रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका ६६३
| श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| विक्रमव्यतिहारेण सामा | १२ | ९३ | वीक्ष्य वेदिमथ रक्तवि | ११ | २५ |
| विग्रहाच्चं शयने पराङ्मु | १९ | ३८ | वीचिलोलभुजयोस्तयो | ११ | ८ |
| वितानसहितं तत्र भेजे | १७ | २८ | वीरासनैर्ध्यानजुषामृ | १३ | ५२ |
| विदितं तप्यमानं च | १० | ३९ | वृक्षेशयायष्टिनिवासभ | १६ | १४ |
| विद्धि चात्तबलमोजसा | ११ | ७६ | वृत्तं रामस्य वाल्मीकेः | १५ | ६४ |
| विद्वानपि तयोर्द्वास्थ्यः | १५ | ९४ | वृन्ताच्छ्लथं हरति | ५ | ६९ |
| विघ्नेरधिकसंभारस्ततः | १५ | ६२ | वेणुना दशनपीडिताध | १९ | ३५ |
| विधेः सायन्तनस्यान्ते | १ | ५६ | वेलानिलः केतकरेणु | १३ | १६ |
| विनयंन्ते स्म तद्योधा | ४ | ६५ | वेलानिलाय प्रसृताभु | १३ | १२ |
| विनाशात्तस्य वृक्षस्य | १५ | २१ | वेश्मानि रामः परिवर्हं | १४ | १५ |
| विनीताध्वश्रमांस्त | ४ | ६७ | वैदर्भनिर्दिष्टमसो कु | ६ | ३ |
| विन्ध्यस्य संस्तम्भयिताम | ६ | ६१ | वैदेहि पश्यामलयादद्रि | १३ | २ |
| विप्रोषितकुमारं तद्राज्यं | १२ | ११ | वैमानिकाः पुण्यकृत | १० | ४६ |
| विभक्तात्मा विभुस्तासा | १० | ६५ | वैवस्वतो मनुर्नाम | १ | ११ |
| विभवेऽपि सति त्वया | ६ | ६९ | व्याघ्रानभीरभिमुखोत्प | ९ | ६३ |
| विभावसुः सारथिनेव | ३ | ३७ | व्यादिदेश गणशोऽथ | ११ | ४३ |
| विभूषणप्रत्युपहारह | १६ | ८० | व्यूढोरस्को वृषस्कन्धः | १ | १३ |
| विरक्तसंध्याकपिशं | १३ | ६४ | व्यूहावुभौ तावितरेत | ७ | ५४ |
| विरचिता मधुनोपव | ९ | २९ | व्यूह्य स्थितः किंचिदिवोत्त | १८ | ५१ |
| विलपन्निति कोसलाधि | ८ | ७० | व्योमपश्चिमकला स्थिते | १९ | ५१ |
| विललाप स बाष्पगद्गं | ८ | ४३ | व्रणगुरुप्रमदाधर | ९ | ३२ |
| विलासिनीविभ्रमदन्त | ६ | १७ | व्रताय तेनानुचरेण | २ | ४ |
| विलुप्तमन्तःपुरसुन्द | १६ | ५९ | श | ||
| विलोचनं दक्षिणमञ्ज | ७ | ८ | शक्येष्वेवाभवद्यात्रा | १७ | ५६ |
| विशश्रमुर्नमेरूणां | ४ | ७४ | शङ्खस्वनाभिज्ञतया | ७ | ६४ |
| विशीर्णतल्पाट्टशतोनि | १६ | ११ | शतैस्तमक्षणामनिमेष | ३ | ४३ |
| विषादलुप्तप्रतिपत्ति | ३ | ४० | शत्रुघातिनि शत्रुघ्नः | १५ | ३६ |
| विसृष्टपार्श्वानुचरस्य | २ | ९ | शब्दादिनिर्विविश्य सुखं | १८ | ३ |
| विस्रस्तमसादपरो वि | ६ | १४ | शब्दादीन्विषयान्भोक्तुं | १० | २५ |