रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका ६५१
| सर्ग | श्लोकः | सर्ग | श्लोकः | ||
|---|---|---|---|---|---|
| तदात्मसंभवं राज्ये | १७ | ८ | तमर्चयित्वा विधि | ५ | ३ |
| तदाननं मृत्सुरभि | ३ | ३ | तमलभन्त पतिं पति | ९ | १७ |
| तदाप्रभृत्येव वन | २ | ३८ | तमशक्यमपाक्रष्टुं नि | १२ | १७ |
| तदीयमाक्रन्दितमा | २ | २८ | तमश्रु नेत्रावरणं प्रमृज्य | १४ | ७१ |
| तदेतदाजानुविलम्बि | १६ | ८४ | तमातिथ्यक्रियाशान्त | १ | ५८ |
| तदेष सर्गः करुणाद्रं | १४ | ४२ | तमात्मसंपन्नमनिन्दि | १८ | १८ |
| तद्गतिं मतिमतां वरे | ११ | ८७ | तदादौ कुलविद्यानाम | १७ | ३ |
| तद्गीतश्रवणैकाग्रा | १५ | ६६ | तमाधूतध्वजपटं व्यो | १२ | ८५ |
| तद्रक्ष कल्याणपरं | २ | ५० | तमापतन्तं नृपते | ५ | ५० |
| तद्व्योम्नि शतधा भिन्नं | १२ | ९८ | तमार्यगृह्यं निगृहीत | २ | ३३ |
| तनुत्यजां वर्मभृतां | ७ | ४८ | तमाहितौत्सुक्यमद | २ | ७३ |
| तनुलतांविनिवेशित | ९ | ५२ | तमीशः कामरूपाणा | ४ | ८३ |
| तं तस्थिवांसं नगरोप | ४ | ६१ | तमुद्वहन्तं पथि भोज | ७ | ३५ |
| तं दधन्मैथिलीकण्ठनि | १५ | ५६ | तमुपाद्रवदुद्यम्य दक्षि | १५ | २३ |
| तं धूपाश्यानकेशान्तं | १७ | २२ | तमृषिः पूजयामास | १५ | १२ |
| तन्मदीयमिदमायुधं | ११ | ७७ | तं पयोधरनिषिक्तच | १९ | ४५ |
| तं न्यमन्त्रयत संभृत | ११ | ३२ | तं पितुर्वधभवेन म | ११ | ६७ |
| तपस्यानधिकारित्वात्प्र | १५ | ५१ | तं प्रमत्तमपि न प्रभाव | १९ | ४८ |
| तपस्विवेषक्रिययापि | १४ | ९ | तं प्राप्य सर्वावयवान | ६ | ६९ |
| तपस्विसंसर्गविनीत | १४ | ७५ | तं प्रीतिविशदैर्र्नेत्रैरन्व | १७ | ३५ |
| तपोरक्षन्स विघ्नेभ्यस्त | १७ | ६५ | तं भावार्थं प्रसवसमया | १९ | ५७ |
| तमङ्कमारोप्य शरीर | ३ | २६ | तं भूपतिर्भासुरहे | ५ | ३० |
| तमध्वराय मुक्ताश्वं | १५ | ५८ | तया स्रजा मङ्गलपुष्प | ६ | ८४ |
| तमध्वरे विश्वजिति | ५ | १ | तया हीनं विधातर्मा | १ | ७० |
| तमपहाय ककुत्स्थकुलो | ९ | १६ | तयोर्दिवस्पतेरासीदेकः | १७ | ७ |
| तमब्रवीत्सा गुरुणा नव | १६ | ९ | तयोरपाङ्गप्रतिसारि | ७ | २३ |
| तमभ्यनन्दत्प्रथमं प्र | ३ | ६८ | तयोरुपान्तस्थितसिद्ध | ३ | ५७ |
| तमभ्यनन्दत्प्रणतं स | १५ | ४० | तयोर्जगृहतुः पादा | १ | ५७ |
| तमरण्यसमाश्रयोन्मुखं | ८ | १२ | तयोर्यथाप्रार्थितमिन्द्रि | १४ | २५ |