भारतकोश
रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

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६३८ रघुवंशमहाकाव्ये

भाषार्थ—राजा को कोई भयानक रोग तो नहीं हुआ है ? ऐसी आशंका करने वाली प्रजा को यह कहकर समझाते थे कि राजा इस समय पुत्र के लिए जप, व्रत आदि का अनुष्ठान कर रहे हैं इसलिए दुबले होते जा रहे हैं ॥५२॥

स त्वनेकवनितासखोऽपि सन्पावनीमनवलोक्य सन्ततिम् ।
वैद्ययत्नपरिभाविनं गदं न प्रदीप इव वायुमत्यगात् ॥ ५३ ॥

अन्वयः—स तु अनेकवनितासखोऽपि सन् पावनीं सन्ततिं अनवलोक्य वैद्य-रत्नपरिभाविनं गदं प्रदीपः वायुः इव न अत्यगात् ।

स इति । स त्वग्निवर्णोऽनेकवनितासखः सन्नपि पावनीं पित्रृणमोचनीं सन्ततिमनवलोक्य पुत्रमनवाप्येत्यर्थः । वैद्ययत्नपरिभाविनं गदं रोगं प्रदीपो वायुमिव नात्यगान्नातिचक्राम । ममारेत्यर्थः ।

भाषार्थ—अनेक रानियों के रहते हुए भी वे राजा अग्निवर्ण पुत्र का मुख नहीं देख सके और वैद्य लोग राजा को नीरोग नहीं कर सके, जिस प्रकार हवा के सामने दीपक का कुछ भी वश नहीं चलता है, उसी प्रकार राजा भी रोग से नहीं बचाया जा सका अर्थात् राजा अग्निवर्ण मर गये ॥ ५३ ॥

तं गृहोपवन एव सङ्गताः पश्चिमक्रतुविदा पुरोधसा ।
रोगशान्तिमपदिश्य मन्त्रिणः सम्भृते शिखिनि गूढमादधुः ॥ ५४ ॥

अन्वयः—पश्चिमऋतुविदा पुरोधसा सङ्गताः मन्त्रिणः गृहोपवने एव रोग-शान्तिम् अपदिश्य तं सम्भृते शिखिनि गूढम् आदधुः ।

तमिति । पश्चिमक्रतुविदान्त्येष्टिविधिज्ञेन पुरोधसा सङ्गता मन्त्रिणो गृहोपवन एव गृहाराम एव । 'आरामः स्यादुपवनम्' इत्यमरः । रोगशान्तिमपदिश्य शान्तिकर्म व्यपदिश्य तमग्निवर्णं सम्भृते समिद्धे शिखिन्यग्नौ गूढमप्रकाशमादधुनिदधुः । अग्निसंस्कारं चक्रुरित्यर्थः ।

भाषार्थ—अन्त्येष्टि क्रिया को जानने वाले पुरोहितों से मिलकर मन्त्रियों ने रोग शांति के बहाने राजा के शव को भवन के उपवन में गुप्त रूप से जला दिया ॥ ५४ ॥

तैः कृतप्रकृतिमुख्यसंग्रहैराशु तस्य सहधर्मचारिणी ।
साधु दृष्टशुभगर्भरक्षणा प्रत्यपद्यत नराधिपश्रियम् ॥ ५५ ॥

अन्वयः—आशु कृतप्रकृतिमुख्यसंग्रहैः तैः साधु दृष्टशुभगर्भरक्षणा तस्य सह धर्मचारिणी नराधिपाश्रयं प्रत्यपद्यत ।