रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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१६४ रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| शमितपक्षबलः शत | ९ | १२ | श्लाघ्यस्त्यागोऽपि वै | १५ | ६१ |
| शय्यागतेन रामेण | १० | ६९ | श्वगणिवागुरिकैः प्रथ | ९ | ५३ |
| शय्यां जहत्युभयप | ५ | ७२ | श्वश्रूजनं सर्वमनुक्रमेण | १४ | ६० |
| शरीरमात्रेण नरेन्द्र | ५ | १५ | श्वश्रूजनानुष्ठितचारु | १४ | १३ |
| शरीरसादादसमग्र | ३ | २ | स | ||
| शरैरुत्सवसंकेता | ४ | ७८ | स एवमुक्त्वा मघवन्त | ३ | ५२ |
| शशंस तुल्यसत्त्वानां | ४ | ७२ | स कदाचिदवेक्षित | ८ | ३२ |
| शशाम वृष्ट्यापि वि | २ | १४ | स किंवदन्तीं वदतां | १४ | ३१ |
| शशिनमुपगतेयं कौ | ६ | ८५ | स किल संयुगमूर्ध्नि स | ९ | १९ |
| शशिनं पुनरेति शर्वरी | ८ | ५६ | स किलाश्रममन्त्यमाश्रि | ८ | १४ |
| शापोऽप्यदृष्टतनयान | ९ | ८० | स कीचकैर्मारुतपूर्ण | २ | १२ |
| शिरीषपुष्पाधिकसौकु | १८ | ४५ | स कुलोचितमिन्द्रस्य सा | १७ | ५ |
| शिलीमुखोत्कृत्तशिरः | ७ | ४९ | स क्षेमधन्वानममोघ | १८ | ९ |
| शुशुभिरे स्मितचारु | ९ | ३७ | सखा दशरथस्यापि | १५ | ३१ |
| शुशुभे तेन चाक्रान्तं | १७ | २९ | स गत्वा सरयूतीरं देहत्या | १५ | ९५ |
| शैलोपमः शैवलम | ५ | ४६ | स गुणानां बलानां च | १७ | ६७ |
| शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां | १ | ८ | स गुप्तमूलप्रत्यन्तः | ४ | २६ |
| शोचनीयासि वसुधे यां | १५ | ४३ | संगमाय निशि गूढचारि | १९ | ३३ |
| श्मश्रुप्रवृद्धिजनिता न | १३ | ७१ | सङ्ग्रामनिर्विष्टसहस्र | ६ | ३८ |
| श्येनपक्षपरिधूसरा | ११ | ६० | सङ्ग्रामस्तुमुलस्तस्य | ४ | ६२ |
| श्रियः पद्मानिषण्णायाः | १० | ८ | स चतुर्धा बभौ व्यस्तः | १० | ८४ |
| श्रुतदेहविसर्जनः | ८ | २५ | स च प्राप मधूपघ्नं कुम्भी | १५ | १५ |
| श्रुतस्य यायादयमन्त | ३ | २१ | स चानुनीतः प्रणते | ५ | ५४ |
| श्रुतिसुखभ्रमरस्वन | ९ | ३५ | स चापकोटी निहितंक | ७ | ६६ |
| श्रुत्वा तथाविधं मृत्युं | १२ | १३ | स चापमुत्सृज्य विवृद्ध | ३ | ६० |
| श्रुत्वा तस्य शुचो हेतुं गो | १५ | ४४ | संचारपूतानि दिगन्त | २ | १५ |
| श्रुत्वा रामः प्रियोदन्तं मे | १२ | ६६ | संचारिणी दीपशिखेव | ६ | ६७ |
| श्रेणीबन्धाद्वितन्वद्भि | १ | ४१ | स च्छिन्नबन्धद्रुतयु | ५ | ४९ |
| श्रोत्राभिरामध्वनि | २ | ७२ | स च्छिन्नमूलः क्षतजेव | ७ | ४३ |