रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका ६४७
| श्लोक | सर्गे | श्लोकः | श्लोक | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| कथं नु शक्योऽनुनयो | २ | ५४ | किंतु वध्वां तवैत | १ | ६५ |
| कराभिघातोत्थितकन्दु | १६ | ८३ | किमत्र चित्रं यदि का | ५ | ३३ |
| करेण वातायनलम्बि | १३ | २१ | किमप्यहिंस्यस्तव | २ | ५७ |
| कलत्रनिन्दागुरुणा | १४ | ३३ | किमात्मनिर्वादकथामु | १४ | ३४ |
| कलत्रवन्तमात्मान | १ | ३२ | किवा तवात्यन्तवियोग | १४ | ६५ |
| कलत्रवाहं वाले कनी | १२ | ३४ | कुमारभृत्याकुशलैरनु | ३ | १२ |
| कलमन्यभृतासु भाषितं | ८ | ५९ | कुमाराः कृतसंस्कारा | १० | ७८ |
| कल्याणबुद्धेरथवा | १४ | ६२ | कुम्भकर्णः कपीन्द्रेण | १२ | ८० |
| कश्चित्कराभ्यामुपगूढ | ६ | १३ | कुम्भपूरणभवः पटु | ९ | ७३ |
| कश्चिद्द्विषत्खड्गहृतो | ७ | ५१ | कुम्भयोनिरलंकारं | १२ | ५५ |
| कश्चिद्यथाभागमवस्थि | ६ | १९ | कुरुष्व तावत्करभो | १३ | १८ |
| कातरोऽसि यदि वोद्गता | ११ | ७८ | कुलेन कान्त्या वयसा न | ६ | ७९ |
| कातर्यं केवला नीतिः | १७ | ४७ | कुशावतीं श्रोत्रियसात्स | १६ | २५ |
| का त्वं शुभे कस्य परिग्र | १६ | ८ | कुशेशयाताम्रतलेन | ६ | १८ |
| काप्यभिख्या तयोरासी | १ | ४६ | कुसुमं कृतदोहदस्तव | ८ | ६२ |
| कामं कर्णान्तविश्रान्ते | ४ | १३ | कुसुमजन्म ततो नव | ९ | २६ |
| कामं जीवति मे नाथ | १२ | ७५ | कुसुममेव न केवल | ९ | २८ |
| कामं न सोऽकल्पत पैतृ | १८ | ४० | कुसुमान्यपि गात्रसंग | ८ | ४४ |
| कामं नृपाः सन्तु सहस्र | ६ | २२ | कुसुमग्रंथितामपार्थि | ८ | ३४ |
| कामं प्रकृतिवैराग्यं स | १७ | ५५ | कुसुमोत्खचितान्वलीभृ | ८ | ५३ |
| कामरूपेश्वरस्तस्य | ४ | ८४ | कूटयुद्धविधिज्ञेऽपि न | १७ | ६९ |
| कामिनीसहचरस्य कामि | १९ | ५ | कृच्छ्रलब्धमपि लब्ध | ११ | २ |
| काम्बोजाः समरे सोढुं | ४ | ६९ | कृतदण्डः स्वयं राजा | १५ | ५३ |
| कायेन वाचा मनसा | ५ | ५ | कृतप्रतिकृतप्रीतंस्तयो | १२ | ९४ |
| कार्तिकीषु सवितानह | १९ | ३९ | कृतः प्रयत्नो न च देव | १६ | ७६ |
| कार्येषु चैककार्यत्वा | १० | ४० | कृतवत्यसि नावधीरणां | ८ | ४८ |
| कार्ष्णेन पत्रिणा शत्रुः स | १५ | २४ | कृतसीतापरित्यागः स | १५ | १ |
| कालान्तरश्यामसुधेषु | १६ | १८ | कृताञ्जलिस्तत्र यदम्ब | १४ | १६ |
| काषायपरिवीतेन | १५ | ७७ | कृताभिषेकैर्दिव्यायां | १० | ६३ |