रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
५५९
| श्लोक | सर्गे | श्लोकः | श्लोक | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| प्राप्तानुगः सपदि शास | ९ | ८२ | बिभ्रतोऽस्त्रमचलेऽप्यकु | ११ | ७४ |
| प्राप्य चाशु जनस्थानं | १२ | ४२ | बिभ्रत्या कौस्तुभन्यासं | १० | ६२ |
| प्रायः प्रतापभग्नत्वाद | १७ | ७० | ब्राह्मे मुहूर्ते किल तस्य | ५ | ३६ |
| प्रायो विषाणपरिमोक्ष | ९ | ६२ | भ | ||
| प्रासादकालागुरुधूम | १४ | १२ | भक्तिः प्रतीक्ष्येषु कुलो | ५ | १४ |
| प्राहिणोच्च महितं महा | ११ | ४९ | भक्त्या गुरौ मय्यनुक | २ | ६३ |
| प्रियतमाभिरसौ तिसृ | ९ | १८ | भगवन्परवानयं जनः | ८ | ८१ |
| प्रियंवदात्प्राप्तमसो | ७ | ६१ | भज्यमानमतिमात्रक | ११ | ४६ |
| प्रियानुरागस्य मनः स | ३ | १० | भयोत्सृष्टविभूषणां | ४ | ५४ |
| प्रेक्ष्य दर्पणतलस्थमा | १९ | ३० | भरतस्तत्र गन्धर्वान्यु | १५ | ८८ |
| प्रेमगर्वितविपक्षमत्स | १९ | २० | भर्तापि तावत्क्रयकैशि | ७ | ३२ |
| फ | भर्तुः प्रणाशादथ शोच | १४ | १ | ||
| फलमस्योपहासस्य | १२ | ३७ | भल्लापवर्जितैस्तेषां | ४ | ६३ |
| ब | भवति विरलभक्ति | ५ | ७४ | ||
| बन्धच्छेदं स बद्धानां | १७ | १९ | भवानपीदं परवा | २ | ५६ |
| बभूव रामः सहसा स | १४ | ८४ | भव्यमुख्याः समारम्भाः | १७ | ५३ |
| बभौ तमनुगच्छन्ती वि | १२ | २६ | भस्मसात्कृतवतः पितृ | ११ | ८६ |
| बभौ भूयः कुमारत्वादा | १७ | ३० | भास्करश्च दिशमभ्युवा | ११ | ६१ |
| बभौ सदशनज्योत्स्ना | १० | ३७ | भीमकान्तैर्नृपगुणैः | १ | १६ |
| बलमार्तभयोपशान्त | ८ | ३१ | भुजमूधोरुबाहुल्यादे | १२ | ८८ |
| बलिक्रियावर्जितसैकता | १६ | २१ | भुवं कोष्णेन कुण्डोष्णी | १ | ८४ |
| बलैरध्युषितस्तस्य | ४ | ४६ | भूतानुकम्पा तव | २ | ४८ |
| बहुधाप्यागमर्भिन्नाः | १० | २६ | भूयस्ततो रघुपतिर्वि | १३ | ७६ |
| बाढमेष दिवसेषु | १९ | ५२ | भूयस्तपोव्ययो मा भूदा | १५ | ३७ |
| बाणभिन्नहृदया निपे | ११ | १९ | भूर्जेषु मर्मरीभूताः | ४ | ७३ |
| बालार्कप्रतिमेवाप्सु | १२ | १०० | भोगिभोगासनासीनं | १० | ७ |
| बाहुप्रतिष्टम्भविदू | २ | ३२ | भोगिवेष्टनमार्गेषु | ४ | ४८ |
| बाहुभिर्विटपाकारै | १० | ११ | भ्रमरैः कुसुमानुसारि | ८ | ३५ |
| भूभेदमात्रेण पदान्म | १३ | ३६ |