रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
श्लोकानुक्रमणिका
६४९
| श्लोक-प्रतीक | सर्ग | श्लोक: | श्लोक-प्रतीक | सर्ग | श्लोक: |
|---|---|---|---|---|---|
| चारुनृत्यविगमे च | १९ | १५ | ज्याघातरेखे सुभुजो | ६ | ५५ |
| चित्रकूटवनस्थं च कथि | १२ | १५ | ज्यानिनादमथ गृह्णती | ११ | १५ |
| चित्रद्विपाः पद्मवनाव | १६ | १६ | ज्याबन्धनिष्पन्दभुजेन | ६ | ४० |
| चुम्बने विपरिवर्तिता | १९ | २७ | ज्येष्ठाभिगमनात्पूर्वं ते | १२ | ३५ |
| चूर्णबभ्रु लुलितस्रगा | १९ | २५ | त | ||
| छ | तं रागबन्धेष्ववितृप्तमे | १८ | १९ | ||
| छाया-मण्डललक्ष्येण | ४ | ५ | तं राजवीध्यामधिहस्ति | १८ | ३९ |
| छायाविनीताध्वपरिश्र | १३ | ४६ | तं वाहनादवनतोत्त | ९ | ६० |
| ज | तं विनिष्पिष्य काकुत्स्थो | १२ | ३० | ||
| जगाद चैनामयमङ्ग | ६ | २७ | तं विस्मंतं धेनुरुवाच | २ | ६२ |
| जगृहुस्तस्य चित्तज्ञाः | १५ | ९९ | तं वेधा विदधे नूनं | १ | २९ |
| जनपदे न गदः पद | ९ | ४ | तं शरैः प्रतिजग्राह खर | १२ | ४७ |
| जनस्य तस्मिन्समये वि | १६ | ५३ | तं श्लाघ्यसम्बन्धमसी | ५ | ४० |
| जनस्य साकेतनिवा | ५ | ३१ | तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति | १ | १० |
| जनाय शुद्धान्तचरा | ३ | १६ | तं कर्णभूषणनिपी | ५ | ६५ |
| जनास्तदालोकपथात्प्र | १५ | ७८ | तं कर्णमूलमागत्य रामे | १२ | २ |
| जयश्रियः संवननं | १६ | ७४ | तं कृतप्रणतयोऽनुजीवि | १९ | ८ |
| जलानि वा तीरनिखात | १३ | ६१ | तं कृपामृदुरवेक्ष्य | ११ | ८३ |
| जहार चान्येन मयूर | ३ | ५६ | तं गृहोपवन एव संग | १९ | ५४ |
| जातः कुले तस्य किलोरु | ६ | ७४ | तच्चात्मचिन्तासुलभं वि | १४ | २० |
| जात्यस्तेनाभिजातेन | १७ | ४ | तच्चोदितश्च तमनु | ९ | ७७ |
| जाने विसृष्टां प्रणिधान | १४ | ७२ | ततः कक्ष्यान्तरन्यस्तं | १७ | २१ |
| जाने वो रक्षसाक्रान्ता | १० | ३८ | ततः परं वज्रधरप्रभाव | १८ | २१ |
| जालान्तरप्रेषितदृष्टि | ७ | ९ | ततः परं तत्प्रभवः | १८ | ३४ |
| जिगमिषुर्घनदाघ्युषि | ९ | २५ | ततः परं तेन मखाय | ३ | ३९ |
| जुगुहू तस्याः पथि | १४ | ४९ | ततः परं दुःप्रसहं | ६ | ३१ |
| जुगोपात्मानमत्र | १ | २१ | ततः परमभिव्यक्त | १७ | ४० |
| जेतारं लोकपालानां | १२ | ८९ | ततः प्रकोष्ठे हरिचन्द | ३ | ५९ |
| ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ | १ | २२ | ततः प्रजानां चिरमात्म | ३ | ३५ |
६५० रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| ततः प्रतस्थे कौवेरीं | ४ | ६६ | तत्र सेकहृतलोचनाञ्जनं | ११ | १० |
| ततः प्रहस्यापभयः | ३ | ५१ | तत्र सौधगतः पश्यन्य | १५ | ३० |
| ततः प्रियोपात्तरसेऽधरो | ७ | ६३ | तत्र स्वयंवरसमा | ५ | ६४ |
| ततः स कृत्वा धनुरत | १६ | ७७ | तत्र हूणावरोधानां | ४ | ६८ |
| ततः सपर्यां सपशूपहा | १६ | ३९ | तत्राक्षोभ्यं यशोराशि | ४ | ८० |
| ततः समाजापयदाशु | १६ | ७६ | तत्र भिषकप्रयता | १४ | ८२ |
| ततः समानीय न मानि | २ | ६४ | तत्राचितो भोजपतेः | ७ | २० |
| ततः सुनन्दावचना | ६ | ८० | तत्रेश्वरेण जगतां | १३ | ७७ |
| ततस्तदालोकनतत्प | ७ | ५ | तत्रैनं हेमककुम्भेषु | १७ | १० |
| ततो गौरीगुरुं शैल | ४ | ७१ | तथा गतायां परिहास | ६ | ८२ |
| ततो धनुष्कर्षणमूढ | ७ | ६२ | तथापि शास्त्रव्यवहार | ३ | ६२ |
| ततो भिषङ्गादसमग्र | ३ | ६४ | तथेति कामं प्रतिशुश्रुवा | ३ | ६७ |
| ततो नृपाणां श्रुतवृत्त | ६ | २० | तथेति गामुक्तवते | २ | ५९ |
| ततो नृपेणानुगताः स्त्रियः | १६ | ६९ | तथेति तस्याः प्रणयं | १६ | २३ |
| ततो बिभेद पौलस्त्यः | १२ | ७७ | तथेति तस्याः प्रतिगृह्य | १४ | ६८ |
| ततोऽभिषङ्गानिलविप्र | १४ | ५४ | तथेति तस्यावितथं | ५ | २६ |
| ततो मृगेन्द्रस्य मृगे | २ | ३० | तथेति प्रतिजग्राह | १ | ९२ |
| ततो यथावद्विहिता | ५ | १९ | तथेति प्रतिपन्नाय | १५ | ९३ |
| ततोऽवतीर्यांशु करेणु | ७ | १७ | तथेत्युपस्पृश्य पयः | ५ | ५९ |
| ततो वेलातटेनैव | ४ | ४४ | तथैव सुग्रीवबिभीष | १४ | १७ |
| ततद्भूमिपतिः पत्न्यै | १ | ४७ | तदङ्गनिष्यन्दजलेन | ३ | ४१ |
| तत्प्रतीपपवनादिवैकृ | ११ | ६२ | तदङ्गमग्र्यं मघवन्म | ३ | ४६ |
| तत्प्रसुप्तभुजगेन्द्रभी | ११ | ४४ | तदञ्जनकलेदसमाकु | ७ | २७ |
| तत्प्रार्थितं जवनवाजि | ९ | ५६ | तदद्भुतं संसदि रात्रि | १६ | २४ |
| तत्र जन्यं रघोर्घोरं | ४ | ७७ | तदपोहितुमर्हसि प्रिये | ८ | ५४ |
| तत्र तीर्थसलिलेन | १९ | २ | तदन्यतस्तावदन | ५ | १७ |
| तत्र दीक्षितमृषि ररक्ष | ११ | २४ | तदन्वये शुद्धिमति | १ | ९२ |
| तत्र नागफणोत्क्षिप्तसि | १५ | ८३ | तदर्हसीमां वसतिं | १६ | २२ |
| तत्र यावधिपती मख | ११ | २७ | तदलं तदपायचिन्त | ८ | ८३ |
श्लोकानुक्रमणिका ६५१
| सर्ग | श्लोकः | सर्ग | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| तदात्मसंभवं राज्ये | १७ | ८ | तमर्चयित्वा विधि | ५ | ३ |
| तदाननं मृत्सुरभि | ३ | ३ | तमलभन्त पतिं पति | ९ | १७ |
| तदाप्रभृत्येव वन | २ | ३८ | तमशक्यमपाक्रष्टुं नि | १२ | १७ |
| तदीयमाक्रन्दितमा | २ | २८ | तमश्रु नेत्रावरणं प्रमृज्य | १४ | ७१ |
| तदेतदाजानुविलम्बि | १६ | ८४ | तमातिथ्यक्रियाशान्त | १ | ५८ |
| तदेष सर्गः करुणाद्रं | १४ | ४२ | तमात्मसंपन्नमनिन्दि | १८ | १८ |
| तद्गतिं मतिमतां वरे | ११ | ८७ | तदादौ कुलविद्यानाम | १७ | ३ |
| तद्गीतश्रवणैकाग्रा | १५ | ६६ | तमाधूतध्वजपटं व्यो | १२ | ८५ |
| तद्रक्ष कल्याणपरं | २ | ५० | तमापतन्तं नृपते | ५ | ५० |
| तद्व्योम्नि शतधा भिन्नं | १२ | ९८ | तमार्यगृह्यं निगृहीत | २ | ३३ |
| तनुत्यजां वर्मभृतां | ७ | ४८ | तमाहितौत्सुक्यमद | २ | ७३ |
| तनुलतांविनिवेशित | ९ | ५२ | तमीशः कामरूपाणा | ४ | ८३ |
| तं तस्थिवांसं नगरोप | ४ | ६१ | तमुद्वहन्तं पथि भोज | ७ | ३५ |
| तं दधन्मैथिलीकण्ठनि | १५ | ५६ | तमुपाद्रवदुद्यम्य दक्षि | १५ | २३ |
| तं धूपाश्यानकेशान्तं | १७ | २२ | तमृषिः पूजयामास | १५ | १२ |
| तन्मदीयमिदमायुधं | ११ | ७७ | तं पयोधरनिषिक्तच | १९ | ४५ |
| तं न्यमन्त्रयत संभृत | ११ | ३२ | तं पितुर्वधभवेन म | ११ | ६७ |
| तपस्यानधिकारित्वात्प्र | १५ | ५१ | तं प्रमत्तमपि न प्रभाव | १९ | ४८ |
| तपस्विवेषक्रिययापि | १४ | ९ | तं प्राप्य सर्वावयवान | ६ | ६९ |
| तपस्विसंसर्गविनीत | १४ | ७५ | तं प्रीतिविशदैर्र्नेत्रैरन्व | १७ | ३५ |
| तपोरक्षन्स विघ्नेभ्यस्त | १७ | ६५ | तं भावार्थं प्रसवसमया | १९ | ५७ |
| तमङ्कमारोप्य शरीर | ३ | २६ | तं भूपतिर्भासुरहे | ५ | ३० |
| तमध्वराय मुक्ताश्वं | १५ | ५८ | तया स्रजा मङ्गलपुष्प | ६ | ८४ |
| तमध्वरे विश्वजिति | ५ | १ | तया हीनं विधातर्मा | १ | ७० |
| तमपहाय ककुत्स्थकुलो | ९ | १६ | तयोर्दिवस्पतेरासीदेकः | १७ | ७ |
| तमब्रवीत्सा गुरुणा नव | १६ | ९ | तयोरपाङ्गप्रतिसारि | ७ | २३ |
| तमभ्यनन्दत्प्रथमं प्र | ३ | ६८ | तयोरुपान्तस्थितसिद्ध | ३ | ५७ |
| तमभ्यनन्दत्प्रणतं स | १५ | ४० | तयोर्जगृहतुः पादा | १ | ५७ |
| तमरण्यसमाश्रयोन्मुखं | ८ | १२ | तयोर्यथाप्रार्थितमिन्द्रि | १४ | २५ |
६५२ रघुवंशमहाकाव्ये
| प्रतीक | सर्गे | श्लोकः | प्रतीक | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| तयोश्चतुर्दशैकैन | १२ | ५ | तस्य कर्कशविहारसं | ९ | ६८ |
| तयोस्तस्मिन्नवीभूत | १२ | ५६ | तस्य कल्पितपुरस्क्रिया | ११ | ५१ |
| तद्वल्गुना युगपदु | ५ | ६८ | तस्य जातु मरुतः प्रती | ११ | ५८ |
| तव निःश्वसितानुकारि | ८ | ६४ | तस्य दाक्षिण्यरूढेन | १ | ३१ |
| तव मन्त्रकृतो मन्त्रै | १ | ६१ | तस्य द्विपानां मदवारि | १६ | ३० |
| तवार्हतो नाभिगमे | ५ | ११ | तस्य निर्दयरतिश्रमाल | १९ | ३२ |
| तवाधरस्पर्धिषु विद्रु | १३ | १३ | तस्य पाण्डुवदनाल्पभू | १९ | ५० |
| तवोरुकीर्तिः श्वशुरः | १४ | ७४ | तस्य पूर्वोदितां निन्दां | १५ | ५७ |
| तस्मात्पुरःसरबिभीष | १६ | ६९ | तस्य प्रभानिर्जितपुष्प | १७ | ३२ |
| तस्मात्समुद्रादिव मध्य | १६ | ७९ | तस्य प्रयातस्य वरूथि | १६ | २८ |
| तस्मादघः किंचिदिवाव | १८ | ४१ | तस्य प्रसह्य हृदयं कि | ८ | ९३ |
| तस्मिन्कुलापीडनिभे | १८ | २९. | तस्य मार्गवशादेका | १५ | ११ |
| तस्मिन्क्षणे पालयितुः | २ | ६० | तस्य संवृतमन्त्रस्य | १ | २० |
| तस्मिन्गते द्यां सुकृतो | १८ | २२ | तस्य सन्मन्त्रपूताभिः | १७ | १६ |
| तस्मिन्गते विजयिनं | ११ | ९२ | तस्य संस्तूयमानस्य च | १५ | २७ |
| तस्मिन्नभिद्योतितबन्धु | ६ | ३६ | तस्य सावरणदृष्टसंधयः | १९ | १६ |
| तस्मिन्नवसरे देवाः | १० | ५ | तस्य स्तनप्रणयिभिर्मु | ९ | ५५ |
| तस्मिन्नात्मचतुर्भागे | १५ | ९६ | तस्य स्फुरति पौलस्त्यः | १२ | ९० |
| तस्मिन्नास्थदिषीकास्त्रं | १२ | २३ | तस्य वीक्ष्य ललितं वपुः | ११ | ३८ |
| तस्मिन्प्रयाते परलोक | १८ | १६ | तस्यां रघोः सूनुरुपस्थि | ६ | ६८ |
| तस्मिन्न्रामशरोत्कृत्ते | १२ | ४९ | तस्याः खुरन्यासपवित्र | ५ | २ |
| तस्मिन्समावेशितचित्त | ६ | ७० | तस्याधिकारपुरुषैः | ५ | ६३ |
| तस्मिन्ह्रदः संहितमात्र | १६ | ७८ | तस्यानलोजास्तनयस्त | १८ | ५ |
| तस्मिन्विधानातिशये | ६ | ११ | तस्यानीकैर्विसर्पद्भि | ४ | ५३ |
| तस्मै कुशलसंप्रश्न | १० | ३४ | तस्मान्मुच्ये यथा तात | १ | ७२ |
| तस्मै निशाचरैश्वर्यं | १२ | ६९ | तस्यान्वये भूपतिरेष | ६ | ४१ |
| तस्मै विसृज्योत्तरकोस | १८ | ७ | तस्यापनोदाय फलप्र | १४ | ३९ |
| तस्मै सभ्याः सभायाय | १ | ५५ | तस्यापरेष्वपि मृगेषु | ९ | ५८ |
| तस्मै सम्यग्घुतो वह्नि | ४ | २५ | तस्याः प्रसन्नेन्दुमुखः.. | २ | ६८ |
श्लोकानुक्रमणिका
६५३
| श्लोक | सर्ग | श्लोकः | श्लोक | सर्ग | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| तस्याः प्रतिद्वन्द्विभवाद्दि | ७ | ६८ | तां देवतापित्नतिथि | २ | १६ |
| तस्याः प्रकामं प्रियदर्श | ६ | ४४ | तान्हत्वा गजकुलबद्ध | ९ | ६५ |
| तस्याभवत्सूनुरुदार | १८ | १७ | तां प्रत्यभिव्यक्तमनोर | ६ | १२ |
| तस्याभिषेकसंभारं | १२ | ४ | ताभ्यस्तथाविधान्स्ना | १० | ६४ |
| तस्यामात्मानुरूपा | १ | ३३ | ताभिर्गर्भः प्रजामूत्यै | १० | ५८ |
| तस्यामेवास्य यामिन्याम् | १५ | १३ | तामग्रतस्तारमरसान्त | ६ | ३७ |
| तस्यामन्तर्हितसौधमा | १३ | ४० | तामङ्कमारोप्य कृशाङ्ग | १४ | २७ |
| तस्यालमेषा क्षुधितस्य | २ | ३९ | तामन्तिकन्यस्तबलि | २ | २४ |
| तस्यावसाने हरिदश्वधा | १८ | २३ | तामभ्यगच्छद्रुदितानु | १४ | ७० |
| तस्याः स रक्षार्थमनल्प | ७ | ३६ | तामर्पयामास च शोक | १४ | ८० |
| तस्याः स राजोपपदं | १६ | ४० | तामेकभार्यां परिवाद | १४ | ८६ |
| तस्यास्तथाविधनरेन्द्र | १९ | ५६ | तां पुण्यदर्शनां दृष्ट्वा | १ | ८६ |
| तस्याः स्पृष्टे मनुजपति | १६ | ८७ | ताम्बूलीनां दलैस्तत्र | ४ | ४२ |
| तस्यैकनागस्य कपोल | ५ | ४७ | ताम्बूलवल्लीपरिणद्ध | ६ | ६४ |
| तस्यैकस्योच्छ्रितं छत्रं | १७ | ३३ | ताम्रपर्णीसमेतस्य | ४ | ५० |
| तस्यै प्रतिश्रुत्य रघुप्र | १४ | २९ | ताम्रोदरेषु पतितं | ५ | ७० |
| तस्यै भर्तुरभिज्ञानमङ्गु | १२ | ६२ | ता राघवं दृष्टिभिरापि | ७ | १२ |
| तस्योत्सृष्टनिवासेषु | ४ | ७६ | तावत्प्रकीर्णाभिनवोप | ७ | ४ |
| तस्योदये चतुर्मूर्तेः | १० | ७३ | तावुभावपि परस्पर | ११ | ८२ |
| तस्योपकार्यारचिती | ५ | ४१ | तासां मुखैरासवगन्ध | ७ | ११ |
| तस्योधमहती मूर्ध्नि | १७ | १४ | तासु श्रिया राजपरम्प | ६ | ५ |
| तं स्वसा नागराज्यस्य | १७ | ६ | ताः स्वचारित्रमुद्दिश्य | १५ | ७३ |
| तां शिल्पिसंघाः प्रभुणा | १६ | ३८ | ताः स्वमङ्कमधिरोप्य दो | १९ | ४४ |
| तां सैव वेत्रग्रहणे | ६ | २६ | तिस्रस्त्रिलोकप्रथितेन | ७ | ३३ |
| ता इङ्गुदीस्नेहकृतप्र | १४ | ८१ | तीरस्थली बर्हिभिरुक्त | १६ | ६४ |
| तात शुद्धा समक्षं नः स्नुषा | १५ | ७२ | तीर्थे तदीये गजसेतुब | १६ | ३३ |
| ता नराधिपसुता नृपा | ११ | ५६ | तीर्थे तोयव्यतिकरभ | ८ | ९५ |
| तां तामवस्थां प्रतिपद्य | १३ | ५ | तीव्रवेगधुतमार्गवृ | ११ | १६ |
| तां दृष्टिविषये भर्तुर्मु | १५ | ७९ | ते चतुर्थसहितास्त्रयो | ११ | ५५ |
६५४ रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| ते च प्रापुरुदन्वन्तं | १० | ६ | तैः शिवेषु वसतिर्गता | ११ | ३३ |
| तेजसः सपदि राशिर् | ११ | ६३ | तौ दंपती बहु विलप्य | ९ | ७८ |
| ते तस्य कल्पयामा | १७ | ९ | तौ निदेशकरणोद्यतौ | ११ | ४ |
| तेन कार्मुकनिषक्तमु | ११ | ७० | तौ पितुर्नयनजेन वारि | ११ | ५ |
| तेन दूतिविदितं निषे | १९ | १८ | तौ प्रणामचलकाकपक्ष | ११ | ३१ |
| तेन द्विपानामिव पुण्य | १८ | ८ | तौ बलातिबलयोः प्रभा | ११ | ९ |
| तेन भूमिनिहितैकको | ११ | ८१ | तौ समेत्य समये स्थिता | ११ | ५३ |
| तेन मन्त्रप्रयुक्तेन नि | १२ | ९९ | तौ सरांसि रसविद्गिर | ११ | ११ |
| तेनातपत्रामलमण्डले | १६ | २७ | तौ सीतान्वेषिणौ गृध्रं | १२ | ५४ |
| तेनाभिघातरभसस्य | ९ | ३१ | तौ सुकेतुसुतया खिली | ११ | १४ |
| तेनावरोधप्रमदास | १६ | ७१ | तौ स्नातकर्बन्धुमता च | ७ | २८ |
| तेनार्थवांल्लोभपराङ्मु | १४ | २३ | तौ विदेहनगरीनिवासि | ११ | ३६ |
| तेनावतीर्य तुरगात्प्र | ९ | ७६ | त्यजत मानमलं बत | ९ | ४७ |
| तेनाष्टौ परिगमिताः | ८ | ९२ | त्यागाय संभृतार्थानां | १ | ७ |
| तेनोत्तीर्य पथा लङ्कां | ११ | ७१ | त्याजितः फलमुत्खातं | ४ | ३३ |
| तेनोरुवीर्येण पिता प्रजायै | १८ | २ | त्रस्तेन तार्क्ष्यात्किल कालिये | ६ | ४९ |
| ते पुत्रयोनैर्ऋतशस्त्र | १४ | ४ | त्रिदिवोत्सुकयाप्यवेक्ष्य | ८ | ६० |
| ते प्रजानां प्रजानाथा | १० | ८३ | त्रिलोकनाथेन सदा म | ३ | ४५ |
| ते प्रीतमनसस्तस्मै या | १७ | १८ | त्रेताग्निधूमाग्रमनिन्द्य | १३ | ३७ |
| ते बहुज्ञस्य चित्तज्ञं | १० | ५६ | त्रैलोक्यनाथप्रभवं प्र | १६ | ८१ |
| ते रामाय वधोपायामा | १५ | ५ | त्वं रक्षसा भीरु यतोऽप | १३ | २४ |
| ते रेखाध्वजकुलिशा | ४ | ८८ | त्वचं स मेध्यां परिधाय | ३ | ३१ |
| ते सेतुवार्तागजवन्धमु | १६ | २ | त्वया पुरस्तादुपयाचि | १३ | ५३ |
| तेऽस्य मुक्तागुणोन्नद्धं | १७ | २३ | त्वयैवं चिन्त्यमानस्य | १ | ६४ |
| तेषां सदश्वभूयिष्ठा | ४ | ७० | त्वय्यावेशितचित्तानां | १० | २७ |
| तेषा द्वयोर्द्वयोरवयं | १० | ८२ | द | ||
| तेषां महार्हासनसंस्थि | ६ | ६ | दक्षिणेन पवनेन सं | १९ | ४३ |
| तैः कृतप्रकृतिमुख्यसं | १९ | ५५ | दधतो मङ्गलक्षोमे वसा | १२ | ८ |
| तैस्त्रयाणां शितैर्वाणैयं | १२ | ४८ | दयितां यदि तावदन्व् | ८ | ५० |
श्लोकानुक्रमणिका
६५५
| श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| दर्पणेपु परिभोगदर्शि | १९ | २८ | द्वेष्योऽपि संमतः शिष्ट | १ | २८ |
| दशदिगन्तजिता रघु | ९ | ५ | ध | ||
| दशरश्मिशतोपमद्यु | ८ | २९ | धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रं | २ | ११ |
| दशाननकिरीटेभ्य | १० | ७५ | धरायां तस्य संरम्भं | १५ | ८५ |
| दिगभ्यो निमन्त्रिताश्चैनम | १५ | ५९ | धर्मलोपभयाद्राज्ञी | १ | ७६ |
| दिन दिने शैवलवन्त्य | १६ | ४६ | धातारं तपसा प्रीतं | १० | ४३ |
| दिनेषु गच्छत्सु नितान्त | ३ | ८ | धारास्वनोद्गारिदरीमु | १३ | ४७ |
| दिलीपसूनोः स बृह | ३ | ५४ | धियः समग्रैः स गुणैरु | ३ | ३० |
| दिलीपानन्तरं राज्ये | ४ | २ | घमधूमो वसागन्धी | १५ | १६ |
| दिवं मरुत्वानिव भो | ३ | ४ | धूमादग्नेः शिखाः पश्चादु | १७ | ३४ |
| दिशः प्रसेदुर्मरुतो ववुः | ३ | १४ | धृतिरस्तमिता रतिश्च्यु | ८ | ६६ |
| दिशि मन्दायते तेजो | ४ | ४९ | ध्रुवमस्मि शठः शुचिस्मिते | ८ | ४९ |
| दिष्टान्तमाप्स्यति भवान | ९ | ७९ | ध्वजपटं मदनस्य धनु | ९ | ४५ |
| दीर्घेष्वमी नियमिताः | ५ | ७३ | न | ||
| दुकूलवासाः स वधूस | ७ | १९ | न किलानुययुस्तस्य | १ | २७ |
| दुदोह गां स यज्ञाय | १ | २६ | न कृपणा प्रभवत्यपि | ९ | ८ |
| दुरितदर्शनेन ध्वंस्त | १७ | ७४ | न केवलं गच्छति तस्य | १८ | ४९ |
| दुरितैरपि कर्तुमात्म | ८ | २ | न खरो न च भूयसा | ८ | ९ |
| दुर्गाणि दुर्ग्रहाण्यासंस्त | १७ | ५२ | न चावदद्भर्तुरवर्णं | १४ | ५७ |
| दुर्जातिबन्धुरयमृक्ष | १३ | ७२ | न चोपलेभे पूर्वैषा | १० | २ |
| दूरादयश्चक्रनिभस्य | १३ | १५ | न तस्य मण्डले राज्ञो | १७ | ५८ |
| दूरापवर्जितच्छत्रैस्तस्या | १७ | ७९ | नदत्सु तूर्येष्वविभाव्य | ७ | ३८ |
| दूर्वायवाङ्कुरप्लक्षकत्व | १७ | १२ | नदद्भिः स्निग्धगम्भीरं | १७ | ११ |
| दृढभक्तिरिति ज्येष्ठे | १२ | १९ | न धर्ममर्थकामाभ्यां व | १७ | ५७ |
| दृष्टदोषमपि तन्न | १९ | ४९ | न नवः प्रभुता फलोदया | ८ | २२ |
| दृष्टसारमथ रुद्रका | ११ | ४७ | न पृथग्जनवच्छुचो व | ८ | ९० |
| दृष्टा विचिन्वता तेन | १२ | ६१ | न प्रसेहे स रुद्धार्कं | ४ | ८२ |
| दैत्यस्त्रीगण्डलेखानां | १० | १२ | न प्रहर्तुमलमस्मि निर्द | ११ | ८४ |
| द्विषां विपह्य काकुत्स्थ | ४ | ४१ | नभश्चरैर्गीतयशाः स ले | १८ | ६ |
६५६ | रघुवंशमहाकाव्ये
| पाद / श्लोक | सर्गे | श्लोकः | पाद / श्लोक | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| न मृगयाभिरतिर्न दु | ९ | ७ | निर्वाप्य प्रियसंदेशैः | १२ | ६३ |
| न मे ह्रिया शंसति किं | ३ | ५ | निर्विष्टविषयस्नेहः स | १२ | १ |
| नमो विश्वसृजे पूर्वं | १० | १६ | निर्वृत्तजाम्बूनदपट्ट | १८ | ४४ |
| नयगुणोपचितामिव | ९ | २७ | निर्वृष्टलघुभिर्मेघै | ४ | १५ |
| नयविद्भिरनंवे राज्ञि | ४ | १० | निवर्त्य राजा दयितां | २ | ३ |
| नरेन्द्रमूलायतनाद | ३ | ३६ | निवृते स महार्णव | ९ | १४ |
| नवपल्लवसंस्तरेऽपि | ८ | ५७ | निवातपद्मस्तिमिते | ३ | १७ |
| नवेन्दुना तन्नभसोपमे | १८ | ३७ | निविष्टमुदधेः कूले तं | १२ | ६८ |
| न संयतस्तस्य बभूव | ३ | २० | निवेश्य वामं भुजमास | ६ | १६ |
| नातिपर्याप्तमालक्ष्य म | १५ | १८ | निशम्य देवानुचर | २ | ५२ |
| नाभिप्ररूढाम्बुरुहास | १३ | ६ | निशाचरोपप्लुतभर्तृका | १४ | ६४ |
| नाम राम इति तुल्यम | ११ | ६८ | निशासु भास्वत्कलनूपु | १६ | १२ |
| नाम वल्लभजनस्य ते | १९ | २४ | निःशेषविक्षालितधा | ५ | ४४ |
| नाम्भसां कमलशोभिनां | ११ | १२ | निसर्गभिन्नास्पदमक | ६ | २९ |
| निगृह्य शोकं स्वयमेव | १४ | ८५ | नीपान्वयः पार्थिव एष | ६ | ४६ |
| निग्रहात्समुराप्तानां व | १२ | ५२ | नीवारपाकादि कडंग | ५ | ९ |
| निश्चित्य चानन्यनिवृत्ति | १४ | ३५ | नूनं मत्तः परं वंश्याः | १ | ६६ |
| नितम्बगुर्वी गुरुणा | ७ | २५ | नृत्यं मयूराः कुसुमानि | १४ | ६९ |
| निद्रावशेन भवता | ५ | ६७ | नृपतिः प्रकृतीरवेक्षि | ८ | १८ |
| निधानगर्भामिव सा | ३ | ९ | नृपतेः प्रतिषिद्धमेव | ९ | ७४ |
| नियुज्य तं होमतुरंग | ३ | ३८ | नृपतेर्व्यजनादिभिस्त | ८ | ४० |
| निर्घातोयैः कुञ्जलीनाञ्जि | ९ | ६४ | नृपं तमावर्तमनोज्ञ | ६ | ५२ |
| निर्दिष्टां कुलपतिना स | १ | ९५ | नृपस्य वर्णाश्रमपाल | १४ | ६७ |
| निर्दोषमभवत्सवं | १० | ७२ | नेत्रव्रजाः पौरजनस्य | ६ | ७ |
| निर्बन्धपृष्ठः स जगाद | १४ | ३२ | नेपथ्यदर्शनिष्ठछाया त | १७ | २६ |
| निर्बन्धसंजात रुषा | ५ | २१ | नैर्ऋतघ्नमथ मन्त्रव | ११ | २१ |
| निर्यायावथ पौलस्त्यः पु | १२ | ८३ | न्यस्ताक्षरामक्षरभूमि | १८ | ४६ |
| निर्वर्त्यते यंनियमा | ५ | ८ | प | ||
| निर्वर्त्यैवं दशमुखशि | १५ | १०३ | पक्षच्छिदा गोत्रभिदात | १३ | ७ |
श्लोकानुक्रमणिका
| सर्गे | श्लोकः | | सर्गे | श्लोकः | | :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: | | पञ्चमं लोकपालानाभूचुः | १७ | ७८ | पारसीकांस्ततो जेतुं | ४ | ६० | | पञ्चवट्यां ततो रामः | १२ | ३१ | पार्थिवीमुदवहद्रघु | ११ | ५४ | | पञ्चानामपि भूतानां | ४ | ११ | पिता पितृणामनृणस्तम | १८ | २६ | | पणबन्धमुखान्गुणान् | ८ | २१ | पिता समाराधनतत्परे | १८ | ११ | | पतिरङ्कनिषण्णया | ८ | ४२ | पितुः प्रयत्नात्स समग्र | ३ | २२ | | पत्तिः पदातिं रथिनं | ७ | ३७ | पितुरनन्तरमुत्तर | ९ | १ | | पयोघटैराश्रमबाल | १४ | ७८ | पितुर्नियोगाद्वनवास | १४ | २१ | | पयोधरैः पुण्यजनाङ्ग | १३ | ६० | पित्रा दत्तां रुदन्न्रामः | १२ | ७ | | परकर्मापहः सोऽभूद | १७ | ६१ | पित्रा विसृष्टां मदपेक्ष | १३ | ६७ | | परस्पराक्षिसादृश्य | १ | ४० | पित्रा संवर्धितो नित्यं | १७ | ६२ | | परस्पराभ्युक्षणतत्प | १६ | ५७ | पित्र्यमंशमुपवीतल | ११ | ६४ | | परस्परा विरुद्धास्ते | १० | ८० | पुण्डरीकातपत्रस्तं | ४ | १७ | | परस्परेण क्षतयोः | ७ | ५३ | पुत्रजन्मप्रवेश्यानां | १० | ७६ | | परस्परेण विज्ञात | ४ | ७९ | पुत्रो रघुस्तस्य पदं | ६ | ७६ | | परस्परेण स्पृहणीय | ७ | १४ | पुरंदरश्रीः पुरमु | २ | ७४ | | परात्मनोः परिच्छिद्य | १७ | ५९ | पुरं निषादाधिपते | १३ | ५९ | | पराभिसंधानपरं यद्य | १७ | ७६ | पुरस्कृता वर्त्मनि | २ | २० | | परार्ध्यवर्णस्तरणोप | ६ | ४ | पुराणस्य कवेस्तस्य | १० | ३६ | | परिकल्पितसांनिध्या | ४ | ६ | पुरा शक्रमुपस्थाय | १ | ७५ | | परिचयं चललक्ष्य | ९ | ४९ | पुरा स दर्भाङ्कुरमात्र | १३ | ३१ | | परेण भग्नेऽपि | ७ | ५५ | पुरुषस्य पदेष्वजन्मन् | ८ | ७८ | | परेषु स्वेषु च क्षिप्तैर | १७ | ५१ | पुरुषायुषजीविन्यो | १ | ६३ | | पर्णशालामथ क्षिप्रं | १२ | ४० | पुरूहूतध्वजस्येव | ४ | ३ | | पर्यन्तसंचारितचा | १८ | ४३ | पुरूहूतप्रभृतयः | १० | ४९ | | पवनस्यानुकूलत्वा | १ | ४२ | पुरोपकण्ठोपवना | ६ | ९ | | पश्यावरोधैः शतशो | १६ | ५८ | पुरोहितपुरोगास्तं जिष्णु | १७ | १३ | | पाण्ड्योऽयमंसार्पितलम्ब | ६ | ६० | पुष्पं फलं चार्तवमाह | १४ | ७७ | | पात्रीकृतात्मा गुरुसेव | १८ | ३० | पूर्वजन्मधनुषा समा | ११ | ८० | | पादपाविद्धपरिघः | १२ | ७३ | पूर्वं प्रहर्ता न जघान | ७ | ४७ |
४२ र० सम्पू०
१५८ | रघुवंशमहाकाव्ये
| पादः / श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | पादः / श्लोकः | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| पूर्ववृत्तकथितैः पुरा | ११ | १० | प्रदक्षिणप्रक्रमणात्कृ | ७ | २४ |
| पूर्वस्तयोरात्मसमे | १८ | १२ | प्रदक्षिणीकृत्य पय | २ | २१ |
| पूर्वानुभूतं स्मरता च | १३ | २८ | प्रदक्षिणीकृत्य हुतं | २ | ७१ |
| पृक्तस्तुषारैर्गिरिनि | २ | १३ | प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षं | १० | ९ |
| पृथिवीं शासत्तस्तस्य | १० | १ | प्रभानुलिप्तश्रीवत्सं | १० | १० |
| पृष्टनामान्वयो राज्ञा स | १५ | ५० | प्रभावस्तम्भितच्छायमा | १२ | २१ |
| पौत्रः कुशस्यापि कुशेश | १८ | ४ | प्रमदामनुसंस्थितः | ८ | ७२ |
| पौरस्त्यानेवमाक्रामं | ४ | ३४ | प्रमन्यवः प्रागपि कोस | ७ | ३४ |
| पौरेषु सोऽहं बहुलीभव | १४ | ३८ | प्रमुदितवरपक्षमेक | ६ | ८६ |
| प्रजानामेव भूत्यर्थं | १ | १८ | प्रययावातिथेयेषु | १२ | २५ |
| प्रजानां विनयाधा | १ | २४ | प्रलोभिताप्याकृतिलोभ | ६ | ५८ |
| प्रजावती दोहदशंसि | १४ | ४५ | प्रवृत्तमात्रेण पयांसि | १३ | १४ |
| प्रजास्तद्गुरुणा नद्यो | १७ | ४१ | प्रवृत्तावुपलब्धायां | १२ | ६० |
| प्रणिपत्य सुरास्तस्मै | १० | १५ | प्रवृद्धतापो दिवसोऽति | १६ | ४५ |
| प्रतापोऽग्रे ततः शब्दः | ४ | ३० | प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः स | १७ | ७१ |
| प्रतिकृतिरचनाभ्यो | १८ | ५३ | प्रवेश्य चैनं पुरम | ५ | ६२ |
| प्रतिजग्राह कालिङ्गस्त | ४ | ४० | प्रशमस्थितपूर्वपार्थि | ८ | १५ |
| प्रतिप्रयातेषु तपोध | १४ | १९ | प्रसन्नमुखरागं तं स्मित | १७ | ३१ |
| प्रतिशुश्राव काकुत्स्यस्ते | १५ | ४ | प्रसवैः सप्तपर्णानां | ४ | २३ |
| प्रतियोजयितव्यवल्ल | ८ | ४१ | प्रसादोदयादम्भः | ४ | २१ |
| प्रत्यक्षोऽप्यपरिच्छेद्यो | १० | २५ | प्रसादसुमुखे तस्मिंश्च | ४ | १८ |
| प्रत्यपद्यत चिराय | ११ | ३४ | प्रसादाभिमुखे तस्मिंश्च | १७ | ४६ |
| प्रत्यपद्यत तथेति | ११ | ८८ | प्रसाधिकालम्बितमग्र | ७ | ७ |
| प्रत्यब्रवीच्चैनमिषु | २ | ४२ | प्रस्थितायां प्रतिष्ठेथाः | १ | ८९ |
| प्रत्यभिज्ञानरत्नं च रामा | १२ | ६४ | प्रहारमूर्च्छापगमे | ७ | ४४ |
| प्रत्युवाच तमृषिर्न त | ११ | ८५ | प्राजापत्योपनीतं | १० | ५२ |
| प्रत्युवाच तमृषिर्निश | ११ | ४१ | प्रातः प्रयाणाभिमुखाय | ५ | २९ |
| 'प्रथमपरिगतार्थस्तं | ७ | ७१ | प्रातर्गत्य परिभोगशोभि | १९ | २१ |
| प्रथममन्यभृताभिरु | ९ | ३४ | प्रातर्यथोक्तव्रतपा | २ | ७० |
श्लोकानुक्रमणिका
५५९
| श्लोक | सर्गे | श्लोकः | श्लोक | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| प्राप्तानुगः सपदि शास | ९ | ८२ | बिभ्रतोऽस्त्रमचलेऽप्यकु | ११ | ७४ |
| प्राप्य चाशु जनस्थानं | १२ | ४२ | बिभ्रत्या कौस्तुभन्यासं | १० | ६२ |
| प्रायः प्रतापभग्नत्वाद | १७ | ७० | ब्राह्मे मुहूर्ते किल तस्य | ५ | ३६ |
| प्रायो विषाणपरिमोक्ष | ९ | ६२ | भ | ||
| प्रासादकालागुरुधूम | १४ | १२ | भक्तिः प्रतीक्ष्येषु कुलो | ५ | १४ |
| प्राहिणोच्च महितं महा | ११ | ४९ | भक्त्या गुरौ मय्यनुक | २ | ६३ |
| प्रियतमाभिरसौ तिसृ | ९ | १८ | भगवन्परवानयं जनः | ८ | ८१ |
| प्रियंवदात्प्राप्तमसो | ७ | ६१ | भज्यमानमतिमात्रक | ११ | ४६ |
| प्रियानुरागस्य मनः स | ३ | १० | भयोत्सृष्टविभूषणां | ४ | ५४ |
| प्रेक्ष्य दर्पणतलस्थमा | १९ | ३० | भरतस्तत्र गन्धर्वान्यु | १५ | ८८ |
| प्रेमगर्वितविपक्षमत्स | १९ | २० | भर्तापि तावत्क्रयकैशि | ७ | ३२ |
| फ | भर्तुः प्रणाशादथ शोच | १४ | १ | ||
| फलमस्योपहासस्य | १२ | ३७ | भल्लापवर्जितैस्तेषां | ४ | ६३ |
| ब | भवति विरलभक्ति | ५ | ७४ | ||
| बन्धच्छेदं स बद्धानां | १७ | १९ | भवानपीदं परवा | २ | ५६ |
| बभूव रामः सहसा स | १४ | ८४ | भव्यमुख्याः समारम्भाः | १७ | ५३ |
| बभौ तमनुगच्छन्ती वि | १२ | २६ | भस्मसात्कृतवतः पितृ | ११ | ८६ |
| बभौ भूयः कुमारत्वादा | १७ | ३० | भास्करश्च दिशमभ्युवा | ११ | ६१ |
| बभौ सदशनज्योत्स्ना | १० | ३७ | भीमकान्तैर्नृपगुणैः | १ | १६ |
| बलमार्तभयोपशान्त | ८ | ३१ | भुजमूधोरुबाहुल्यादे | १२ | ८८ |
| बलिक्रियावर्जितसैकता | १६ | २१ | भुवं कोष्णेन कुण्डोष्णी | १ | ८४ |
| बलैरध्युषितस्तस्य | ४ | ४६ | भूतानुकम्पा तव | २ | ४८ |
| बहुधाप्यागमर्भिन्नाः | १० | २६ | भूयस्ततो रघुपतिर्वि | १३ | ७६ |
| बाढमेष दिवसेषु | १९ | ५२ | भूयस्तपोव्ययो मा भूदा | १५ | ३७ |
| बाणभिन्नहृदया निपे | ११ | १९ | भूर्जेषु मर्मरीभूताः | ४ | ७३ |
| बालार्कप्रतिमेवाप्सु | १२ | १०० | भोगिभोगासनासीनं | १० | ७ |
| बाहुप्रतिष्टम्भविदू | २ | ३२ | भोगिवेष्टनमार्गेषु | ४ | ४८ |
| बाहुभिर्विटपाकारै | १० | ११ | भ्रमरैः कुसुमानुसारि | ८ | ३५ |
| भूभेदमात्रेण पदान्म | १३ | ३६ |
६६० रघुवंशमहाकाव्ये
म
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| मखांशभाजां प्रथमो | ३ | ४४ | मातलिस्तस्य माहेन्द्रमा | १२ | ८६ |
| मणौ महानील इति प्रभा | १८ | ४२ | मातृवर्गचरणस्पृशी | ११ | ७ |
| मतङ्गशापादवलेप | ५ | ५३ | मान्यः स मे स्थाव | २ | ४४ |
| मत्तेभरदनोत्कीर्ण | ४ | ५९ | मा भूदाश्रमपीडेति | १ | ३७ |
| मत्परं दुर्लभं मत्वा | १ | ६६ | मार्गैषिणी सा कटकान्त | १६ | ३१ |
| मत्स्यध्वजा वायुवशाद्वि | ७ | ४० | मित्रकृत्यमपदिश्य | १९ | ३१ |
| मदिराक्षि मदाननार्पि | ८ | ६८ | मिथुनं परिकल्पितं त्वया | ८ | ६१ |
| मदोदग्राः ककुद्मन्तः | ४ | २२ | मुक्तशेषविरोधेन | १० | १३ |
| मनसापि न विप्रियं मया | ८ | ५२ | मुखार्पणेषु प्रकृतिप्र | १३ | ९ |
| मनुप्रभृतिभिर्मान्यै | ४ | ७ | मुखावयवलूनां तां नै | १२ | ४३ |
| मनुष्यवाह्यं चतुरस्र | ६ | १० | मुरलामारुतोद्धूत | ४ | ५५ |
| मनोभिरामाः शृण्वन्तो | १ | ३९ | मृगवनोपगमक्षम | ९ | ५० |
| मनोज्ञगन्धं सहकार | १६ | ५२ | मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनिर्व्य | १३ | २५ |
| मन्त्रः प्रतिदिनं तस्य | १७ | ५० | मैथिलः सपदि सत्यसं | ११ | ४८ |
| मन्दः कवियशःप्रार्थी | १ | ३ | मैथिलस्य धनुरन्यपा | ११ | ७२ |
| मन्दोत्कण्ठाः कृतास्तेन | ४ | ९ | मोक्ष्यध्वे स्वर्गवन्दीनां | ११ | ४७ |
| मयि तस्य सुवृत्त वर्त | ८ | ७७ | |||
| मरणं प्रकृतिः शरीरिणां | ८ | ८७ | ### य | ||
| मरुतां पश्यतां तस्य | १४ | १०१ | यः कश्चन रघूणां हि | १५ | ७ |
| मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्स | २ | १० | यच्चकार विवरं शिला | ११ | १८ |
| मरुपृष्ठान्युदम्भांसि | ४ | ३१ | यतिपार्थिवलिङ्गधारि | ८ | १६ |
| मर्मरैरगुरुधूपगन्धि | १९ | ४१ | यत्कुम्भयोनेरधिगम्य | १६ | ७२ |
| महार्हसिंहासनसंस्थितो | ७ | १८ | यत्स लग्नसहकारमा | १९ | ४६ |
| महिमानं यदुत्कीर्त्य | १० | ३२ | यथा च वृत्तान्तमिमं स | ३ | ६६ |
| महीं महेच्छः पारेकीर्य | १८ | ३३ | यथा प्रह्लादनाच्चन्द्रः | ४ | १२ |
| महेन्द्रमास्थाय महोक्ष | ६ | ७२ | यथाविधिहुताग्नीनां | १ | ६ |
| महोक्षतां वत्सतरः | ३ | ३२ | यदात्थ राजन्यकुमार तं | ३ | ४८ |
| मातंगनक्रैः सहसोत्स | १३ | ११ | यदुवाच न तन्मिथ्या | १७ | ४२ |
| यदगोप्रतरकल्पोऽभूत्सं | १५ | १०१ | |||
| यन्ता हरेः सपदि संहृ | १२ | १०३ |
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोकः | सर्गः | श्लोकः | श्लोकः | सर्गः | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| यन्त्रप्रवाहैः शिशिरैः | १६ | ४९ | रघूणामन्वयं वक्ष्ये | १ | ९ |
| यमात्मनः सद्यनि सनि | ६ | ५६ | रघोरवष्टम्भमयेन | ३ | ५३ |
| यवनीमुखपद्मानां | ४ | ६१ | रजः कणैः खुरोद्धूतैः | १ | ८५ |
| यशोभिराब्रह्मसमं | १८ | २८ | रजोभिः स्यन्दनोद्भूतै | ४ | २९ |
| यः सुबाहुरिति राक्षसो | ११ | २९ | रणः प्रववृते तत्र भीमः | १२ | ७२ |
| यस्मिन्महीं शासति वाणि | ६ | ७५ | रतिस्मरो नूनमिमाव | ७ | १५ |
| यस्यात्मगेहे नयनाभि | ६ | ४७ | रतेर्गृहीतानु नयेन | ६ | २ |
| यस्यावरोधस्तनचन्द | ६ | ४८ | रथाङ्गनाम्नोरिव भाव | ३ | २४ |
| यां सैकतोत्सङ्गसुखोचि | १३ | ६२ | रथात्स यन्त्रा निगृहीत | १४ | ५२ |
| यासौ राज्यप्रकाशाभिर्व | १५ | २९ | रथी निष्षङ्गी कवची | ७ | ५६ |
| यावत्प्रतापनिविधरा | ५ | ७१ | रथो रथाङ्गध्वनिना | ७ | ४१ |
| यावदादिशति पार्थिव | ११ | ३ | रसातलादादिभवेन | १३ | ८ |
| यावन्नाश्यायते वेदिर्भि | १७ | ३७ | रसान्तराण्येकरसं | १० | १७ |
| युधाजितश्च संदेशात्स | १५ | ८७ | राघवान्वितमुपस्थितं | ११ | ३५ |
| युवां युगव्यायतबाहुं | ३ | ३४ | राघवास्त्रविदीर्णानां | १२ | ५१ |
| यूपवत्यवसिते क्रिया | ११ | ३७ | राघवोऽपि चरणौ तपो | ११ | ८९ |
| येनं रोषपरुषात्मनः | ११ | ६५ | राघवो रथमप्राप्तां ना | १२ | ९६ |
| योगनिद्रान्तविशदैः | १० | १४ | राजन्यप्रजासु ते कश्चिद | १५ | ४७ |
| योषितामुडुपतेरिवा | १९ | ३४ | राजर्षिवंशस्य रविप्रसू | १४ | ३७ |
| यौवनोन्नतविलासिनी | १९ | ९ | राजसत्वमवधूय मातु | ११ | ९० |
| र | राजापि तद्वियोगातंः | १२ | १० | ||
| रक्षसा मृगरूपेण व | १२ | ५३ | रांत्रावनाविष्कृतदीपभा | १६ | २० |
| रक्षोवघान्तो न च मे प्र | १४ | ४१ | रात्रिंदिवविभागेषु | १७ | ४९ |
| रघुनाथोऽप्यगस्त्येन | १५ | ५४ | रात्रिर्गता मतिमतां | ५ | ६६ |
| रघुपतिरपि जातवे | १२ | १०४ | राम इत्यभिरामेण | १० | ६७ |
| रघुमेव निवृत्तयौव | ८ | ५ | रामं पदातिमालोक्य | १२ | ८४ |
| रघुरश्रुमुखस्य तस्य | ८ | १३ | राममन्मथशरेण ता | ११ | २० |
| रघुर्भृ शं वक्षसि तेन | ३ | ६१ | रामस्तवासनदेशत्वाद्भू | १२ | २४ |
| रघुवंशप्रदीपेन | १० | ६८ | रामस्य मधुरं वृत्तं | १५ | ३४ |
६६२ रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्ग | श्लोकः | सर्ग | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| रामाज्ञाया हरिचमूपत | १३ | ७४ | वचसैव तयोर्वाक्यम | १२ | ९२ |
| रामादेशादनुगता सेना | १५ | ९ | वत्सस्य होमार्थविधे | २ | ६६ |
| रामोऽपि सह वैदेह्या | १२ | २० | वत्सोत्सुकापि स्तिमि | २ | २२ |
| रावणस्यापि रामास्तो | १२ | ९१ | वधनिर्धूतशापस्य | १२ | ५७ |
| रावणावग्रहक्लान्त | १० | ४८ | वधूर्भक्तिमती चैना | १ | ९० |
| रावणावरजा तत्र राघ | १२ | ३२ | वनान्तरादुपावृत्तः | १ | ४९ |
| रुदता कुत एव सा | ८ | ८५ | वनेषु सायंतनमल्लि | १६ | ४७ |
| रूपं तदोजस्वि तदे | ५ | ३७ | वन्यवृत्तिरिमां शश्व | १ | ८८ |
| रूपे गीते च माधुर्यं | १५ | ६५ | वपुषा करणोज्झितेन | ८ | ३८ |
| रेखामात्रमपि | १ | १७ | वयसां पङ्क्तयः पेतुर्ह्रं | १५ | २५ |
| ल | वयोरूपविभूतीनामे | १७ | ४३ | ||
| लक्ष्मणः प्रथमं श्रुत्वा को | १२ | ३९ | वयोवेषविसंवादिरा | १५ | ६७ |
| लक्ष्मणानुचरमेव | ११ | ६ | वर्जोदकैः काञ्चनशृङ्ग | १६ | ७० |
| लक्ष्यते स्म तदनन्तरं | ११ | ५९ | वंशस्थितिं वंशकरेण | १८ | ३१ |
| लक्ष्यीकृतस्य हरिणस्य | ९ | ५७ | वसिष्ठधेनोरनुया | २ | १९ |
| लङ्केश्वरप्रणतिभङ्ग | १३ | ७८ | वसिष्ठमन्त्रोक्षणजा | ५ | २७ |
| लताप्रतानोद्ग्रथितैः | २ | ८ | वशी विवेश चायोध्यां | १५ | ३८ |
| लब्धपालनविधौ न | १९ | ३ | वशी सुतस्तस्य वशंव | १८ | १३ |
| लब्धप्रशमनस्वस्थ | ४ | १४ | वसन्स तस्यां वसतौ | १६ | ४२ |
| लब्धान्तरा सावरणेऽपि | १६ | ७ | वसिष्ठस्य गुरोर्मन्त्राः सा | १७ | ३८ |
| ललाटोदयमाभुग्नं | १ | ८३ | वस्वोकसारामभिभूय | १६ | १० |
| ललितविभ्रमबन्धवि | ९ | ३६ | वागर्थाविव संपृक्तौ | १ | १ |
| लवणेन विलुप्तेज्यास्ता | १५ | २ | वाङ्मनःकर्मभिः पत्यौ | १५ | ८१ |
| लिङ्गैर्मुदः संवृतविक्रि | ७ | ३० | वाच्यमत्वात्प्रणति | १३ | ४४ |
| लोकान्तरसुखं पुण्यं | १ | ६९ | वाच्यस्त्वया मद्वचनात्स | १४ | ६१ |
| लोकेन भावी पितुरेव | १८ | ३८ | वापीष्विव स्रवन्तीषु | १७ | ६४ |
| लौल्यमेत्य गृहिणी परि | १९ | १९ | वामनाश्रमपदं ततः | ११ | २२ |
| व | वामेतरस्तस्य करः | २ | ३१ | ||
| वङ्गानुत्खाय तरसा | ४ | ३६ | वार्षिकं संजहारेन्द्रो | ४ | १६ |
श्लोकानुक्रमणिका ६६३
| श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| विक्रमव्यतिहारेण सामा | १२ | ९३ | वीक्ष्य वेदिमथ रक्तवि | ११ | २५ |
| विग्रहाच्चं शयने पराङ्मु | १९ | ३८ | वीचिलोलभुजयोस्तयो | ११ | ८ |
| वितानसहितं तत्र भेजे | १७ | २८ | वीरासनैर्ध्यानजुषामृ | १३ | ५२ |
| विदितं तप्यमानं च | १० | ३९ | वृक्षेशयायष्टिनिवासभ | १६ | १४ |
| विद्धि चात्तबलमोजसा | ११ | ७६ | वृत्तं रामस्य वाल्मीकेः | १५ | ६४ |
| विद्वानपि तयोर्द्वास्थ्यः | १५ | ९४ | वृन्ताच्छ्लथं हरति | ५ | ६९ |
| विघ्नेरधिकसंभारस्ततः | १५ | ६२ | वेणुना दशनपीडिताध | १९ | ३५ |
| विधेः सायन्तनस्यान्ते | १ | ५६ | वेलानिलः केतकरेणु | १३ | १६ |
| विनयंन्ते स्म तद्योधा | ४ | ६५ | वेलानिलाय प्रसृताभु | १३ | १२ |
| विनाशात्तस्य वृक्षस्य | १५ | २१ | वेश्मानि रामः परिवर्हं | १४ | १५ |
| विनीताध्वश्रमांस्त | ४ | ६७ | वैदर्भनिर्दिष्टमसो कु | ६ | ३ |
| विन्ध्यस्य संस्तम्भयिताम | ६ | ६१ | वैदेहि पश्यामलयादद्रि | १३ | २ |
| विप्रोषितकुमारं तद्राज्यं | १२ | ११ | वैमानिकाः पुण्यकृत | १० | ४६ |
| विभक्तात्मा विभुस्तासा | १० | ६५ | वैवस्वतो मनुर्नाम | १ | ११ |
| विभवेऽपि सति त्वया | ६ | ६९ | व्याघ्रानभीरभिमुखोत्प | ९ | ६३ |
| विभावसुः सारथिनेव | ३ | ३७ | व्यादिदेश गणशोऽथ | ११ | ४३ |
| विभूषणप्रत्युपहारह | १६ | ८० | व्यूढोरस्को वृषस्कन्धः | १ | १३ |
| विरक्तसंध्याकपिशं | १३ | ६४ | व्यूहावुभौ तावितरेत | ७ | ५४ |
| विरचिता मधुनोपव | ९ | २९ | व्यूह्य स्थितः किंचिदिवोत्त | १८ | ५१ |
| विलपन्निति कोसलाधि | ८ | ७० | व्योमपश्चिमकला स्थिते | १९ | ५१ |
| विललाप स बाष्पगद्गं | ८ | ४३ | व्रणगुरुप्रमदाधर | ९ | ३२ |
| विलासिनीविभ्रमदन्त | ६ | १७ | व्रताय तेनानुचरेण | २ | ४ |
| विलुप्तमन्तःपुरसुन्द | १६ | ५९ | श | ||
| विलोचनं दक्षिणमञ्ज | ७ | ८ | शक्येष्वेवाभवद्यात्रा | १७ | ५६ |
| विशश्रमुर्नमेरूणां | ४ | ७४ | शङ्खस्वनाभिज्ञतया | ७ | ६४ |
| विशीर्णतल्पाट्टशतोनि | १६ | ११ | शतैस्तमक्षणामनिमेष | ३ | ४३ |
| विषादलुप्तप्रतिपत्ति | ३ | ४० | शत्रुघातिनि शत्रुघ्नः | १५ | ३६ |
| विसृष्टपार्श्वानुचरस्य | २ | ९ | शब्दादिनिर्विविश्य सुखं | १८ | ३ |
| विस्रस्तमसादपरो वि | ६ | १४ | शब्दादीन्विषयान्भोक्तुं | १० | २५ |
१६४ रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| शमितपक्षबलः शत | ९ | १२ | श्लाघ्यस्त्यागोऽपि वै | १५ | ६१ |
| शय्यागतेन रामेण | १० | ६९ | श्वगणिवागुरिकैः प्रथ | ९ | ५३ |
| शय्यां जहत्युभयप | ५ | ७२ | श्वश्रूजनं सर्वमनुक्रमेण | १४ | ६० |
| शरीरमात्रेण नरेन्द्र | ५ | १५ | श्वश्रूजनानुष्ठितचारु | १४ | १३ |
| शरीरसादादसमग्र | ३ | २ | स | ||
| शरैरुत्सवसंकेता | ४ | ७८ | स एवमुक्त्वा मघवन्त | ३ | ५२ |
| शशंस तुल्यसत्त्वानां | ४ | ७२ | स कदाचिदवेक्षित | ८ | ३२ |
| शशाम वृष्ट्यापि वि | २ | १४ | स किंवदन्तीं वदतां | १४ | ३१ |
| शशिनमुपगतेयं कौ | ६ | ८५ | स किल संयुगमूर्ध्नि स | ९ | १९ |
| शशिनं पुनरेति शर्वरी | ८ | ५६ | स किलाश्रममन्त्यमाश्रि | ८ | १४ |
| शापोऽप्यदृष्टतनयान | ९ | ८० | स कीचकैर्मारुतपूर्ण | २ | १२ |
| शिरीषपुष्पाधिकसौकु | १८ | ४५ | स कुलोचितमिन्द्रस्य सा | १७ | ५ |
| शिलीमुखोत्कृत्तशिरः | ७ | ४९ | स क्षेमधन्वानममोघ | १८ | ९ |
| शुशुभिरे स्मितचारु | ९ | ३७ | सखा दशरथस्यापि | १५ | ३१ |
| शुशुभे तेन चाक्रान्तं | १७ | २९ | स गत्वा सरयूतीरं देहत्या | १५ | ९५ |
| शैलोपमः शैवलम | ५ | ४६ | स गुणानां बलानां च | १७ | ६७ |
| शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां | १ | ८ | स गुप्तमूलप्रत्यन्तः | ४ | २६ |
| शोचनीयासि वसुधे यां | १५ | ४३ | संगमाय निशि गूढचारि | १९ | ३३ |
| श्मश्रुप्रवृद्धिजनिता न | १३ | ७१ | सङ्ग्रामनिर्विष्टसहस्र | ६ | ३८ |
| श्येनपक्षपरिधूसरा | ११ | ६० | सङ्ग्रामस्तुमुलस्तस्य | ४ | ६२ |
| श्रियः पद्मानिषण्णायाः | १० | ८ | स चतुर्धा बभौ व्यस्तः | १० | ८४ |
| श्रुतदेहविसर्जनः | ८ | २५ | स च प्राप मधूपघ्नं कुम्भी | १५ | १५ |
| श्रुतस्य यायादयमन्त | ३ | २१ | स चानुनीतः प्रणते | ५ | ५४ |
| श्रुतिसुखभ्रमरस्वन | ९ | ३५ | स चापकोटी निहितंक | ७ | ६६ |
| श्रुत्वा तथाविधं मृत्युं | १२ | १३ | स चापमुत्सृज्य विवृद्ध | ३ | ६० |
| श्रुत्वा तस्य शुचो हेतुं गो | १५ | ४४ | संचारपूतानि दिगन्त | २ | १५ |
| श्रुत्वा रामः प्रियोदन्तं मे | १२ | ६६ | संचारिणी दीपशिखेव | ६ | ६७ |
| श्रेणीबन्धाद्वितन्वद्भि | १ | ४१ | स च्छिन्नबन्धद्रुतयु | ५ | ४९ |
| श्रोत्राभिरामध्वनि | २ | ७२ | स च्छिन्नमूलः क्षतजेव | ७ | ४३ |
श्लोकानुक्रमणिका ६६५
| श्लोक | सर्ग | श्लोकः | श्लोक | सर्ग | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| स जहार तयोर्मध्ये | १२ | १९ | स धातुभेदारुणयानने | १६ | ३२ |
| स जातकर्मण्यखिले | ३ | १८ | संध्याभ्रकपिशस्तस्य वि | १२ | २८ |
| स तक्षपुष्कलो पुत्रौ | १५ | ८९ | स नन्दिनीस्तन्यमनि | २ | ६९ |
| स तत्र मञ्चेषु मनोज्ञ | ६ | १ | स नर्मदारोधसि | ५ | ४२ |
| स तथेति विनेतुरुदा | ८ | ९१ | स नादं मेघनादस्य | १२ | ७९ |
| स तद्वक्त्रं हिमक्लिष्टकि | १५ | ५२ | स निर्विश्य यथाकामं | ४ | ५१ |
| स तपःप्रतिबन्धमन्यु | ८ | ८० | स निवेश्य कुशावत्यां | १५ | ९७ |
| संतानकमयी वृष्टि | १० | ७७ | स नैषधस्यार्थपतेः सुता | १८ | १ |
| संतानकामाय तथे | २ | ६५ | स नौ विमानादवतीर्य | १६ | ६८ |
| संतानश्रवणाद्भ्रातुः सीमि | १९ | १४ | सन्तस्तस्याभिगमनाद | १७ | ७२ |
| संतानार्थाय विधये | १ | ३४ | स न्यस्तचिह्नामपि | २ | ७ |
| स तावदभिषेकान्ते | १७ | १७ | स परार्ध्यगतेरशोच्य | ८ | २७ |
| स तावाख्याय रामाय | १५ | ७१ | स पल्वलोत्तीर्णवराह | २ | १७ |
| स तीरभूमी विहितोप | १६ | ५५ | स पाटलायां गवि | २ | २९ |
| स तीर्त्वा कपिशां सैन्यै | ४ | ३८ | स पितुः पितृमान्वंशमा | १७ | २ |
| स तेजो वैष्णवं पत्न्यो | १० | ५४ | स पुरं पुरुहूतश्रीः कल्प | १७ | ३२ |
| स तौ कुशलवोन्मृष्टगर्भ | १५ | ३२ | स पूर्वजन्मान्तरदृष्ट | १८ | ५० |
| सत्रान्ते सचिवसखः | ४ | ८७ | स पूर्वजानां कपिलेन | १६ | ३४ |
| सत्यामपि तपःसिद्धौ | १ | ९४ | स पूर्वतः पर्वतपक्षसा | ३ | ४२ |
| स त्वं निवर्तस्व विहाय | २ | ४० | स पृष्टः सर्वतो वार्तामा | १५ | ४१ |
| स त्वनेकवनितासखो | १९ | ५३ | स पौरकार्याणि समीक्ष्य | १४ | २४ |
| स त्वं प्रशस्ते महिते | ५ | २५ | सप्तच्छदक्षीरकटु | ५ | ४८ |
| स त्वं मदीयेन शरीर | २ | ४५ | सप्तसामोपगीतं त्वां | १० | २१ |
| संदष्टवस्त्रेष्वबलानि | १६ | ६५ | स प्रतस्थेऽरिनाशाय | १२ | ६७ |
| स दक्षिणं तूणमुखेन | ७ | ५७ | स प्रतापं महेन्द्रस्य | ४ | ३९ |
| स ददर्श सभामध्ये स | १५ | ३९ | स प्राप हृदयन्यस्तमणि | १२ | ६५ |
| सदयं बुभुजे महाभु | ८ | ७ | स बभूव दुरासदः | ८ | ४ |
| स दुष्प्रापयशाः प्राप | १ | ४८ | संबन्धमाभाषणपूर्वं | २ | ५८ |
| स धर्मस्य सखः शश्वद | १७ | ३९ | सभाजनायोपगतान्स | १४ | १८ |
६६६
रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| संभाव्य भर्तारममुं | ६ | ५० | सर्वत्र नो वार्तमवेहि | ५ | १३ |
| संमोचितः सत्त्ववता | ५ | ५६ | सर्वातिरिक्तसारेण | १ | १४ |
| संमोहनं नाम सखे | ५ | ५७ | सर्वासु मातृष्वपि वत्स | १४ | २२ |
| सम्यग्विनीतमथ वर्म | ८ | ९४ | सर्वेर्बलाङ्गैर्द्विरदप्र | ७ | ५९ |
| समतया वसुवृष्टिवि | ९ | ६ | स लक्ष्मणं लक्ष्मणपूर्व | १४ | ४४ |
| समदुःखसुखः सखीज | ८ | ६५ | स ललितकुसुमप्रवाल | ९ | ७० |
| सममापन्नसावास्ता | १० | ५९ | स विभुर्विबुधांशेषु | १५ | १०२ |
| सममेव समाक्रान्तं | ४ | ४ | स विद्धमात्रः किल ना | ५ | ५१ |
| समानेऽपि हि सौभ्रात्रे | १० | ८१ | स विवेश पुरीं तया | ८ | ७४ |
| समाप्तविघ्नेन मया | ५ | २० | स विश्वजितमाजह्रे | ४ | ८६ |
| स मारुतिसमानीतमहौ | १२ | ७८ | स विसृष्टस्तथेत्युक्त्वा | १२ | १८ |
| समुद्रपत्त्योर्जलसंनि | १३ | ५८ | स वृत्तचूलश्चलकाक | ३ | २८ |
| स मुहूतं क्षमस्वेति | १५ | ४५ | स वेलावप्रवलया | १ | ३० |
| स मृण्मये वीतहिर | ५ | २ | स शापो न त्वया राज | १ | ७८ |
| स मोलरक्षोहरिभिः स | १४ | १० | स शुश्रुवान्मातरि भाग | १४ | ४६ |
| स ययौ प्रथमं प्राचीं | ४ | २८ | सशोणितैस्तेन शिलीमु | ७ | ३५ |
| संरम्भं मैथिलीहासः | १५ | ३६ | ससज्जुरश्वक्षुण्णानां | ४ | ४७ |
| सरलासक्तमातङ्ग | ४ | ७५ | स संनिपात्यावरजान्ह | १४ | ३६ |
| सरसीष्वरविन्दानां | १ | ४३ | स सत्त्वमादाय नदीमु | १३ | १० |
| स राजककुदव्यग्रपाणि | १७ | २७ | स सीतालक्ष्मणसखः स | १२ | ९ |
| स राजलोकः कृपवं | ७ | ३१ | स सेतुं बन्धयामास | १२ | ७० |
| स राज्यं गुरुणा दत्तं | ४ | १ | स सेनां महतीं कर्षन्पू | ४ | ३२ |
| स रावणहतां ताभ्यां | १२ | ५५ | स सैन्यपरिभोगेन | ४ | ४५ |
| सरितः कुर्वती गाधाः | ४ | २४ | स सैन्यश्चान्वगाद्रामं | १२ | ९४ |
| सरित्समुद्रान्तरसीञ्च | १४ | ८ | स स्वयं चरणरागमा | १९ | २६ |
| संरुद्धचेष्टस्य मृगे | २ | ४३ | स स्वयं प्रहतपुष्करः | १९ | १४ |
| सरोषदष्टाधिकलोहि | ७ | ५८ | संहारविक्षेपलघु | ५ | ४५ |
| सर्पस्येव शिरोरत्नं ना | १७ | ६३ | स हुत्वा लवणं वीरस्त | १५ | २६ |
| रवेञ्जस्तवमविज्ञात | १० | २० | स हत्वा बालिनं वीरस्त | १२ | ५८ |
श्लोकानुक्रमणिका
| श्लोकः | सर्गः | श्लोकः | श्लोकः | सर्गः | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| स हि प्रथमजे तस्मिन्न | १२ | १६ | सुखश्रवा मङ्गलतूर्य | ३ | १९ |
| स हि सर्वस्य लोकस्य | ४ | ८ | सुतां तदीयां सुरभेः | १ | ८१ |
| सा किलाश्वासिता चण्डी | १२ | ५ | सुते शिशोवेव सुदर्शना | १८ | ३५ |
| सा केतुमालोपवना | १६ | २६ | सुतौ लक्ष्मणशत्रुघ्नौ | १० | ७१ |
| साङ्गं च वेदमध्याप्य किं | १५ | १३ | सुरगज इव दन्तैर्भ | १० | ८६ |
| सा चूर्णगौरं रघुनन्दन | ६ | ८३ | सुरतश्रमसंभृतो | ८ | ५१ |
| सातिरेकमदकारणं | १९ | १२ | सुरेन्द्रमात्राश्रितगर्भ | ३ | ११ |
| सा तीरसोपानपथाव | १६ | ५६ | सुवदनावदनासव | ९ | ३० |
| सा दृष्टनीवारबलीनि | १४ | २८ | सेकान्ते मुनिकन्याभिः | १ | ५१ |
| सा दुर्निमित्तोपगताद्वि | १४ | ५० | सेनानिवेशान्पृथिवीक्षि | ७ | २ |
| सा दुष्प्रधर्षा मनसा | २ | २७ | सेनापरिच्छदस्तस्य | १ | १९ |
| साधयाम्यहमविघ्नम | ११ | ९१ | सेयं मदीया जननीव | १३ | ६३ |
| सांनिध्ययोगात्किल तत्र | ७ | ३ | सेयं स्वदेहार्पणनि | २ | ५५ |
| सा नीयमाना रुचिरान्न | १४ | ४८ | सेव्यमानो सुखस्पर्शः | १ | ३८ |
| सानुप्लवः प्रभुरपि | १३ | ७५ | सैकतं च सरयू विवृ | १९ | ४० |
| सा पौरान्पौरकान्तस्य | १२ | ३ | संषा स्थली यत्र विचिन्व | १३ | २३ |
| सा बाणवर्षिणं रामं यो | १२ | ५० | सोऽधिकारमभिकः | १९ | ४ |
| सा मंदुरा संश्रयिभिस्तु | १६ | ४१ | सोऽपश्यत्प्रणिधानेन | १ | ७४ |
| सा यूनि तस्मिन्नभिलाष | ६ | ८१ | सोपानमार्गेषु च येषु | १६ | १५ |
| सा लुप्तसंज्ञा न विवेद | १४ | ५६ | सोऽस्त्रव्रजैश्छन्नरथः प | ७ | ६० |
| सा वक्रनखधारिण्या | १२ | ४१ | सोऽस्त्रमुग्रजवमस्त्रको | ११ | २८ |
| सा शूरसेनाधिपतिं सु | ६ | ४५ | सोऽहं दाशरथिर्भूत्वा | १० | ४४ |
| सा साधुसाधारणपार्थिव | १६ | ५ | सोऽहं सपर्याविधिभा | ५ | २२ |
| सा सीतामङ्कमारोप्य | १५ | ८४ | सोऽहमाजन्मशुद्धा | १ | ५ |
| सा सीतासंनिधावेव तं | १२ | ३३ | सोऽहमिज्याविशुद्धात्मा | १ | ६८ |
| साहं तपः सूर्यनिविष्ट | १४ | ६६ | सौमित्रिणा तदनु संस | १३ | ७३ |
| सा हि प्रणयवत्यासी | १० | ५७ | सौमित्रिणा सावरजेन | १४ | ११ |
| सीता तमुत्थाप्य जगाद | १४ | ५९ | सौमित्रेर्निशितैर्बाणैर | १५ | २० |
| सीतां हित्वा दशमुखरि | १४ | ८७ | स्तम्भेषु योषित्प्रतिमा | १६ | १७ |
६६८ रघुवंशमहाकाव्ये
| श्लोक-प्रतीक | सर्गः | श्लोकः | श्लोक-प्रतीक | सर्गः | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| स्तूयमानः क्षणे तस्मि | १७ | १५ | स्वासिधारापरिहृतः | १० | ४१ |
| स्तूयमानः स जिह्वाय स्तु | १७ | ७३ | स्वेदानुविद्धाद्रंनखक्ष | १६ | ४८ |
| ह | |||||
| स्थाणुदग्धवपुषस्तपो | ११ | १३ | हंसश्रेणीषु तारासु | ४ | १९ |
| स्थाने भवानेकनरा | ६ | १६ | हरैर्यथैकः पुरुषोत्त | ३ | ४९ |
| स्थाने वृता भूपतिभिः | ७ | १३ | हरेः कुमारोऽपि कुमार | ३ | ५५ |
| स्थितः स्थितामुच्चलितः | २ | ६ | हविर्भुजामेघवतां च | १३ | ४१ |
| स्थित्यै दण्डयतो दण्ड्यां | १ | १५ | हविरावर्जिते होत | १ | ६२ |
| स्नात्वा यथाकाममसो | १६ | ७३ | हविःशमीपल्लवलाज | ७ | २६ |
| स्नानाद्रंमुक्तेष्वनुधूप | १६ | ५० | हविषे दीर्घसत्रस्य | १ | ८० |
| स्निग्धगम्भीरनिर्घोष | १ | ३६ | हस्तेन हस्तं परिगृह्य | ७ | २१ |
| स्फुरत्प्रभामण्डलभानु | १४ | १४ | हा तातेति क्रन्दितमाक | ९ | ७५ |
| स्मरतेव सशब्दनूपु | ८ | ६३ | हीनान्यनुपकर्तृणि | १७ | ५८ |
| स्रगियं यदि जीवितापहा | ८ | ४६ | हुतहुताशनदीप्तिव | ९ | ४० |
| स्रष्टुर्वरतिसर्गात्तु | १० | ४२ | हृष्टापि सा ह्रीविजिता | ७ | ६९ |
| स्वप्रकीर्तितविपक्षमङ्गनाः | १९ | २२ | हृदबस्थमनासन्न | १० | १९ |
| स्वरसंस्कारवत्यासौ पुत्रा | १५ | ७६ | हेमपक्षप्रभाजालं | १० | ६१ |
| स्वर्गामिनस्तस्य तर्मै | १८ | ३६ | हेमपत्रागतं दोर्भ्यामा | १० | ५१ |
| स्वशरीरशरीरिणाव | ८ | ८९ | हैयंगवीनमादाय | १ | ४५ |
| स्वसुर्विदर्भाधिपतेस्त | ६ | ६६ | ह्रेपिता हि बहवो नरे | ११ | ४० |
| स्वाभाविकं विनीतत्वं | १० | ७९ |