रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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१५८ | रघुवंशमहाकाव्ये
| पादः / श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | पादः / श्लोकः | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| पूर्ववृत्तकथितैः पुरा | ११ | १० | प्रदक्षिणप्रक्रमणात्कृ | ७ | २४ |
| पूर्वस्तयोरात्मसमे | १८ | १२ | प्रदक्षिणीकृत्य पय | २ | २१ |
| पूर्वानुभूतं स्मरता च | १३ | २८ | प्रदक्षिणीकृत्य हुतं | २ | ७१ |
| पृक्तस्तुषारैर्गिरिनि | २ | १३ | प्रबुद्धपुण्डरीकाक्षं | १० | ९ |
| पृथिवीं शासत्तस्तस्य | १० | १ | प्रभानुलिप्तश्रीवत्सं | १० | १० |
| पृष्टनामान्वयो राज्ञा स | १५ | ५० | प्रभावस्तम्भितच्छायमा | १२ | २१ |
| पौत्रः कुशस्यापि कुशेश | १८ | ४ | प्रमदामनुसंस्थितः | ८ | ७२ |
| पौरस्त्यानेवमाक्रामं | ४ | ३४ | प्रमन्यवः प्रागपि कोस | ७ | ३४ |
| पौरेषु सोऽहं बहुलीभव | १४ | ३८ | प्रमुदितवरपक्षमेक | ६ | ८६ |
| प्रजानामेव भूत्यर्थं | १ | १८ | प्रययावातिथेयेषु | १२ | २५ |
| प्रजानां विनयाधा | १ | २४ | प्रलोभिताप्याकृतिलोभ | ६ | ५८ |
| प्रजावती दोहदशंसि | १४ | ४५ | प्रवृत्तमात्रेण पयांसि | १३ | १४ |
| प्रजास्तद्गुरुणा नद्यो | १७ | ४१ | प्रवृत्तावुपलब्धायां | १२ | ६० |
| प्रणिपत्य सुरास्तस्मै | १० | १५ | प्रवृद्धतापो दिवसोऽति | १६ | ४५ |
| प्रतापोऽग्रे ततः शब्दः | ४ | ३० | प्रवृद्धो हीयते चन्द्रः स | १७ | ७१ |
| प्रतिकृतिरचनाभ्यो | १८ | ५३ | प्रवेश्य चैनं पुरम | ५ | ६२ |
| प्रतिजग्राह कालिङ्गस्त | ४ | ४० | प्रशमस्थितपूर्वपार्थि | ८ | १५ |
| प्रतिप्रयातेषु तपोध | १४ | १९ | प्रसन्नमुखरागं तं स्मित | १७ | ३१ |
| प्रतिशुश्राव काकुत्स्यस्ते | १५ | ४ | प्रसवैः सप्तपर्णानां | ४ | २३ |
| प्रतियोजयितव्यवल्ल | ८ | ४१ | प्रसादोदयादम्भः | ४ | २१ |
| प्रत्यक्षोऽप्यपरिच्छेद्यो | १० | २५ | प्रसादसुमुखे तस्मिंश्च | ४ | १८ |
| प्रत्यपद्यत चिराय | ११ | ३४ | प्रसादाभिमुखे तस्मिंश्च | १७ | ४६ |
| प्रत्यपद्यत तथेति | ११ | ८८ | प्रसाधिकालम्बितमग्र | ७ | ७ |
| प्रत्यब्रवीच्चैनमिषु | २ | ४२ | प्रस्थितायां प्रतिष्ठेथाः | १ | ८९ |
| प्रत्यभिज्ञानरत्नं च रामा | १२ | ६४ | प्रहारमूर्च्छापगमे | ७ | ४४ |
| प्रत्युवाच तमृषिर्न त | ११ | ८५ | प्राजापत्योपनीतं | १० | ५२ |
| प्रत्युवाच तमृषिर्निश | ११ | ४१ | प्रातः प्रयाणाभिमुखाय | ५ | २९ |
| 'प्रथमपरिगतार्थस्तं | ७ | ७१ | प्रातर्गत्य परिभोगशोभि | १९ | २१ |
| प्रथममन्यभृताभिरु | ९ | ३४ | प्रातर्यथोक्तव्रतपा | २ | ७० |