रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
६४९
| श्लोक-प्रतीक | सर्ग | श्लोक: | श्लोक-प्रतीक | सर्ग | श्लोक: |
|---|---|---|---|---|---|
| चारुनृत्यविगमे च | १९ | १५ | ज्याघातरेखे सुभुजो | ६ | ५५ |
| चित्रकूटवनस्थं च कथि | १२ | १५ | ज्यानिनादमथ गृह्णती | ११ | १५ |
| चित्रद्विपाः पद्मवनाव | १६ | १६ | ज्याबन्धनिष्पन्दभुजेन | ६ | ४० |
| चुम्बने विपरिवर्तिता | १९ | २७ | ज्येष्ठाभिगमनात्पूर्वं ते | १२ | ३५ |
| चूर्णबभ्रु लुलितस्रगा | १९ | २५ | त | ||
| छ | तं रागबन्धेष्ववितृप्तमे | १८ | १९ | ||
| छाया-मण्डललक्ष्येण | ४ | ५ | तं राजवीध्यामधिहस्ति | १८ | ३९ |
| छायाविनीताध्वपरिश्र | १३ | ४६ | तं वाहनादवनतोत्त | ९ | ६० |
| ज | तं विनिष्पिष्य काकुत्स्थो | १२ | ३० | ||
| जगाद चैनामयमङ्ग | ६ | २७ | तं विस्मंतं धेनुरुवाच | २ | ६२ |
| जगृहुस्तस्य चित्तज्ञाः | १५ | ९९ | तं वेधा विदधे नूनं | १ | २९ |
| जनपदे न गदः पद | ९ | ४ | तं शरैः प्रतिजग्राह खर | १२ | ४७ |
| जनस्य तस्मिन्समये वि | १६ | ५३ | तं श्लाघ्यसम्बन्धमसी | ५ | ४० |
| जनस्य साकेतनिवा | ५ | ३१ | तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति | १ | १० |
| जनाय शुद्धान्तचरा | ३ | १६ | तं कर्णभूषणनिपी | ५ | ६५ |
| जनास्तदालोकपथात्प्र | १५ | ७८ | तं कर्णमूलमागत्य रामे | १२ | २ |
| जयश्रियः संवननं | १६ | ७४ | तं कृतप्रणतयोऽनुजीवि | १९ | ८ |
| जलानि वा तीरनिखात | १३ | ६१ | तं कृपामृदुरवेक्ष्य | ११ | ८३ |
| जहार चान्येन मयूर | ३ | ५६ | तं गृहोपवन एव संग | १९ | ५४ |
| जातः कुले तस्य किलोरु | ६ | ७४ | तच्चात्मचिन्तासुलभं वि | १४ | २० |
| जात्यस्तेनाभिजातेन | १७ | ४ | तच्चोदितश्च तमनु | ९ | ७७ |
| जाने विसृष्टां प्रणिधान | १४ | ७२ | ततः कक्ष्यान्तरन्यस्तं | १७ | २१ |
| जाने वो रक्षसाक्रान्ता | १० | ३८ | ततः परं वज्रधरप्रभाव | १८ | २१ |
| जालान्तरप्रेषितदृष्टि | ७ | ९ | ततः परं तत्प्रभवः | १८ | ३४ |
| जिगमिषुर्घनदाघ्युषि | ९ | २५ | ततः परं तेन मखाय | ३ | ३९ |
| जुगुहू तस्याः पथि | १४ | ४९ | ततः परं दुःप्रसहं | ६ | ३१ |
| जुगोपात्मानमत्र | १ | २१ | ततः परमभिव्यक्त | १७ | ४० |
| जेतारं लोकपालानां | १२ | ८९ | ततः प्रकोष्ठे हरिचन्द | ३ | ५९ |
| ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ | १ | २२ | ततः प्रजानां चिरमात्म | ३ | ३५ |