भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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पञ्चदशः सर्गः ५१७

गायक तब उसमें रह ही क्या जाता था ? जिसे सुनकर लोग लट्टू न हो जायें । अर्थात् उसके मधुर गान को सुनकर लोग मुग्ध हो गये ॥ ६४ ॥

रूपे गीते च माधुर्यं तयोस्तज्ज्ञैर्निवेदितम् ।
ददर्श सानुजो रामः शुश्राव च कुतूहली ॥ ६५ ॥

अन्वयः—तज्ज्ञैः निवेदितं तयोः रूपे गीते च माधुर्यं सानुजः रामः कुतूहली (सन्) ददर्श शुश्राव च ।

रूप इति । ते जानन्तीति तज्ज्ञाः तैस्तज्ज्ञैरभिज्ञैर्निवेदितं तयोः कुशलवयो रूपे आकारे गीते च माधुर्यं रामणीयकं सानुजो रामः कुतूहली सानन्द सन् यथासंख्यं ददर्श शुश्राव च ।

भाषार्थ—यह बात राम के कानों तक पहुँची, उन्होंने बालकों को अपने पास बुला भेजा और अपने भाइयों के साथ उन दोनों बालकों के रूप और गीत की मधुरता को आश्चर्य के साथ देखा और सुना ॥ ६५ ॥

तद्गीतश्रवणैकाग्रा संसद्श्रुमुखी बभौ ।
हिमनिष्यन्दिनी प्रातर्निवातेव वनस्थली ॥ ६६ ॥

अन्वयः—तद्गीतश्रवणैकाग्रा अश्रुमुखी संसद् प्रातः हिमनिष्यन्दिनी निर्वाता वनस्थली इव बभौ ।

तदिति । तयोर्गीतश्रवण एकाग्रसक्ताऽश्रुमुखी आनन्दादिति भावः । संसद्सभा प्रातर्हिमनिष्यन्दिनी निर्वाता वातरहिता वनस्थलीव बभौ शुशुभे । आनन्दपारवश्यान्निष्पन्दमास्त इत्यर्थः ।

भाषार्थ—सारी सभा मौन होकर उनका गीत सुनती जा रही थी और सीता के स्मरण से आंखों से आंसू बहाती जा रही थी । उस समय वह सभा प्रातःकाल की उस वनस्थली के समान दिखाई देने लगी, जिसमें वृक्षों से टप-टप ओस की बूंदें गिर रही हों ॥ ६६ ॥

वयोवेषविसम्वादि रामस्य च तयोस्तदा ।
जनता प्रेक्ष्य सादृश्यं नाक्षिकम्पं व्यतिष्ठत ॥ ६७ ॥

अन्वयः—जनता वयोवेषविसंवादि तदा तयोः रामस्य च सादृश्यं प्रेक्ष्य नाक्षिकम्पं व्यतिष्ठत ।

वय इति । जनता जनानां समूहः । “ग्रामजनबन्धुसहायेभ्यस्तल्” इति । तल्प्रत्ययः । वयोवेषाभ्यामेव विसम्वादि विलक्षणं तदा तयोः कुशलवयो रामस्य च सादृश्यं प्रेक्ष्य नास्त्यक्षिकम्पो यस्मिन्कर्मणि तद्यथा तथा । नञर्थस्य नशब्दस्य