भारतकोश
संग्रह पर लौटें

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

Raghuvamsham of Kalidasa Hindi

महाकवि कालिदास द्वारा

स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)

DevanagariHindipublished735 पृष्ठ

६३४ रघुवंशमहाकाव्ये

श्लोक-प्रतीकसर्गश्लोकश्लोक-प्रतीकसर्गश्लोक
असङ्गमद्रिष्वपि सार६३आपादपद्मप्रणताः३७
असज्जनेन काकुत्स्थः प्र१२४६आपिञ्जरा बद्धरजः१६५१
असमाप्तविधेर्यन्तो७६आपीनभारोद्वहन१८
असह्यपीडं भगवन्न७१आमुक्ताभरणः स्रग्वी१७२५
असह्यविक्रमः सह्यं५२आयोगने कृष्णगते सं४२
असौ कुमारस्तमजोऽनु७८आराध्य विश्वेश्वरमीश्व१८२४
असौ पुरस्कृत्य गुरुं१६६६आरूढमद्रीनूदधीन्वि७७
असौ महाकालनिकेत३४आलोकमार्गं सहसा
असौ महेन्द्रद्विपदान१३२०आवर्ज्य शाखाः सदयं१६१९
असौ महेन्द्राद्रिसमान५४आवर्तशोभा नतनाभि१५६३
असौ शरण्यः शरणोन्मु२१आवृण्वतो लोचनमार्गं४२
अस्त्रं हरादाप्तवता६२आशास्यमन्यत्पुनरु३४
अस्य प्रमाणेषु समग्र३३'आश्वास्य रामावरजः स१४५०
अस्याङ्कलक्ष्मीर्भव दीर्घ४३आससाद मिथिलां स११५२
अहमेव मतो महीपआससाद मुनिरात्मन११२३
अहीनगुर्नाम स गां सम१८१४आसां जलस्फालनतत्प१६६२
आसारसिक्तक्षितिबाष्प१३२९
आकारसदृशज्ञः१५आसीद्वरः कण्टकितप्र२२
आकीर्णमृषिपत्नीना५०आस्फालितं यत्प्रमदाक१६१३
आकुञ्चिताग्राङ्गुलिना ततो१५आस्वादवद्भिः कवलैः
आततज्यमकरोत्स११४५
आतपात्ययसंक्षिप्त५२इक्षुच्छायनिषादिन्यः२०
आत्तशस्त्रस्तदध्यास्य१५४६इक्ष्वाकुवंशगुरवे१३७०
आदिदेशाथ शत्रुघ्नं१५इक्ष्वाकुवंशप्रभवः१४५५
आदिष्टवर्त्मा मुनिभिः१५१०इक्ष्वाकुवंशप्रभवो५५
आधारबन्धप्रमुखैःइक्ष्वाकुवंश्यः ककुदं७१
आधूय शाखाः कुसुम१६३६इतः परानर्भकहार्यं६७
आधोरणानां गजसं४६इतराण्यपि रक्षांसि१२८२
आनन्दजः शोकजमश्रु१४इतरेऽपि रघोर्वंश्यास्त्र१५३५

श्लोकानुक्रमणिका

६४५

| सर्ग | श्लोकः | | सर्ग | श्लोकः | | :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: | | इतस्ततश्च वैदेहीम | १२ | ५९ | इत्युक्तवन्तं जनकात्म | १४ | ४३ | | इति क्रमात्प्रयुञ्जानो | १७ | ६८ | इत्युक्त्वा मैथिलीं भर्तु | १२ | ३८ | | इति क्षितीशो नवतिं न | ३ | ६९ | इत्युद्गताः पौरवधू | ७ | १६ | | इति जित्वा दिशो जिष्णु | ४ | ८५ | इत्यूचिवानुपहताभरणः | १६ | ८६ | | इति प्रगल्भं पुरुषा | २ | ४१ | इदमुच्छ्वसितालकं | ८ | ५५ | | इति प्रगल्भं रघुणा स | ३ | ४७ | इन्दीवरश्यामतनु | ८ | ६५ | | इति प्रतिश्रुते राज्ञा | १५ | ७४ | इन्दोरगतयः पद्मे | १७ | ७५ | | इति प्रसादयामासुस्ते | १० | ३३ | इन्द्राद्वृष्टिनिर्यमितगदो | १७ | ८१ | | इति वादिन एवास्या | १ | ८२ | इन्द्रियार्थपरिशून्यम | १९ | ६ | | इति विज्ञापितो राज्ञा | १ | ७३ | इमां तटाशोकलतां च | १३ | ३२ | | इति विरचितवाग्भिः | ५ | ७५ | इमां स्वसारं च यवीय | १६ | ८५ | | इति विस्मृतान्यकरणीय | ९ | ६९ | इयमप्रतिबोधशायि | ८ | ५८ | | इति शत्रुपु चेन्द्रियेषु | ८ | २३ | इप्सितं तदवज्ञाना | १ | ७९ | | इति शिरसि स वामं | ७ | ७० | | | | | इति संत्यज्यं शत्रुघ्नं | १५ | १९ | उत्खातलोकत्रयकण्टके | १४ | ७३ | | इति स्वसुर्भोजकुलप्र | ७ | २९ | उत्तस्थुषः सपदि पल्व | ९ | ५९ | | इत्थं क्षितीशेन वशी | २ | ६७ | उत्तिष्ठ वत्सेत्यमृता | २ | ६१ | | इत्थं गते गतघृणः | ९ | ८१ | उत्तिष्ठ वत्से ननु सानु | १४ | ६ | | इत्थं जनितरागासु | १७ | ४४ | उत्थापितः संयति रेणु | ७ | ३९ | | इत्थं द्विजेन द्विजराजं | ५ | २३ | उदकप्रस्थे स्थिरधीः | १५ | ९८ | | इत्थं नागस्त्रिभुवनगु | १६ | ८८ | उदधेरिव रत्नानि | १० | ३० | | इत्थं प्रयुज्याशिषम | ५ | ३५ | उदयमस्तमयं च | ९ | ९ | | इत्थं व्रतं धारयतः | २ | २५ | उदये मदवाच्यमुज्झ | ८ | ८४ | | इत्यध्वनः कैश्चिदहोभि | १६ | ३५ | उदायुधानापततस्तो | १२ | ४४ | | इत्यपास्तमखविघ्नयो | ११ | ३० | उद्बन्वकेशश्च्युतपत्र | १६ | ६७ | | इत्यर्घ्यपात्रानुमित | ५ | १२ | उद्गच्छमाना गमनाय | १६ | २९ | | इत्याप्तवचनाद्रामो | १५ | ४८ | उद्यतैकभुजयष्टिमा | ११ | १७ | | इत्या प्रसादादस्यास्त्वं | १ | ९१ | उन्नाभ इत्युद्गतनाम | १८ | २० | | इत्यारोपितपुत्रास्ते | १५ | ९१ | उन्मुखः सपदि लक्ष्मणा | ११ | २६ |

६४६ | रघुवंशमहाकाव्ये

| सर्गे | श्लोकः | | सर्गे | श्लोकः | | :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: | | उपकूलं स कालिन्द्याः पु | १५ | २८ | | | | | उपगतोऽपि च मण्डल | ९ | १५ | एकातपत्रं जगतः | २ | ४७ | | उपचितावयवा शुचि | ९ | ४४ | एको दाशरथिः कामं या | १२ | ४५ | | उपपन्नं ननु शिवं | १ | ६० | एतद्गिरेर्माल्यवतः | १३ | २६ | | उपययौ तनुतां मधु | ९ | ३८ | एतन्मुनेर्मानिनि शात | १३ | ६८ | | उपशल्यनिविष्टैस्तैश्च | १५ | ६० | एताः करोत्पीडितवारि | १६ | ६६ | | उपस्थितविमानेन ते | १५ | १०० | एता गुरुश्रोणिपयोधर | १६ | ६० | | उपस्थितां पूर्वमपास्य | १४ | ६३ | एतावदुक्तवति दाश | १३ | ६८ | | उपहितं शिशिरादग | ९ | ३१ | एतावदुक्त्वा प्रतिया | ५ | १८ | | उपात्तविद्यं विधिव | ५ | ३८ | एतावदुक्त्वा विरते | २ | ५१ | | उपान्तयोर्निष्कुषितं वि | ७ | ५० | एते वयं सैकतभिन्न | १३ | १७ | | उपान्तवानीरवनोप | १३ | ३० | एवं तयोक्ते तमवेक्ष्य | ६ | २५ | | उपेत्य मुनिवेषोऽथ कालः | १५ | ९२ | एवं तयोरध्वनि | ५ | ६० | | उपेत्य सा दोहददुःख | ३ | ६ | एवमात्तरतिरात्मसं | ११ | ५७ | | उभयमेव वदन्ति | ९ | ३ | एवमाप्तवचनात्स | ११ | ४२ | | उभयोरपि पार्श्ववर्ति | ८ | २९ | एवमिन्द्रियसुखानि | १९ | ४७ | | उभयोर्न तथा लोकः | १५ | ६८ | एवमुक्तवति भीमदर्शने | ११ | ७९ | | उभावुभाभ्यां प्रणतौ | १४ | २ | एवमुक्ते तया साध्व्या | १५ | ८२ | | उमावृषाङ्कौ शरज | ३ | २३ | एवमुद्यन्प्रभावेण शास्त्र | १७ | ७७ | | उरस्यपर्याप्तनिवेश | १८ | ४७ | एषा त्वया पेशलमध्यया | १३ | ३४ | | उवाच धात्र्या प्रथमोदि | ३ | २५ | एषा प्रसन्नस्तिमित | १३ | ४८ | | उषसि स गजयूथक | ९ | ७१ | एषोऽक्षमालावलयं | १३ | ४३ | | | | | | | | | ऋत्विजः स तथानर्घ्य दक्षि | १७ | ८० | ऐन्द्रमस्त्रमुपादाय | १५ | २२ | | ऋूढापर्णं राजपथं स | १४ | ३० | ऐन्द्रिः किल नखैस्तस्या | १२ | २२ | | ऋषिदेवगणस्वधाभु | ८ | ३० | ऐरावतास्फालनविशल | ६ | ७३ | | ऋषीन्विसृज्य यज्ञान्ते | १५ | ८६ | | | | | ऋष्यशृङ्गादयस्तस्य | १० | ४ | कण्ठसक्तमृदुबाहु | १९ | २९ | | | | | कण्डूयमानेन कटं | २ | ३७ |

श्लोकानुक्रमणिका ६४७

श्लोकसर्गेश्लोकःश्लोकसर्गेश्लोकः
कथं नु शक्योऽनुनयो५४किंतु वध्वां तवैत६५
कराभिघातोत्थितकन्दु१६८३किमत्र चित्रं यदि का३३
करेण वातायनलम्बि१३२१किमप्यहिंस्यस्तव५७
कलत्रनिन्दागुरुणा१४३३किमात्मनिर्वादकथामु१४३४
कलत्रवन्तमात्मान३२किवा तवात्यन्तवियोग१४६५
कलत्रवाहं वाले कनी१२३४कुमारभृत्याकुशलैरनु१२
कलमन्यभृतासु भाषितं५९कुमाराः कृतसंस्कारा१०७८
कल्याणबुद्धेरथवा१४६२कुम्भकर्णः कपीन्द्रेण१२८०
कश्चित्कराभ्यामुपगूढ१३कुम्भपूरणभवः पटु७३
कश्चिद्द्विषत्खड्गहृतो५१कुम्भयोनिरलंकारं१२५५
कश्चिद्यथाभागमवस्थि१९कुरुष्व तावत्करभो१३१८
कातरोऽसि यदि वोद्गता११७८कुलेन कान्त्या वयसा न७९
कातर्यं केवला नीतिः१७४७कुशावतीं श्रोत्रियसात्स१६२५
का त्वं शुभे कस्य परिग्र१६कुशेशयाताम्रतलेन१८
काप्यभिख्या तयोरासी४६कुसुमं कृतदोहदस्तव६२
कामं कर्णान्तविश्रान्ते१३कुसुमजन्म ततो नव२६
कामं जीवति मे नाथ१२७५कुसुममेव न केवल२८
कामं न सोऽकल्पत पैतृ१८४०कुसुमान्यपि गात्रसंग४४
कामं नृपाः सन्तु सहस्र२२कुसुमग्रंथितामपार्थि३४
कामं प्रकृतिवैराग्यं स१७५५कुसुमोत्खचितान्वलीभृ५३
कामरूपेश्वरस्तस्य८४कूटयुद्धविधिज्ञेऽपि न१७६९
कामिनीसहचरस्य कामि१९कृच्छ्रलब्धमपि लब्ध११
काम्बोजाः समरे सोढुं६९कृतदण्डः स्वयं राजा१५५३
कायेन वाचा मनसाकृतप्रतिकृतप्रीतंस्तयो१२९४
कार्तिकीषु सवितानह१९३९कृतः प्रयत्नो न च देव१६७६
कार्येषु चैककार्यत्वा१०४०कृतवत्यसि नावधीरणां४८
कार्ष्णेन पत्रिणा शत्रुः स१५२४कृतसीतापरित्यागः स१५
कालान्तरश्यामसुधेषु१६१८कृताञ्जलिस्तत्र यदम्ब१४१६
काषायपरिवीतेन१५७७कृताभिषेकैर्दिव्यायां१०६३

१४८ | रघुवंशमहाकाव्ये

श्लोकांशसर्गश्लोकःश्लोकांशसर्गश्लोकः
कृशानु रपधूमत्वा१०७४खर्जूरिस्कन्धनद्धानां५७
क्लृप्तपुष्पशयनांल्लता१९२३
केवलं स्मरणेनैव१०२९गन्धश्च धाराहतपल्व१३२७
कैकेय्यास्तनयो जज्ञे१०७०गरुडापातविश्लिष्टमेघ१२७६
कैलासगोरं वृष३५गर्भ दधत्यर्कमरीचयो१३
कोशेनाश्रयणीयत्वमि१७६०गृणवत्सुतरोपितश्रियः११
कौशिके न स किल क्षिती११गुणैराराधयमासु१०८५
कौसल्य इत्युत्तरकोस१८२७गुप्तं ददृशुरात्मानं१०६०
ऋतुषु तेन विसर्जित२०गुरोनियोगाद्वनितां१४५१
क्रथकौशिकवंशसंभ८२गुरोयियक्षोः कपिलेन१३
क्रमेण निस्तीर्य चगुरोः स चानन्तरमन्त१८१५
क्रियानिमित्तेष्वपिगुरोः सदारस्य निपी२३
क्रियाप्रबन्धादयमश्व२३गुर्वर्थमर्थी श्रुतपार२४
क्रीडापतत्रिणोऽप्यस्य१७२०गृहिणी सचिवः सखी मिथः६७
क्रोशाधं प्रकृतिपुरःसरेण१३७९गृहीतप्रतिमुक्तस्य४३
क्लेशावहा भर्तुरलक्ष१४गेये को नु विनेता वा१५६९
क्वचिच्च कृष्णोरगभूषणेव१३५७गौरवाद्यदपि जातु१९
क्वचित्खगानां प्रियमान१३५५ग्रथितमोलिरसौ वन५१
क्वचित्पथा संचरते१३१९ग्रामेष्वात्मविसृष्टेषु४४
क्वचित्प्रभा चान्द्रमसी१३५६
क्वचित्प्रभालेपिभिरिन्द्र१३५४घ्राणकान्तमधुगन्ध१९११
क्व सूर्यप्रभवो वंशः
क्षणमात्रसखीं सुजात३७चकम्पे तीर्णलौहित्ये८१
क्षतात्किल त्रायत५३चतुर्भुजांशप्रभवः स१६
क्षत्रजातमपकारवरि११७१चतुर्वर्गफलं ज्ञानं१०२२
क्षत्रियान्तकरणोऽपि११७५चन्दनेनाङ्गरागं च मृग१७२४
क्षितिरिन्दुमती च भामिनी२८चमरान्परितः प्रवर्ति६६
चरणयोर्नखरागस१३
खनिभिः सुषुवे रत्नं क्षेत्रैः१७६६चरतः किल दुश्चरं७९

श्लोकानुक्रमणिका

६४९

श्लोक-प्रतीकसर्गश्लोक:श्लोक-प्रतीकसर्गश्लोक:
चारुनृत्यविगमे च१९१५ज्याघातरेखे सुभुजो५५
चित्रकूटवनस्थं च कथि१२१५ज्यानिनादमथ गृह्णती१११५
चित्रद्विपाः पद्मवनाव१६१६ज्याबन्धनिष्पन्दभुजेन४०
चुम्बने विपरिवर्तिता१९२७ज्येष्ठाभिगमनात्पूर्वं ते१२३५
चूर्णबभ्रु लुलितस्रगा१९२५
तं रागबन्धेष्ववितृप्तमे१८१९
छाया-मण्डललक्ष्येणतं राजवीध्यामधिहस्ति१८३९
छायाविनीताध्वपरिश्र१३४६तं वाहनादवनतोत्त६०
तं विनिष्पिष्य काकुत्स्थो१२३०
जगाद चैनामयमङ्ग२७तं विस्मंतं धेनुरुवाच६२
जगृहुस्तस्य चित्तज्ञाः१५९९तं वेधा विदधे नूनं२९
जनपदे न गदः पदतं शरैः प्रतिजग्राह खर१२४७
जनस्य तस्मिन्समये वि१६५३तं श्लाघ्यसम्बन्धमसी४०
जनस्य साकेतनिवा३१तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति१०
जनाय शुद्धान्तचरा१६तं कर्णभूषणनिपी६५
जनास्तदालोकपथात्प्र१५७८तं कर्णमूलमागत्य रामे१२
जयश्रियः संवननं१६७४तं कृतप्रणतयोऽनुजीवि१९
जलानि वा तीरनिखात१३६१तं कृपामृदुरवेक्ष्य११८३
जहार चान्येन मयूर५६तं गृहोपवन एव संग१९५४
जातः कुले तस्य किलोरु७४तच्चात्मचिन्तासुलभं वि१४२०
जात्यस्तेनाभिजातेन१७तच्चोदितश्च तमनु७७
जाने विसृष्टां प्रणिधान१४७२ततः कक्ष्यान्तरन्यस्तं१७२१
जाने वो रक्षसाक्रान्ता१०३८ततः परं वज्रधरप्रभाव१८२१
जालान्तरप्रेषितदृष्टिततः परं तत्प्रभवः१८३४
जिगमिषुर्घनदाघ्युषि२५ततः परं तेन मखाय३९
जुगुहू तस्याः पथि१४४९ततः परं दुःप्रसहं३१
जुगोपात्मानमत्र२१ततः परमभिव्यक्त१७४०
जेतारं लोकपालानां१२८९ततः प्रकोष्ठे हरिचन्द५९
ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ२२ततः प्रजानां चिरमात्म३५

६५० रघुवंशमहाकाव्ये

सर्गेश्लोकःसर्गेश्लोकः
ततः प्रतस्थे कौवेरीं६६तत्र सेकहृतलोचनाञ्जनं१११०
ततः प्रहस्यापभयः५१तत्र सौधगतः पश्यन्य१५३०
ततः प्रियोपात्तरसेऽधरो६३तत्र स्वयंवरसमा६४
ततः स कृत्वा धनुरत१६७७तत्र हूणावरोधानां६८
ततः सपर्यां सपशूपहा१६३९तत्राक्षोभ्यं यशोराशि८०
ततः समाजापयदाशु१६७६तत्र भिषकप्रयता१४८२
ततः समानीय न मानि६४तत्राचितो भोजपतेः२०
ततः सुनन्दावचना८०तत्रेश्वरेण जगतां१३७७
ततस्तदालोकनतत्पतत्रैनं हेमककुम्भेषु१७१०
ततो गौरीगुरुं शैल७१तथा गतायां परिहास८२
ततो धनुष्कर्षणमूढ६२तथापि शास्त्रव्यवहार६२
ततो भिषङ्गादसमग्र६४तथेति कामं प्रतिशुश्रुवा६७
ततो नृपाणां श्रुतवृत्त२०तथेति गामुक्तवते५९
ततो नृपेणानुगताः स्त्रियः१६६९तथेति तस्याः प्रणयं१६२३
ततो बिभेद पौलस्त्यः१२७७तथेति तस्याः प्रतिगृह्य१४६८
ततोऽभिषङ्गानिलविप्र१४५४तथेति तस्यावितथं२६
ततो मृगेन्द्रस्य मृगे३०तथेति प्रतिजग्राह९२
ततो यथावद्विहिता१९तथेति प्रतिपन्नाय१५९३
ततोऽवतीर्यांशु करेणु१७तथेत्युपस्पृश्य पयः५९
ततो वेलातटेनैव४४तथैव सुग्रीवबिभीष१४१७
ततद्भूमिपतिः पत्न्यै४७तदङ्गनिष्यन्दजलेन४१
तत्प्रतीपपवनादिवैकृ११६२तदङ्गमग्र्यं मघवन्म४६
तत्प्रसुप्तभुजगेन्द्रभी११४४तदञ्जनकलेदसमाकु२७
तत्प्रार्थितं जवनवाजि५६तदद्भुतं संसदि रात्रि१६२४
तत्र जन्यं रघोर्घोरं७७तदपोहितुमर्हसि प्रिये५४
तत्र तीर्थसलिलेन१९तदन्यतस्तावदन१७
तत्र दीक्षितमृषि ररक्ष११२४तदन्वये शुद्धिमति९२
तत्र नागफणोत्क्षिप्तसि१५८३तदर्हसीमां वसतिं१६२२
तत्र यावधिपती मख११२७तदलं तदपायचिन्त८३

श्लोकानुक्रमणिका ६५१

सर्गश्लोकःसर्गश्लोकः
तदात्मसंभवं राज्ये१७तमर्चयित्वा विधि
तदाननं मृत्सुरभितमलभन्त पतिं पति१७
तदाप्रभृत्येव वन३८तमशक्यमपाक्रष्टुं नि१२१७
तदीयमाक्रन्दितमा२८तमश्रु नेत्रावरणं प्रमृज्य१४७१
तदेतदाजानुविलम्बि१६८४तमातिथ्यक्रियाशान्त५८
तदेष सर्गः करुणाद्रं१४४२तमात्मसंपन्नमनिन्दि१८१८
तद्गतिं मतिमतां वरे११८७तदादौ कुलविद्यानाम१७
तद्गीतश्रवणैकाग्रा१५६६तमाधूतध्वजपटं व्यो१२८५
तद्रक्ष कल्याणपरं५०तमापतन्तं नृपते५०
तद्व्योम्नि शतधा भिन्नं१२९८तमार्यगृह्यं निगृहीत३३
तनुत्यजां वर्मभृतां४८तमाहितौत्सुक्यमद७३
तनुलतांविनिवेशित५२तमीशः कामरूपाणा८३
तं तस्थिवांसं नगरोप६१तमुद्वहन्तं पथि भोज३५
तं दधन्मैथिलीकण्ठनि१५५६तमुपाद्रवदुद्यम्य दक्षि१५२३
तं धूपाश्यानकेशान्तं१७२२तमृषिः पूजयामास१५१२
तन्मदीयमिदमायुधं११७७तं पयोधरनिषिक्तच१९४५
तं न्यमन्त्रयत संभृत११३२तं पितुर्वधभवेन म११६७
तपस्यानधिकारित्वात्प्र१५५१तं प्रमत्तमपि न प्रभाव१९४८
तपस्विवेषक्रिययापि१४तं प्राप्य सर्वावयवान६९
तपस्विसंसर्गविनीत१४७५तं प्रीतिविशदैर्र्नेत्रैरन्व१७३५
तपोरक्षन्स विघ्नेभ्यस्त१७६५तं भावार्थं प्रसवसमया१९५७
तमङ्कमारोप्य शरीर२६तं भूपतिर्भासुरहे३०
तमध्वराय मुक्ताश्वं१५५८तया स्रजा मङ्गलपुष्प८४
तमध्वरे विश्वजितितया हीनं विधातर्मा७०
तमपहाय ककुत्स्थकुलो१६तयोर्दिवस्पतेरासीदेकः१७
तमब्रवीत्सा गुरुणा नव१६तयोरपाङ्गप्रतिसारि२३
तमभ्यनन्दत्प्रथमं प्र६८तयोरुपान्तस्थितसिद्ध५७
तमभ्यनन्दत्प्रणतं स१५४०तयोर्जगृहतुः पादा५७
तमरण्यसमाश्रयोन्मुखं१२तयोर्यथाप्रार्थितमिन्द्रि१४२५

६५२ रघुवंशमहाकाव्ये

प्रतीकसर्गेश्लोकःप्रतीकसर्गेश्लोकः
तयोश्चतुर्दशैकैन१२तस्य कर्कशविहारसं६८
तयोस्तस्मिन्नवीभूत१२५६तस्य कल्पितपुरस्क्रिया११५१
तद्वल्गुना युगपदु६८तस्य जातु मरुतः प्रती११५८
तव निःश्वसितानुकारि६४तस्य दाक्षिण्यरूढेन३१
तव मन्त्रकृतो मन्त्रै६१तस्य द्विपानां मदवारि१६३०
तवार्हतो नाभिगमे११तस्य निर्दयरतिश्रमाल१९३२
तवाधरस्पर्धिषु विद्रु१३१३तस्य पाण्डुवदनाल्पभू१९५०
तवोरुकीर्तिः श्वशुरः१४७४तस्य पूर्वोदितां निन्दां१५५७
तस्मात्पुरःसरबिभीष१६६९तस्य प्रभानिर्जितपुष्प१७३२
तस्मात्समुद्रादिव मध्य१६७९तस्य प्रयातस्य वरूथि१६२८
तस्मादघः किंचिदिवाव१८४१तस्य प्रसह्य हृदयं कि९३
तस्मिन्कुलापीडनिभे१८२९.तस्य मार्गवशादेका१५११
तस्मिन्क्षणे पालयितुः६०तस्य संवृतमन्त्रस्य२०
तस्मिन्गते द्यां सुकृतो१८२२तस्य सन्मन्त्रपूताभिः१७१६
तस्मिन्गते विजयिनं११९२तस्य संस्तूयमानस्य च१५२७
तस्मिन्नभिद्योतितबन्धु३६तस्य सावरणदृष्टसंधयः१९१६
तस्मिन्नवसरे देवाः१०तस्य स्तनप्रणयिभिर्मु५५
तस्मिन्नात्मचतुर्भागे१५९६तस्य स्फुरति पौलस्त्यः१२९०
तस्मिन्नास्थदिषीकास्त्रं१२२३तस्य वीक्ष्य ललितं वपुः११३८
तस्मिन्प्रयाते परलोक१८१६तस्यां रघोः सूनुरुपस्थि६८
तस्मिन्न्रामशरोत्कृत्ते१२४९तस्याः खुरन्यासपवित्र
तस्मिन्समावेशितचित्त७०तस्याधिकारपुरुषैः६३
तस्मिन्ह्रदः संहितमात्र१६७८तस्यानलोजास्तनयस्त१८
तस्मिन्विधानातिशये११तस्यानीकैर्विसर्पद्भि५३
तस्मै कुशलसंप्रश्न१०३४तस्मान्मुच्ये यथा तात७२
तस्मै निशाचरैश्वर्यं१२६९तस्यान्वये भूपतिरेष४१
तस्मै विसृज्योत्तरकोस१८तस्यापनोदाय फलप्र१४३९
तस्मै सभ्याः सभायाय५५तस्यापरेष्वपि मृगेषु५८
तस्मै सम्यग्घुतो वह्नि२५तस्याः प्रसन्नेन्दुमुखः..६८

श्लोकानुक्रमणिका

६५३

श्लोकसर्गश्लोकःश्लोकसर्गश्लोकः
तस्याः प्रतिद्वन्द्विभवाद्दि६८तां देवतापित्नतिथि१६
तस्याः प्रकामं प्रियदर्श४४तान्हत्वा गजकुलबद्ध६५
तस्याभवत्सूनुरुदार१८१७तां प्रत्यभिव्यक्तमनोर१२
तस्याभिषेकसंभारं१२ताभ्यस्तथाविधान्स्ना१०६४
तस्यामात्मानुरूपा३३ताभिर्गर्भः प्रजामूत्यै१०५८
तस्यामेवास्य यामिन्याम्१५१३तामग्रतस्तारमरसान्त३७
तस्यामन्तर्हितसौधमा१३४०तामङ्कमारोप्य कृशाङ्ग१४२७
तस्यालमेषा क्षुधितस्य३९तामन्तिकन्यस्तबलि२४
तस्यावसाने हरिदश्वधा१८२३तामभ्यगच्छद्रुदितानु१४७०
तस्याः स रक्षार्थमनल्प३६तामर्पयामास च शोक१४८०
तस्याः स राजोपपदं१६४०तामेकभार्यां परिवाद१४८६
तस्यास्तथाविधनरेन्द्र१९५६तां पुण्यदर्शनां दृष्ट्वा८६
तस्याः स्पृष्टे मनुजपति१६८७ताम्बूलीनां दलैस्तत्र४२
तस्यैकनागस्य कपोल४७ताम्बूलवल्लीपरिणद्ध६४
तस्यैकस्योच्छ्रितं छत्रं१७३३ताम्रपर्णीसमेतस्य५०
तस्यै प्रतिश्रुत्य रघुप्र१४२९ताम्रोदरेषु पतितं७०
तस्यै भर्तुरभिज्ञानमङ्गु१२६२ता राघवं दृष्टिभिरापि१२
तस्योत्सृष्टनिवासेषु७६तावत्प्रकीर्णाभिनवोप
तस्योदये चतुर्मूर्तेः१०७३तावुभावपि परस्पर११८२
तस्योपकार्यारचिती४१तासां मुखैरासवगन्ध११
तस्योधमहती मूर्ध्नि१७१४तासु श्रिया राजपरम्प
तं स्वसा नागराज्यस्य१७ताः स्वचारित्रमुद्दिश्य१५७३
तां शिल्पिसंघाः प्रभुणा१६३८ताः स्वमङ्कमधिरोप्य दो१९४४
तां सैव वेत्रग्रहणे२६तिस्रस्त्रिलोकप्रथितेन३३
ता इङ्गुदीस्नेहकृतप्र१४८१तीरस्थली बर्हिभिरुक्त१६६४
तात शुद्धा समक्षं नः स्नुषा१५७२तीर्थे तदीये गजसेतुब१६३३
ता नराधिपसुता नृपा११५६तीर्थे तोयव्यतिकरभ९५
तां तामवस्थां प्रतिपद्य१३तीव्रवेगधुतमार्गवृ१११६
तां दृष्टिविषये भर्तुर्मु१५७९ते चतुर्थसहितास्त्रयो११५५

६५४ रघुवंशमहाकाव्ये

सर्गेश्लोकःसर्गेश्लोकः
ते च प्रापुरुदन्वन्तं१०तैः शिवेषु वसतिर्गता११३३
तेजसः सपदि राशिर्११६३तौ दंपती बहु विलप्य७८
ते तस्य कल्पयामा१७तौ निदेशकरणोद्यतौ११
तेन कार्मुकनिषक्तमु११७०तौ पितुर्नयनजेन वारि११
तेन दूतिविदितं निषे१९१८तौ प्रणामचलकाकपक्ष११३१
तेन द्विपानामिव पुण्य१८तौ बलातिबलयोः प्रभा११
तेन भूमिनिहितैकको११८१तौ समेत्य समये स्थिता११५३
तेन मन्त्रप्रयुक्तेन नि१२९९तौ सरांसि रसविद्गिर११११
तेनातपत्रामलमण्डले१६२७तौ सीतान्वेषिणौ गृध्रं१२५४
तेनाभिघातरभसस्य३१तौ सुकेतुसुतया खिली१११४
तेनावरोधप्रमदास१६७१तौ स्नातकर्बन्धुमता च२८
तेनार्थवांल्लोभपराङ्मु१४२३तौ विदेहनगरीनिवासि११३६
तेनावतीर्य तुरगात्प्र७६त्यजत मानमलं बत४७
तेनाष्टौ परिगमिताः९२त्यागाय संभृतार्थानां
तेनोत्तीर्य पथा लङ्कां११७१त्याजितः फलमुत्खातं३३
तेनोरुवीर्येण पिता प्रजायै१८त्रस्तेन तार्क्ष्यात्किल कालिये४९
ते पुत्रयोनैर्ऋतशस्त्र१४त्रिदिवोत्सुकयाप्यवेक्ष्य६०
ते प्रजानां प्रजानाथा१०८३त्रिलोकनाथेन सदा म४५
ते प्रीतमनसस्तस्मै या१७१८त्रेताग्निधूमाग्रमनिन्द्य१३३७
ते बहुज्ञस्य चित्तज्ञं१०५६त्रैलोक्यनाथप्रभवं प्र१६८१
ते रामाय वधोपायामा१५त्वं रक्षसा भीरु यतोऽप१३२४
ते रेखाध्वजकुलिशा८८त्वचं स मेध्यां परिधाय३१
ते सेतुवार्तागजवन्धमु१६त्वया पुरस्तादुपयाचि१३५३
तेऽस्य मुक्तागुणोन्नद्धं१७२३त्वयैवं चिन्त्यमानस्य६४
तेषां सदश्वभूयिष्ठा७०त्वय्यावेशितचित्तानां१०२७
तेषा द्वयोर्द्वयोरवयं१०८२
तेषां महार्हासनसंस्थिदक्षिणेन पवनेन सं१९४३
तैः कृतप्रकृतिमुख्यसं१९५५दधतो मङ्गलक्षोमे वसा१२
तैस्त्रयाणां शितैर्वाणैयं१२४८दयितां यदि तावदन्व्५०

श्लोकानुक्रमणिका

६५५

श्लोकःसर्गेश्लोकःश्लोकःसर्गेश्लोकः
दर्पणेपु परिभोगदर्शि१९२८द्वेष्योऽपि संमतः शिष्ट२८
दशदिगन्तजिता रघु
दशरश्मिशतोपमद्यु२९धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रं११
दशाननकिरीटेभ्य१०७५धरायां तस्य संरम्भं१५८५
दिगभ्यो निमन्त्रिताश्चैनम१५५९धर्मलोपभयाद्राज्ञी७६
दिन दिने शैवलवन्त्य१६४६धातारं तपसा प्रीतं१०४३
दिनेषु गच्छत्सु नितान्तधारास्वनोद्गारिदरीमु१३४७
दिलीपसूनोः स बृह५४धियः समग्रैः स गुणैरु३०
दिलीपानन्तरं राज्येघमधूमो वसागन्धी१५१६
दिवं मरुत्वानिव भोधूमादग्नेः शिखाः पश्चादु१७३४
दिशः प्रसेदुर्मरुतो ववुः१४धृतिरस्तमिता रतिश्च्यु६६
दिशि मन्दायते तेजो४९ध्रुवमस्मि शठः शुचिस्मिते४९
दिष्टान्तमाप्स्यति भवान७९ध्वजपटं मदनस्य धनु४५
दीर्घेष्वमी नियमिताः७३
दुकूलवासाः स वधूस१९न किलानुययुस्तस्य२७
दुदोह गां स यज्ञाय२६न कृपणा प्रभवत्यपि
दुरितदर्शनेन ध्वंस्त१७७४न केवलं गच्छति तस्य१८४९
दुरितैरपि कर्तुमात्मन खरो न च भूयसा
दुर्गाणि दुर्ग्रहाण्यासंस्त१७५२न चावदद्भर्तुरवर्णं१४५७
दुर्जातिबन्धुरयमृक्ष१३७२न चोपलेभे पूर्वैषा१०
दूरादयश्चक्रनिभस्य१३१५न तस्य मण्डले राज्ञो१७५८
दूरापवर्जितच्छत्रैस्तस्या१७७९नदत्सु तूर्येष्वविभाव्य३८
दूर्वायवाङ्कुरप्लक्षकत्व१७१२नदद्भिः स्निग्धगम्भीरं१७११
दृढभक्तिरिति ज्येष्ठे१२१९न धर्ममर्थकामाभ्यां व१७५७
दृष्टदोषमपि तन्न१९४९न नवः प्रभुता फलोदया२२
दृष्टसारमथ रुद्रका११४७न पृथग्जनवच्छुचो व९०
दृष्टा विचिन्वता तेन१२६१न प्रसेहे स रुद्धार्कं८२
दैत्यस्त्रीगण्डलेखानां१०१२न प्रहर्तुमलमस्मि निर्द११८४
द्विषां विपह्य काकुत्स्थ४१नभश्चरैर्गीतयशाः स ले१८

६५६ | रघुवंशमहाकाव्ये


पाद / श्लोकसर्गेश्लोकःपाद / श्लोकसर्गेश्लोकः
न मृगयाभिरतिर्न दुनिर्वाप्य प्रियसंदेशैः१२६३
न मे ह्रिया शंसति किंनिर्विष्टविषयस्नेहः स१२
नमो विश्वसृजे पूर्वं१०१६निर्वृत्तजाम्बूनदपट्ट१८४४
नयगुणोपचितामिव२७निर्वृष्टलघुभिर्मेघै१५
नयविद्भिरनंवे राज्ञि१०निवर्त्य राजा दयितां
नरेन्द्रमूलायतनाद३६निवृते स महार्णव१४
नवपल्लवसंस्तरेऽपि५७निवातपद्मस्तिमिते१७
नवेन्दुना तन्नभसोपमे१८३७निविष्टमुदधेः कूले तं१२६८
न संयतस्तस्य बभूव२०निवेश्य वामं भुजमास१६
नातिपर्याप्तमालक्ष्य म१५१८निशम्य देवानुचर५२
नाभिप्ररूढाम्बुरुहास१३निशाचरोपप्लुतभर्तृका१४६४
नाम राम इति तुल्यम११६८निशासु भास्वत्कलनूपु१६१२
नाम वल्लभजनस्य ते१९२४निःशेषविक्षालितधा४४
नाम्भसां कमलशोभिनां१११२निसर्गभिन्नास्पदमक२९
निगृह्य शोकं स्वयमेव१४८५नीपान्वयः पार्थिव एष४६
निग्रहात्समुराप्तानां व१२५२नीवारपाकादि कडंग
निश्चित्य चानन्यनिवृत्ति१४३५नूनं मत्तः परं वंश्याः६६
नितम्बगुर्वी गुरुणा२५नृत्यं मयूराः कुसुमानि१४६९
निद्रावशेन भवता६७नृपतिः प्रकृतीरवेक्षि१८
निधानगर्भामिव सानृपतेः प्रतिषिद्धमेव७४
नियुज्य तं होमतुरंग३८नृपतेर्व्यजनादिभिस्त४०
निर्घातोयैः कुञ्जलीनाञ्जि६४नृपं तमावर्तमनोज्ञ५२
निर्दिष्टां कुलपतिना स९५नृपस्य वर्णाश्रमपाल१४६७
निर्दोषमभवत्सवं१०७२नेत्रव्रजाः पौरजनस्य
निर्बन्धपृष्ठः स जगाद१४३२नेपथ्यदर्शनिष्ठछाया त१७२६
निर्बन्धसंजात रुषा२१नैर्ऋतघ्नमथ मन्त्रव११२१
निर्यायावथ पौलस्त्यः पु१२८३न्यस्ताक्षरामक्षरभूमि१८४६
निर्वर्त्यते यंनियमा
निर्वर्त्यैवं दशमुखशि१५१०३पक्षच्छिदा गोत्रभिदात१३

श्लोकानुक्रमणिका

| सर्गे | श्लोकः | | सर्गे | श्लोकः | | :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: | | पञ्चमं लोकपालानाभूचुः | १७ | ७८ | पारसीकांस्ततो जेतुं | ४ | ६० | | पञ्चवट्यां ततो रामः | १२ | ३१ | पार्थिवीमुदवहद्रघु | ११ | ५४ | | पञ्चानामपि भूतानां | ४ | ११ | पिता पितृणामनृणस्तम | १८ | २६ | | पणबन्धमुखान्गुणान् | ८ | २१ | पिता समाराधनतत्परे | १८ | ११ | | पतिरङ्कनिषण्णया | ८ | ४२ | पितुः प्रयत्नात्स समग्र | ३ | २२ | | पत्तिः पदातिं रथिनं | ७ | ३७ | पितुरनन्तरमुत्तर | ९ | १ | | पयोघटैराश्रमबाल | १४ | ७८ | पितुर्नियोगाद्वनवास | १४ | २१ | | पयोधरैः पुण्यजनाङ्ग | १३ | ६० | पित्रा दत्तां रुदन्न्रामः | १२ | ७ | | परकर्मापहः सोऽभूद | १७ | ६१ | पित्रा विसृष्टां मदपेक्ष | १३ | ६७ | | परस्पराक्षिसादृश्य | १ | ४० | पित्रा संवर्धितो नित्यं | १७ | ६२ | | परस्पराभ्युक्षणतत्प | १६ | ५७ | पित्र्यमंशमुपवीतल | ११ | ६४ | | परस्परा विरुद्धास्ते | १० | ८० | पुण्डरीकातपत्रस्तं | ४ | १७ | | परस्परेण क्षतयोः | ७ | ५३ | पुत्रजन्मप्रवेश्यानां | १० | ७६ | | परस्परेण विज्ञात | ४ | ७९ | पुत्रो रघुस्तस्य पदं | ६ | ७६ | | परस्परेण स्पृहणीय | ७ | १४ | पुरंदरश्रीः पुरमु | २ | ७४ | | परात्मनोः परिच्छिद्य | १७ | ५९ | पुरं निषादाधिपते | १३ | ५९ | | पराभिसंधानपरं यद्य | १७ | ७६ | पुरस्कृता वर्त्मनि | २ | २० | | परार्ध्यवर्णस्तरणोप | ६ | ४ | पुराणस्य कवेस्तस्य | १० | ३६ | | परिकल्पितसांनिध्या | ४ | ६ | पुरा शक्रमुपस्थाय | १ | ७५ | | परिचयं चललक्ष्य | ९ | ४९ | पुरा स दर्भाङ्कुरमात्र | १३ | ३१ | | परेण भग्नेऽपि | ७ | ५५ | पुरुषस्य पदेष्वजन्मन् | ८ | ७८ | | परेषु स्वेषु च क्षिप्तैर | १७ | ५१ | पुरुषायुषजीविन्यो | १ | ६३ | | पर्णशालामथ क्षिप्रं | १२ | ४० | पुरूहूतध्वजस्येव | ४ | ३ | | पर्यन्तसंचारितचा | १८ | ४३ | पुरूहूतप्रभृतयः | १० | ४९ | | पवनस्यानुकूलत्वा | १ | ४२ | पुरोपकण्ठोपवना | ६ | ९ | | पश्यावरोधैः शतशो | १६ | ५८ | पुरोहितपुरोगास्तं जिष्णु | १७ | १३ | | पाण्ड्योऽयमंसार्पितलम्ब | ६ | ६० | पुष्पं फलं चार्तवमाह | १४ | ७७ | | पात्रीकृतात्मा गुरुसेव | १८ | ३० | पूर्वजन्मधनुषा समा | ११ | ८० | | पादपाविद्धपरिघः | १२ | ७३ | पूर्वं प्रहर्ता न जघान | ७ | ४७ |

४२ र० सम्पू०

१५८ | रघुवंशमहाकाव्ये

पादः / श्लोकःसर्गेश्लोकःपादः / श्लोकःसर्गेश्लोकः
पूर्ववृत्तकथितैः पुरा१११०प्रदक्षिणप्रक्रमणात्कृ२४
पूर्वस्तयोरात्मसमे१८१२प्रदक्षिणीकृत्य पय२१
पूर्वानुभूतं स्मरता च१३२८प्रदक्षिणीकृत्य हुतं७१
पृक्तस्तुषारैर्गिरिनि१३प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षं१०
पृथिवीं शासत्तस्तस्य१०प्रभानुलिप्तश्रीवत्सं१०१०
पृष्टनामान्वयो राज्ञा स१५५०प्रभावस्तम्भितच्छायमा१२२१
पौत्रः कुशस्यापि कुशेश१८प्रमदामनुसंस्थितः७२
पौरस्त्यानेवमाक्रामं३४प्रमन्यवः प्रागपि कोस३४
पौरेषु सोऽहं बहुलीभव१४३८प्रमुदितवरपक्षमेक८६
प्रजानामेव भूत्यर्थं१८प्रययावातिथेयेषु१२२५
प्रजानां विनयाधा२४प्रलोभिताप्याकृतिलोभ५८
प्रजावती दोहदशंसि१४४५प्रवृत्तमात्रेण पयांसि१३१४
प्रजास्तद्गुरुणा नद्यो१७४१प्रवृत्तावुपलब्धायां१२६०
प्रणिपत्य सुरास्तस्मै१०१५प्रवृद्धतापो दिवसोऽति१६४५
प्रतापोऽग्रे ततः शब्दः३०प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः स१७७१
प्रतिकृतिरचनाभ्यो१८५३प्रवेश्य चैनं पुरम६२
प्रतिजग्राह कालिङ्गस्त४०प्रशमस्थितपूर्वपार्थि१५
प्रतिप्रयातेषु तपोध१४१९प्रसन्नमुखरागं तं स्मित१७३१
प्रतिशुश्राव काकुत्स्यस्ते१५प्रसवैः सप्तपर्णानां२३
प्रतियोजयितव्यवल्ल४१प्रसादोदयादम्भः२१
प्रत्यक्षोऽप्यपरिच्छेद्यो१०२५प्रसादसुमुखे तस्मिंश्च१८
प्रत्यपद्यत चिराय११३४प्रसादाभिमुखे तस्मिंश्च१७४६
प्रत्यपद्यत तथेति११८८प्रसाधिकालम्बितमग्र
प्रत्यब्रवीच्चैनमिषु४२प्रस्थितायां प्रतिष्ठेथाः८९
प्रत्यभिज्ञानरत्नं च रामा१२६४प्रहारमूर्च्छापगमे४४
प्रत्युवाच तमृषिर्न त११८५प्राजापत्योपनीतं१०५२
प्रत्युवाच तमृषिर्निश११४१प्रातः प्रयाणाभिमुखाय२९
'प्रथमपरिगतार्थस्तं७१प्रातर्गत्य परिभोगशोभि१९२१
प्रथममन्यभृताभिरु३४प्रातर्यथोक्तव्रतपा७०

श्लोकानुक्रमणिका

५५९

श्लोकसर्गेश्लोकःश्लोकसर्गेश्लोकः
प्राप्तानुगः सपदि शास८२बिभ्रतोऽस्त्रमचलेऽप्यकु११७४
प्राप्य चाशु जनस्थानं१२४२बिभ्रत्या कौस्तुभन्यासं१०६२
प्रायः प्रतापभग्नत्वाद१७७०ब्राह्मे मुहूर्ते किल तस्य३६
प्रायो विषाणपरिमोक्ष६२
प्रासादकालागुरुधूम१४१२भक्तिः प्रतीक्ष्येषु कुलो१४
प्राहिणोच्च महितं महा११४९भक्त्या गुरौ मय्यनुक६३
प्रियतमाभिरसौ तिसृ१८भगवन्परवानयं जनः८१
प्रियंवदात्प्राप्तमसो६१भज्यमानमतिमात्रक११४६
प्रियानुरागस्य मनः स१०भयोत्सृष्टविभूषणां५४
प्रेक्ष्य दर्पणतलस्थमा१९३०भरतस्तत्र गन्धर्वान्यु१५८८
प्रेमगर्वितविपक्षमत्स१९२०भर्तापि तावत्क्रयकैशि३२
भर्तुः प्रणाशादथ शोच१४
फलमस्योपहासस्य१२३७भल्लापवर्जितैस्तेषां६३
भवति विरलभक्ति७४
बन्धच्छेदं स बद्धानां१७१९भवानपीदं परवा५६
बभूव रामः सहसा स१४८४भव्यमुख्याः समारम्भाः१७५३
बभौ तमनुगच्छन्ती वि१२२६भस्मसात्कृतवतः पितृ११८६
बभौ भूयः कुमारत्वादा१७३०भास्करश्च दिशमभ्युवा११६१
बभौ सदशनज्योत्स्ना१०३७भीमकान्तैर्नृपगुणैः१६
बलमार्तभयोपशान्त३१भुजमूधोरुबाहुल्यादे१२८८
बलिक्रियावर्जितसैकता१६२१भुवं कोष्णेन कुण्डोष्णी८४
बलैरध्युषितस्तस्य४६भूतानुकम्पा तव४८
बहुधाप्यागमर्भिन्नाः१०२६भूयस्ततो रघुपतिर्वि१३७६
बाढमेष दिवसेषु१९५२भूयस्तपोव्ययो मा भूदा१५३७
बाणभिन्नहृदया निपे१११९भूर्जेषु मर्मरीभूताः७३
बालार्कप्रतिमेवाप्सु१२१००भोगिभोगासनासीनं१०
बाहुप्रतिष्टम्भविदू३२भोगिवेष्टनमार्गेषु४८
बाहुभिर्विटपाकारै१०११भ्रमरैः कुसुमानुसारि३५
भूभेदमात्रेण पदान्म१३३६

६६० रघुवंशमहाकाव्ये

सर्गेश्लोकःसर्गेश्लोकः
मखांशभाजां प्रथमो४४मातलिस्तस्य माहेन्द्रमा१२८६
मणौ महानील इति प्रभा१८४२मातृवर्गचरणस्पृशी११
मतङ्गशापादवलेप५३मान्यः स मे स्थाव४४
मत्तेभरदनोत्कीर्ण५९मा भूदाश्रमपीडेति३७
मत्परं दुर्लभं मत्वा६६मार्गैषिणी सा कटकान्त१६३१
मत्स्यध्वजा वायुवशाद्वि४०मित्रकृत्यमपदिश्य१९३१
मदिराक्षि मदाननार्पि६८मिथुनं परिकल्पितं त्वया६१
मदोदग्राः ककुद्मन्तः२२मुक्तशेषविरोधेन१०१३
मनसापि न विप्रियं मया५२मुखार्पणेषु प्रकृतिप्र१३
मनुप्रभृतिभिर्मान्यैमुखावयवलूनां तां नै१२४३
मनुष्यवाह्यं चतुरस्र१०मुरलामारुतोद्धूत५५
मनोभिरामाः शृण्वन्तो३९मृगवनोपगमक्षम५०
मनोज्ञगन्धं सहकार१६५२मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनिर्व्य१३२५
मन्त्रः प्रतिदिनं तस्य१७५०मैथिलः सपदि सत्यसं११४८
मन्दः कवियशःप्रार्थीमैथिलस्य धनुरन्यपा११७२
मन्दोत्कण्ठाः कृतास्तेनमोक्ष्यध्वे स्वर्गवन्दीनां११४७
मयि तस्य सुवृत्त वर्त७७
मरणं प्रकृतिः शरीरिणां८७### य
मरुतां पश्यतां तस्य१४१०१यः कश्चन रघूणां हि१५
मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्स१०यच्चकार विवरं शिला१११८
मरुपृष्ठान्युदम्भांसि३१यतिपार्थिवलिङ्गधारि१६
मर्मरैरगुरुधूपगन्धि१९४१यत्कुम्भयोनेरधिगम्य१६७२
महार्हसिंहासनसंस्थितो१८यत्स लग्नसहकारमा१९४६
महिमानं यदुत्कीर्त्य१०३२यथा च वृत्तान्तमिमं स६६
महीं महेच्छः पारेकीर्य१८३३यथा प्रह्लादनाच्चन्द्रः१२
महेन्द्रमास्थाय महोक्ष७२यथाविधिहुताग्नीनां
महोक्षतां वत्सतरः३२यदात्थ राजन्यकुमार तं४८
मातंगनक्रैः सहसोत्स१३११यदुवाच न तन्मिथ्या१७४२
यदगोप्रतरकल्पोऽभूत्सं१५१०१
यन्ता हरेः सपदि संहृ१२१०३

श्लोकानुक्रमणिका

श्लोकःसर्गःश्लोकःश्लोकःसर्गःश्लोकः
यन्त्रप्रवाहैः शिशिरैः१६४९रघूणामन्वयं वक्ष्ये
यमात्मनः सद्यनि सनि५६रघोरवष्टम्भमयेन५३
यवनीमुखपद्मानां६१रजः कणैः खुरोद्धूतैः८५
यशोभिराब्रह्मसमं१८२८रजोभिः स्यन्दनोद्भूतै२९
यः सुबाहुरिति राक्षसो११२९रणः प्रववृते तत्र भीमः१२७२
यस्मिन्महीं शासति वाणि७५रतिस्मरो नूनमिमाव१५
यस्यात्मगेहे नयनाभि४७रतेर्गृहीतानु नयेन
यस्यावरोधस्तनचन्द४८रथाङ्गनाम्नोरिव भाव२४
यां सैकतोत्सङ्गसुखोचि१३६२रथात्स यन्त्रा निगृहीत१४५२
यासौ राज्यप्रकाशाभिर्व१५२९रथी निष्षङ्गी कवची५६
यावत्प्रतापनिविधरा७१रथो रथाङ्गध्वनिना४१
यावदादिशति पार्थिव११रसातलादादिभवेन१३
यावन्नाश्यायते वेदिर्भि१७३७रसान्तराण्येकरसं१०१७
युधाजितश्च संदेशात्स१५८७राघवान्वितमुपस्थितं११३५
युवां युगव्यायतबाहुं३४राघवास्त्रविदीर्णानां१२५१
यूपवत्यवसिते क्रिया११३७राघवोऽपि चरणौ तपो११८९
येनं रोषपरुषात्मनः११६५राघवो रथमप्राप्तां ना१२९६
योगनिद्रान्तविशदैः१०१४राजन्यप्रजासु ते कश्चिद१५४७
योषितामुडुपतेरिवा१९३४राजर्षिवंशस्य रविप्रसू१४३७
यौवनोन्नतविलासिनी१९राजसत्वमवधूय मातु११९०
राजापि तद्वियोगातंः१२१०
रक्षसा मृगरूपेण व१२५३रांत्रावनाविष्कृतदीपभा१६२०
रक्षोवघान्तो न च मे प्र१४४१रात्रिंदिवविभागेषु१७४९
रघुनाथोऽप्यगस्त्येन१५५४रात्रिर्गता मतिमतां६६
रघुपतिरपि जातवे१२१०४राम इत्यभिरामेण१०६७
रघुमेव निवृत्तयौवरामं पदातिमालोक्य१२८४
रघुरश्रुमुखस्य तस्य१३राममन्मथशरेण ता११२०
रघुर्भृ शं वक्षसि तेन६१रामस्तवासनदेशत्वाद्भू१२२४
रघुवंशप्रदीपेन१०६८रामस्य मधुरं वृत्तं१५३४

६६२ रघुवंशमहाकाव्ये

सर्गश्लोकःसर्गश्लोकः
रामाज्ञाया हरिचमूपत१३७४वचसैव तयोर्वाक्यम१२९२
रामादेशादनुगता सेना१५वत्सस्य होमार्थविधे६६
रामोऽपि सह वैदेह्या१२२०वत्सोत्सुकापि स्तिमि२२
रावणस्यापि रामास्तो१२९१वधनिर्धूतशापस्य१२५७
रावणावग्रहक्लान्त१०४८वधूर्भक्तिमती चैना९०
रावणावरजा तत्र राघ१२३२वनान्तरादुपावृत्तः४९
रुदता कुत एव सा८५वनेषु सायंतनमल्लि१६४७
रूपं तदोजस्वि तदे३७वन्यवृत्तिरिमां शश्व८८
रूपे गीते च माधुर्यं१५६५वपुषा करणोज्झितेन३८
रेखामात्रमपि१७वयसां पङ्क्तयः पेतुर्ह्रं१५२५
वयोरूपविभूतीनामे१७४३
लक्ष्मणः प्रथमं श्रुत्वा को१२३९वयोवेषविसंवादिरा१५६७
लक्ष्मणानुचरमेव११वर्जोदकैः काञ्चनशृङ्ग१६७०
लक्ष्यते स्म तदनन्तरं११५९वंशस्थितिं वंशकरेण१८३१
लक्ष्यीकृतस्य हरिणस्य५७वसिष्ठधेनोरनुया१९
लङ्केश्वरप्रणतिभङ्ग१३७८वसिष्ठमन्त्रोक्षणजा२७
लताप्रतानोद्ग्रथितैःवशी विवेश चायोध्यां१५३८
लब्धपालनविधौ न१९वशी सुतस्तस्य वशंव१८१३
लब्धप्रशमनस्वस्थ१४वसन्स तस्यां वसतौ१६४२
लब्धान्तरा सावरणेऽपि१६वसिष्ठस्य गुरोर्मन्त्राः सा१७३८
ललाटोदयमाभुग्नं८३वस्वोकसारामभिभूय१६१०
ललितविभ्रमबन्धवि३६वागर्थाविव संपृक्तौ
लवणेन विलुप्तेज्यास्ता१५वाङ्मनःकर्मभिः पत्यौ१५८१
लिङ्गैर्मुदः संवृतविक्रि३०वाच्यमत्वात्प्रणति१३४४
लोकान्तरसुखं पुण्यं६९वाच्यस्त्वया मद्वचनात्स१४६१
लोकेन भावी पितुरेव१८३८वापीष्विव स्रवन्तीषु१७६४
लौल्यमेत्य गृहिणी परि१९१९वामनाश्रमपदं ततः११२२
वामेतरस्तस्य करः३१
वङ्गानुत्खाय तरसा३६वार्षिकं संजहारेन्द्रो१६

श्लोकानुक्रमणिका ६६३

श्लोकःसर्गेश्लोकःश्लोकःसर्गेश्लोकः
विक्रमव्यतिहारेण सामा१२९३वीक्ष्य वेदिमथ रक्तवि११२५
विग्रहाच्चं शयने पराङ्मु१९३८वीचिलोलभुजयोस्तयो११
वितानसहितं तत्र भेजे१७२८वीरासनैर्ध्यानजुषामृ१३५२
विदितं तप्यमानं च१०३९वृक्षेशयायष्टिनिवासभ१६१४
विद्धि चात्तबलमोजसा११७६वृत्तं रामस्य वाल्मीकेः१५६४
विद्वानपि तयोर्द्वास्थ्यः१५९४वृन्ताच्छ्लथं हरति६९
विघ्नेरधिकसंभारस्ततः१५६२वेणुना दशनपीडिताध१९३५
विधेः सायन्तनस्यान्ते५६वेलानिलः केतकरेणु१३१६
विनयंन्ते स्म तद्योधा६५वेलानिलाय प्रसृताभु१३१२
विनाशात्तस्य वृक्षस्य१५२१वेश्मानि रामः परिवर्हं१४१५
विनीताध्वश्रमांस्त६७वैदर्भनिर्दिष्टमसो कु
विन्ध्यस्य संस्तम्भयिताम६१वैदेहि पश्यामलयादद्रि१३
विप्रोषितकुमारं तद्राज्यं१२११वैमानिकाः पुण्यकृत१०४६
विभक्तात्मा विभुस्तासा१०६५वैवस्वतो मनुर्नाम११
विभवेऽपि सति त्वया६९व्याघ्रानभीरभिमुखोत्प६३
विभावसुः सारथिनेव३७व्यादिदेश गणशोऽथ११४३
विभूषणप्रत्युपहारह१६८०व्यूढोरस्को वृषस्कन्धः१३
विरक्तसंध्याकपिशं१३६४व्यूहावुभौ तावितरेत५४
विरचिता मधुनोपव२९व्यूह्य स्थितः किंचिदिवोत्त१८५१
विलपन्निति कोसलाधि७०व्योमपश्चिमकला स्थिते१९५१
विललाप स बाष्पगद्गं४३व्रणगुरुप्रमदाधर३२
विलासिनीविभ्रमदन्त१७व्रताय तेनानुचरेण
विलुप्तमन्तःपुरसुन्द१६५९
विलोचनं दक्षिणमञ्जशक्येष्वेवाभवद्यात्रा१७५६
विशश्रमुर्नमेरूणां७४शङ्खस्वनाभिज्ञतया६४
विशीर्णतल्पाट्टशतोनि१६११शतैस्तमक्षणामनिमेष४३
विषादलुप्तप्रतिपत्ति४०शत्रुघातिनि शत्रुघ्नः१५३६
विसृष्टपार्श्वानुचरस्यशब्दादिनिर्विविश्य सुखं१८
विस्रस्तमसादपरो वि१४शब्दादीन्विषयान्भोक्तुं१०२५