भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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का सम्मान शत्रु और मित्र दोनों समान रूप से करते थे । देवानीक के पुत्र का नाम अहीनग था । उसने कभी नीचों का साथ नहीं किया इसलिए व्यसनों से दूर रहकर सारी पृथ्वी का शासन किया । उस शत्रुविजयी राजा के स्वर्गवास के अनन्तर उनके प्रतापी पुत्र अयोध्या के राजा बने । उनको शील नामक बलवान् पुत्र हुआ । शील के उन्नाभ नामक पुत्र हुआ जो सब राजाओं में श्रेष्ठ थे उनका पुत्र वज्रनाभ हुआ । वे अपने पुण्य से स्वर्ग के राजा बने । उनके पीछे शंखण नामक उनका पुत्र सारी पृथ्वी का राजा हुआ । उसके बाद अश्विनीकुमारों जैसा सुन्दर और सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र राजा हुए । उनका दूसरा नाम व्युषिताश्व भी था । उन्होंने काशी विश्वनाथ की आराधना कर विश्वसह नामक पुत्र प्राप्त किया । उनको हिरण्यनाभ उत्पन्न हुआ उनका पुत्र कौशल्य हुआ । उनके पुत्र का नाम वसिष्ठ था वसिष्ठ के पुत्र शिरोमणि हुए । उनको पुत्र नामक पुत्र हुआ । पुत्र की पत्नी से पुष्य नामक पुत्र हुआ उनके पुत्र ध्रुवसन्धि हुए उनके पुत्र सुदर्शन हुए जो बड़े प्रतापी और शक्तिशाली राजा हुए । मन्त्रियों ने चित्र मँगाकर सुन्दर राजकुमारियों से उनका शुभ विवाह कराया ।

ऊनविंश सर्ग

विद्वान् राजा सुदर्शन ने अग्नि के समान तेजस्वी अपने पुत्र अग्निवर्ण को राजा बना दिया और नैमिषारण्य में रहने लगे । वहां वे तीर्थजल पीते, भूमि पर बिछे कुश पर आसीन होते, फल कन्दमूल के आहार की इच्छा छोड़कर तप करने लगे । पिता से प्राप्त पृथ्वी के पालन में अग्निवर्ण को कुछ कठिनाई नहीं हुई । कुछदिनों तक तो उन्होंने स्वयं राजकार्य देखा पर पुनः मन्त्रियों पर भार डालकर कामुक के समान जीवन का रस लेने लगे । नित्य नये उत्सवों में संलग्न होकर क्षणभर भी भोगविलास के बिना नहीं रह सकते थे । हमेशा रनिवास में रहते थे । उनके दर्शन के लिए जनता अधीर रहती थी । वह पराक्रमी राजा सुन्दरी स्त्रियों के साथ हस्तिनी के साथ गजराज के समान क्रीड़ासक्त हो गया । उसकी गोद में बैठने योग्य दो ही वस्तुएँ थीं एक वीणा दूसरी सुन्दरी स्त्रियां । वह सदा नयी-नयी वस्तुओं को चाहता हुआ नित्य नाच, गान, वाद्य आदि में लीन हो गया । वह राजा राज-काज छोड़कर इन्द्रिय सुखों का रस लेता हुआ ऋतुएँ बिताता था । इतना व्यसन में लीन होने पर भी दूसरे राजा उसके राज्य पर