भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

पृष्ठ 667, कुल 735 में से

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पृष्ठ 667
६०८रघुवंशमहाकाव्ये

विद्यायामधिगम्यार्जन्मने जन्मनिवृत्तये मोक्षायाकल्पत समपद्यत । 'क्लृपेः संपद्य- माने चतुर्थी वक्तव्या' । मुक्त इत्यर्थः ।

भाषार्थ—राजा पुत्र बड़े उदार हृदय वाले थे, वे संसार में फिर जन्म लेना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने पृथिवी का भार अपने पुत्र पुष्य को सौंप दिया और स्वयं महर्षि जैमिनि के शिष्य होकर उनसे योग सीखकर आवागमन से मुक्त हो गये ॥ ३३ ॥

ततः परं तत्प्रभवः प्रपेदे ध्रुवोपमेयो ध्रुवसंधिरुर्वीम् ।
यस्मिन्नभूज्ज्यायसि सत्यसंधे संधिर्ध्रुवः संनमतामरीणाम् ॥ ३४ ॥

अन्वयः—ततः (सः) तत्प्रभवः ध्रुवोपमेयः ध्रुवसन्धिः उर्वीं प्रपेदे ज्यायसि सत्यसन्धॆ यस्मिन् सन्नमतां अरीणां सन्धिः ध्रुव अभूत् ।

तत इति । ततः परं स पुष्यः प्रभवः कारणं तस्य स तत्प्रभवः । तदात्मज इत्यर्थः । ध्रुवेणौत्तानपादिनोपमेयः । 'ध्रुव औत्तानपादिः स्यात्' इत्यमरः । ध्रुवसंधिरुर्वी प्रपेदे । ज्यायसि श्रेष्ठे सत्यसंधे सत्यप्रतिज्ञे यस्मिन्ध्रुवसंधौ संनम- ताम् अनुद्धतानामित्यर्थः । अरीणां संधिर्ध्रुवः स्थिरोऽभूत् । ततः सार्थकनामेत्यर्थः।

भाषार्थ—पुष्य के बाद उनके ध्रुव के समान निश्चल पुत्र ध्रुवसन्धि राजा हुए, जिनसे डरकर शत्रुओं ने सन्धि कर ली । उनका लिखा हुआ सन्धि पत्र पक्का होता था क्योंकि वे अपनी बात के बड़े धनी थे ॥ ३४ ॥

सुते शिशावेव सुदर्शनाख्ये दर्शात्ययेन्दुप्रियदर्शने सः ।
मृगायताक्षो मृगयाविहारो सिंहादवापद्विपदं नृसिंहः ॥ ३५ ॥

अन्वयः—मृगायताक्षः नृसिंहः सः दर्शात्ययेन्दुप्रियदर्शने सुदर्शनाख्ये सुते शिशौ ( सति ) एव मृगयाविहारी सिंहात् विपदं अवापत् ।

सुत इति । मृगायताक्षो नृसिंह पुरुषश्रेष्ठः ध्रुवसन्धिर्दशात्ययेन्दुप्रियदर्शने प्रतिपच्चन्द्रनिभे सुदर्शनाख्ये सुते शिशौ सत्येव मृगयाविहारी सन् सिंहाद्विपदं मरणमवापत् । व्यसनासक्तिरनर्थावहेति भावः ।

भाषार्थ—ध्रुवसन्धि के नेत्र मृगों के समान बड़े-बड़े थे और वे पुरुषों में सिंह के समान थे, एक दिन वे वन में शिकार करते हुए सिंह से मारे गये, उस समय तक द्वितीया के चन्द्रमा के समान सुन्दर लगने वाला सुदर्शन नामक उनका पुत्र बालक ही था ॥ ३५ ॥

स्वर्गामिनस्तस्य तमेकमात्यादमात्यवर्गः कुलतन्तुमेकम् ।
अनाथदीनाः प्रकृतीरवेक्ष्य साकेतनाथं विधिबच्चकार ॥ ३६ ॥