रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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६३४ रघुवंशमहाकाव्ये
| श्लोक-प्रतीक | सर्ग | श्लोक | श्लोक-प्रतीक | सर्ग | श्लोक |
|---|---|---|---|---|---|
| असङ्गमद्रिष्वपि सार | ३ | ६३ | आपादपद्मप्रणताः | ४ | ३७ |
| असज्जनेन काकुत्स्थः प्र | १२ | ४६ | आपिञ्जरा बद्धरजः | १६ | ५१ |
| असमाप्तविधेर्यन्तो | ८ | ७६ | आपीनभारोद्वहन | २ | १८ |
| असह्यपीडं भगवन्न | १ | ७१ | आमुक्ताभरणः स्रग्वी | १७ | २५ |
| असह्यविक्रमः सह्यं | ४ | ५२ | आयोगने कृष्णगते सं | ६ | ४२ |
| असौ कुमारस्तमजोऽनु | ६ | ७८ | आराध्य विश्वेश्वरमीश्व | १८ | २४ |
| असौ पुरस्कृत्य गुरुं | १६ | ६६ | आरूढमद्रीनूदधीन्वि | ६ | ७७ |
| असौ महाकालनिकेत | ६ | ३४ | आलोकमार्गं सहसा | ७ | ६ |
| असौ महेन्द्रद्विपदान | १३ | २० | आवर्ज्य शाखाः सदयं | १६ | १९ |
| असौ महेन्द्राद्रिसमान | ६ | ५४ | आवर्तशोभा नतनाभि | १५ | ६३ |
| असौ शरण्यः शरणोन्मु | ६ | २१ | आवृण्वतो लोचनमार्गं | ७ | ४२ |
| अस्त्रं हरादाप्तवता | ६ | ६२ | आशास्यमन्यत्पुनरु | ५ | ३४ |
| अस्य प्रमाणेषु समग्र | ६ | ३३ | 'आश्वास्य रामावरजः स | १४ | ५० |
| अस्याङ्कलक्ष्मीर्भव दीर्घ | ६ | ४३ | आससाद मिथिलां स | ११ | ५२ |
| अहमेव मतो महीप | ८ | ८ | आससाद मुनिरात्मन | ११ | २३ |
| अहीनगुर्नाम स गां सम | १८ | १४ | आसां जलस्फालनतत्प | १६ | ६२ |
| आ | आसारसिक्तक्षितिबाष्प | १३ | २९ | ||
| आकारसदृशज्ञः | १ | १५ | आसीद्वरः कण्टकितप्र | ७ | २२ |
| आकीर्णमृषिपत्नीना | २ | ५० | आस्फालितं यत्प्रमदाक | १६ | १३ |
| आकुञ्चिताग्राङ्गुलिना ततो | ६ | १५ | आस्वादवद्भिः कवलैः | २ | ५ |
| आततज्यमकरोत्स | ११ | ४५ | इ | ||
| आतपात्ययसंक्षिप्त | १ | ५२ | इक्षुच्छायनिषादिन्यः | ४ | २० |
| आत्तशस्त्रस्तदध्यास्य | १५ | ४६ | इक्ष्वाकुवंशगुरवे | १३ | ७० |
| आदिदेशाथ शत्रुघ्नं | १५ | ६ | इक्ष्वाकुवंशप्रभवः | १४ | ५५ |
| आदिष्टवर्त्मा मुनिभिः | १५ | १० | इक्ष्वाकुवंशप्रभवो | ५ | ५५ |
| आधारबन्धप्रमुखैः | ५ | ६ | इक्ष्वाकुवंश्यः ककुदं | ६ | ७१ |
| आधूय शाखाः कुसुम | १६ | ३६ | इतः परानर्भकहार्यं | ७ | ६७ |
| आधोरणानां गजसं | ७ | ४६ | इतराण्यपि रक्षांसि | १२ | ८२ |
| आनन्दजः शोकजमश्रु | १४ | ३ | इतरेऽपि रघोर्वंश्यास्त्र | १५ | ३५ |