रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५६२ रघुवंशमहाकाव्ये
श्रुतेरित्यर्थः । स जानन्नहमागराधनीयस्योपास्यस्य तव धृतेः प्रीतेः । 'धृ प्रीतौ' इति धातोः स्त्रियां क्तिन् । विघातं कथं नामाचरेयम् । असम्भावितमित्यर्थः ।
भाषार्थ--मैं जानता हूँ कि आप राक्षसों का नाश करने के लिए मनुष्य शरीर धारण करने वाले विष्णु के पुत्र हैं इसलिए आप पूज्य हैं फिर मैं आप से वैर कैसे कर सकता हूँ ? ॥ ८२ ॥
कराभिघातोत्थितकन्दुकेयमालोक्य बालातिकुतूहलेन । ह्रदात्पतज्ज्योतिरिवान्तरिक्षादादत्त जैत्राभरणं त्वदीयम् ॥८३॥
अन्वयः—कराभिघातेनोत्थितकन्दुका इयं बालातिकुतूहलेन अन्तरिक्षात् ज्योतिः इव ह्रदात् पतत् त्वदीयं जैत्राभरण आलोक्य आदत्त ।
करंति । कराभिघातेनोत्थित ऊर्ध्वं गत कन्दुको यस्याः सा कन्दुकार्थमूर्ध्वं पश्यन्तीत्यर्थ इयं बालातिकुतूहलेनात्यन्तकोतुकेनान्तरिक्षाज्ज्योतिनक्षत्रमिव । ‘ज्योतिर्भद्योतदृष्टिपु’ इत्यमरः । ह्रदात्पतत्त्वदीयं जैत्राभरणमालोक्यादत्त।गृहात् ।
भाषार्थ—यह मेरी अबोध बालिका गेंद खेल रही थी, इसकी थपकी से गेंद ऊपर उछल गई, उसे देखने के लिये उसने ऊपर आँखें उठाई तो देखा कि आकाश से गिरते हुए तारे के समान आप का आभूषण नीचे चला जा रहा है इसने उसे झट पकड़ लिया ॥ ८३ ॥
तदेतदाजानुविलम्बिना ते ज्याघातरेखाकिणलाञ्छनेन । भुजेन रक्षापरिघेण भूमेरुपैतु योगं पुनरंसलेन ॥८४॥
अन्वयः—तत् एतत् आजानुविलम्बिना ज्याघातरेखाकिणलाञ्छनेन भूमेः रक्षापरिघेण ते अंसलेन भुजेन पुनः योगं उपैतु ।
तदिति । तदेतदाभरणमाजानुविलम्बिना दीर्घेण ज्याघातेन या रेखा रेखाकारा ग्रन्थयस्तासां किणं चिह्नं तदेव लाञ्छनं यस्य तेन भूमेः रक्षायाः परिघेण रक्षार्गलेन । ‘परिघो योगभेदास्त्रमुद्गरेऽर्गलघातयोः’ इत्यमरः । अंसलेन बलवता ते भुजेन पुनर्योगं संगतिमुपैतु । एतैर्विशेषणैर्महाभाग्यशौर्यधुरन्धरत्वबलवत्त्वादि गम्यते ।
भाषार्थ—आप उसे लीजिये और अपनी उस मोटी घुटनों तक लम्बी भुजा में फिर बांध लीजिये जिसमें धनुष की डोरी फटकार से घट्ठं पड़ गये हैं और जो पृथ्वी की रक्षा करती है ॥ ८४ ॥
इमां स्वसारं च यवीयसीं मे कुमुद्वतीं नार्हसि नानुमन्तुम् । आत्मनपराधं नुदतीं चिराय शुश्रूषया पार्थिव पादयोस्ते ॥८५॥