रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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१४८ | रघुवंशमहाकाव्ये
| श्लोकांश | सर्ग | श्लोकः | श्लोकांश | सर्ग | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| कृशानु रपधूमत्वा | १० | ७४ | खर्जूरिस्कन्धनद्धानां | ४ | ५७ |
| क्लृप्तपुष्पशयनांल्लता | १९ | २३ | ग | ||
| केवलं स्मरणेनैव | १० | २९ | गन्धश्च धाराहतपल्व | १३ | २७ |
| कैकेय्यास्तनयो जज्ञे | १० | ७० | गरुडापातविश्लिष्टमेघ | १२ | ७६ |
| कैलासगोरं वृष | २ | ३५ | गर्भ दधत्यर्कमरीचयो | १३ | ४ |
| कोशेनाश्रयणीयत्वमि | १७ | ६० | गृणवत्सुतरोपितश्रियः | ८ | ११ |
| कौशिके न स किल क्षिती | ११ | १ | गुणैराराधयमासु | १० | ८५ |
| कौसल्य इत्युत्तरकोस | १८ | २७ | गुप्तं ददृशुरात्मानं | १० | ६० |
| ऋतुषु तेन विसर्जित | ९ | २० | गुरोनियोगाद्वनितां | १४ | ५१ |
| क्रथकौशिकवंशसंभ | ८ | ८२ | गुरोयियक्षोः कपिलेन | १३ | ३ |
| क्रमेण निस्तीर्य च | ३ | ७ | गुरोः स चानन्तरमन्त | १८ | १५ |
| क्रियानिमित्तेष्वपि | ५ | ७ | गुरोः सदारस्य निपी | २ | २३ |
| क्रियाप्रबन्धादयमश्व | ६ | २३ | गुर्वर्थमर्थी श्रुतपार | ५ | २४ |
| क्रीडापतत्रिणोऽप्यस्य | १७ | २० | गृहिणी सचिवः सखी मिथः | ८ | ६७ |
| क्रोशाधं प्रकृतिपुरःसरेण | १३ | ७९ | गृहीतप्रतिमुक्तस्य | ४ | ४३ |
| क्लेशावहा भर्तुरलक्ष | १४ | ५ | गेये को नु विनेता वा | १५ | ६९ |
| क्वचिच्च कृष्णोरगभूषणेव | १३ | ५७ | गौरवाद्यदपि जातु | १९ | ७ |
| क्वचित्खगानां प्रियमान | १३ | ५५ | ग्रथितमोलिरसौ वन | ९ | ५१ |
| क्वचित्पथा संचरते | १३ | १९ | ग्रामेष्वात्मविसृष्टेषु | १ | ४४ |
| क्वचित्प्रभा चान्द्रमसी | १३ | ५६ | घ | ||
| क्वचित्प्रभालेपिभिरिन्द्र | १३ | ५४ | घ्राणकान्तमधुगन्ध | १९ | ११ |
| क्व सूर्यप्रभवो वंशः | १ | २ | च | ||
| क्षणमात्रसखीं सुजात | ८ | ३७ | चकम्पे तीर्णलौहित्ये | ४ | ८१ |
| क्षतात्किल त्रायत | २ | ५३ | चतुर्भुजांशप्रभवः स | १६ | ३ |
| क्षत्रजातमपकारवरि | ११ | ७१ | चतुर्वर्गफलं ज्ञानं | १० | २२ |
| क्षत्रियान्तकरणोऽपि | ११ | ७५ | चन्दनेनाङ्गरागं च मृग | १७ | २४ |
| क्षितिरिन्दुमती च भामिनी | ८ | २८ | चमरान्परितः प्रवर्ति | ९ | ६६ |
| ख | चरणयोर्नखरागस | ९ | १३ | ||
| खनिभिः सुषुवे रत्नं क्षेत्रैः | १७ | ६६ | चरतः किल दुश्चरं | ८ | ७९ |