रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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६५० रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| ततः प्रतस्थे कौवेरीं | ४ | ६६ | तत्र सेकहृतलोचनाञ्जनं | ११ | १० |
| ततः प्रहस्यापभयः | ३ | ५१ | तत्र सौधगतः पश्यन्य | १५ | ३० |
| ततः प्रियोपात्तरसेऽधरो | ७ | ६३ | तत्र स्वयंवरसमा | ५ | ६४ |
| ततः स कृत्वा धनुरत | १६ | ७७ | तत्र हूणावरोधानां | ४ | ६८ |
| ततः सपर्यां सपशूपहा | १६ | ३९ | तत्राक्षोभ्यं यशोराशि | ४ | ८० |
| ततः समाजापयदाशु | १६ | ७६ | तत्र भिषकप्रयता | १४ | ८२ |
| ततः समानीय न मानि | २ | ६४ | तत्राचितो भोजपतेः | ७ | २० |
| ततः सुनन्दावचना | ६ | ८० | तत्रेश्वरेण जगतां | १३ | ७७ |
| ततस्तदालोकनतत्प | ७ | ५ | तत्रैनं हेमककुम्भेषु | १७ | १० |
| ततो गौरीगुरुं शैल | ४ | ७१ | तथा गतायां परिहास | ६ | ८२ |
| ततो धनुष्कर्षणमूढ | ७ | ६२ | तथापि शास्त्रव्यवहार | ३ | ६२ |
| ततो भिषङ्गादसमग्र | ३ | ६४ | तथेति कामं प्रतिशुश्रुवा | ३ | ६७ |
| ततो नृपाणां श्रुतवृत्त | ६ | २० | तथेति गामुक्तवते | २ | ५९ |
| ततो नृपेणानुगताः स्त्रियः | १६ | ६९ | तथेति तस्याः प्रणयं | १६ | २३ |
| ततो बिभेद पौलस्त्यः | १२ | ७७ | तथेति तस्याः प्रतिगृह्य | १४ | ६८ |
| ततोऽभिषङ्गानिलविप्र | १४ | ५४ | तथेति तस्यावितथं | ५ | २६ |
| ततो मृगेन्द्रस्य मृगे | २ | ३० | तथेति प्रतिजग्राह | १ | ९२ |
| ततो यथावद्विहिता | ५ | १९ | तथेति प्रतिपन्नाय | १५ | ९३ |
| ततोऽवतीर्यांशु करेणु | ७ | १७ | तथेत्युपस्पृश्य पयः | ५ | ५९ |
| ततो वेलातटेनैव | ४ | ४४ | तथैव सुग्रीवबिभीष | १४ | १७ |
| ततद्भूमिपतिः पत्न्यै | १ | ४७ | तदङ्गनिष्यन्दजलेन | ३ | ४१ |
| तत्प्रतीपपवनादिवैकृ | ११ | ६२ | तदङ्गमग्र्यं मघवन्म | ३ | ४६ |
| तत्प्रसुप्तभुजगेन्द्रभी | ११ | ४४ | तदञ्जनकलेदसमाकु | ७ | २७ |
| तत्प्रार्थितं जवनवाजि | ९ | ५६ | तदद्भुतं संसदि रात्रि | १६ | २४ |
| तत्र जन्यं रघोर्घोरं | ४ | ७७ | तदपोहितुमर्हसि प्रिये | ८ | ५४ |
| तत्र तीर्थसलिलेन | १९ | २ | तदन्यतस्तावदन | ५ | १७ |
| तत्र दीक्षितमृषि ररक्ष | ११ | २४ | तदन्वये शुद्धिमति | १ | ९२ |
| तत्र नागफणोत्क्षिप्तसि | १५ | ८३ | तदर्हसीमां वसतिं | १६ | २२ |
| तत्र यावधिपती मख | ११ | २७ | तदलं तदपायचिन्त | ८ | ८३ |