रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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६६० रघुवंशमहाकाव्ये
म
| सर्गे | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| मखांशभाजां प्रथमो | ३ | ४४ | मातलिस्तस्य माहेन्द्रमा | १२ | ८६ |
| मणौ महानील इति प्रभा | १८ | ४२ | मातृवर्गचरणस्पृशी | ११ | ७ |
| मतङ्गशापादवलेप | ५ | ५३ | मान्यः स मे स्थाव | २ | ४४ |
| मत्तेभरदनोत्कीर्ण | ४ | ५९ | मा भूदाश्रमपीडेति | १ | ३७ |
| मत्परं दुर्लभं मत्वा | १ | ६६ | मार्गैषिणी सा कटकान्त | १६ | ३१ |
| मत्स्यध्वजा वायुवशाद्वि | ७ | ४० | मित्रकृत्यमपदिश्य | १९ | ३१ |
| मदिराक्षि मदाननार्पि | ८ | ६८ | मिथुनं परिकल्पितं त्वया | ८ | ६१ |
| मदोदग्राः ककुद्मन्तः | ४ | २२ | मुक्तशेषविरोधेन | १० | १३ |
| मनसापि न विप्रियं मया | ८ | ५२ | मुखार्पणेषु प्रकृतिप्र | १३ | ९ |
| मनुप्रभृतिभिर्मान्यै | ४ | ७ | मुखावयवलूनां तां नै | १२ | ४३ |
| मनुष्यवाह्यं चतुरस्र | ६ | १० | मुरलामारुतोद्धूत | ४ | ५५ |
| मनोभिरामाः शृण्वन्तो | १ | ३९ | मृगवनोपगमक्षम | ९ | ५० |
| मनोज्ञगन्धं सहकार | १६ | ५२ | मृग्यश्च दर्भाङ्कुरनिर्व्य | १३ | २५ |
| मन्त्रः प्रतिदिनं तस्य | १७ | ५० | मैथिलः सपदि सत्यसं | ११ | ४८ |
| मन्दः कवियशःप्रार्थी | १ | ३ | मैथिलस्य धनुरन्यपा | ११ | ७२ |
| मन्दोत्कण्ठाः कृतास्तेन | ४ | ९ | मोक्ष्यध्वे स्वर्गवन्दीनां | ११ | ४७ |
| मयि तस्य सुवृत्त वर्त | ८ | ७७ | |||
| मरणं प्रकृतिः शरीरिणां | ८ | ८७ | ### य | ||
| मरुतां पश्यतां तस्य | १४ | १०१ | यः कश्चन रघूणां हि | १५ | ७ |
| मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्स | २ | १० | यच्चकार विवरं शिला | ११ | १८ |
| मरुपृष्ठान्युदम्भांसि | ४ | ३१ | यतिपार्थिवलिङ्गधारि | ८ | १६ |
| मर्मरैरगुरुधूपगन्धि | १९ | ४१ | यत्कुम्भयोनेरधिगम्य | १६ | ७२ |
| महार्हसिंहासनसंस्थितो | ७ | १८ | यत्स लग्नसहकारमा | १९ | ४६ |
| महिमानं यदुत्कीर्त्य | १० | ३२ | यथा च वृत्तान्तमिमं स | ३ | ६६ |
| महीं महेच्छः पारेकीर्य | १८ | ३३ | यथा प्रह्लादनाच्चन्द्रः | ४ | १२ |
| महेन्द्रमास्थाय महोक्ष | ६ | ७२ | यथाविधिहुताग्नीनां | १ | ६ |
| महोक्षतां वत्सतरः | ३ | ३२ | यदात्थ राजन्यकुमार तं | ३ | ४८ |
| मातंगनक्रैः सहसोत्स | १३ | ११ | यदुवाच न तन्मिथ्या | १७ | ४२ |
| यदगोप्रतरकल्पोऽभूत्सं | १५ | १०१ | |||
| यन्ता हरेः सपदि संहृ | १२ | १०३ |