ने अधिक दिनों तक सुख भोगा, पुनः निषध को राजपाट सौंपकर अपने पुण्यों के बल से पाये हुए स्वर्ग लोक में सुख भोगने चले गये। कमल जैसे नेत्रवाले, समुद्र के समान गम्भीर चित्तवाले और नगर की अर्गला के समान बाहुवाले अद्वितीय वीर निषध ने भी सागर तक फैली हुई पृथ्वी का भोग किया। उनके पीछे अग्नि के समान तेजस्वी उनके पुत्र नल राजा हुए। उन्हें आकाश के समान सांवला नभ नामक पुत्र हुआ जो लोगों को वैसा ही प्यारा हुआ जैसे सावन का महीना। धर्मात्मा नल ने उस पुत्र को उत्तर कोशल का राज्य सौंपकर स्वयं जंगलों में जाकर मृगों के साथ रहने लगे। नभ को पुण्डरीक नामक पुत्र हुआ। पिता के स्वर्ग चले जाने के बाद कमल धारण करनेवाली लक्ष्मी ने उन्हें ही विष्णु मानकर वर लिया। उस पुण्डरीक ने प्रजा का कल्याण करने में समर्थ और शान्त स्वभाववाले अपने पुत्र क्षेमधन्वा को राज सौंप दिया और स्वयं शान्त होकर जंगल में तपस्या करने चले गये। उनको देवानीक नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। बड़े-बड़े यज्ञ करने-वाले क्षेमधन्वा अपने ही समान पुत्र को राज्य सौंपकर स्वर्ग चले गये। देवानीक