रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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६६२ रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्ग | श्लोकः | सर्ग | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| रामाज्ञाया हरिचमूपत | १३ | ७४ | वचसैव तयोर्वाक्यम | १२ | ९२ |
| रामादेशादनुगता सेना | १५ | ९ | वत्सस्य होमार्थविधे | २ | ६६ |
| रामोऽपि सह वैदेह्या | १२ | २० | वत्सोत्सुकापि स्तिमि | २ | २२ |
| रावणस्यापि रामास्तो | १२ | ९१ | वधनिर्धूतशापस्य | १२ | ५७ |
| रावणावग्रहक्लान्त | १० | ४८ | वधूर्भक्तिमती चैना | १ | ९० |
| रावणावरजा तत्र राघ | १२ | ३२ | वनान्तरादुपावृत्तः | १ | ४९ |
| रुदता कुत एव सा | ८ | ८५ | वनेषु सायंतनमल्लि | १६ | ४७ |
| रूपं तदोजस्वि तदे | ५ | ३७ | वन्यवृत्तिरिमां शश्व | १ | ८८ |
| रूपे गीते च माधुर्यं | १५ | ६५ | वपुषा करणोज्झितेन | ८ | ३८ |
| रेखामात्रमपि | १ | १७ | वयसां पङ्क्तयः पेतुर्ह्रं | १५ | २५ |
| ल | वयोरूपविभूतीनामे | १७ | ४३ | ||
| लक्ष्मणः प्रथमं श्रुत्वा को | १२ | ३९ | वयोवेषविसंवादिरा | १५ | ६७ |
| लक्ष्मणानुचरमेव | ११ | ६ | वर्जोदकैः काञ्चनशृङ्ग | १६ | ७० |
| लक्ष्यते स्म तदनन्तरं | ११ | ५९ | वंशस्थितिं वंशकरेण | १८ | ३१ |
| लक्ष्यीकृतस्य हरिणस्य | ९ | ५७ | वसिष्ठधेनोरनुया | २ | १९ |
| लङ्केश्वरप्रणतिभङ्ग | १३ | ७८ | वसिष्ठमन्त्रोक्षणजा | ५ | २७ |
| लताप्रतानोद्ग्रथितैः | २ | ८ | वशी विवेश चायोध्यां | १५ | ३८ |
| लब्धपालनविधौ न | १९ | ३ | वशी सुतस्तस्य वशंव | १८ | १३ |
| लब्धप्रशमनस्वस्थ | ४ | १४ | वसन्स तस्यां वसतौ | १६ | ४२ |
| लब्धान्तरा सावरणेऽपि | १६ | ७ | वसिष्ठस्य गुरोर्मन्त्राः सा | १७ | ३८ |
| ललाटोदयमाभुग्नं | १ | ८३ | वस्वोकसारामभिभूय | १६ | १० |
| ललितविभ्रमबन्धवि | ९ | ३६ | वागर्थाविव संपृक्तौ | १ | १ |
| लवणेन विलुप्तेज्यास्ता | १५ | २ | वाङ्मनःकर्मभिः पत्यौ | १५ | ८१ |
| लिङ्गैर्मुदः संवृतविक्रि | ७ | ३० | वाच्यमत्वात्प्रणति | १३ | ४४ |
| लोकान्तरसुखं पुण्यं | १ | ६९ | वाच्यस्त्वया मद्वचनात्स | १४ | ६१ |
| लोकेन भावी पितुरेव | १८ | ३८ | वापीष्विव स्रवन्तीषु | १७ | ६४ |
| लौल्यमेत्य गृहिणी परि | १९ | १९ | वामनाश्रमपदं ततः | ११ | २२ |
| व | वामेतरस्तस्य करः | २ | ३१ | ||
| वङ्गानुत्खाय तरसा | ४ | ३६ | वार्षिकं संजहारेन्द्रो | ४ | १६ |