रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)

रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
DevanagariHindipublished735 पृष्ठ
पृष्ठ 714, कुल 735 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 714
श्लोकानुक्रमणिका
६५५
| श्लोकः | सर्गे | श्लोकः | श्लोकः | सर्गे | श्लोकः |
|---|---|---|---|---|---|
| दर्पणेपु परिभोगदर्शि | १९ | २८ | द्वेष्योऽपि संमतः शिष्ट | १ | २८ |
| दशदिगन्तजिता रघु | ९ | ५ | ध | ||
| दशरश्मिशतोपमद्यु | ८ | २९ | धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रं | २ | ११ |
| दशाननकिरीटेभ्य | १० | ७५ | धरायां तस्य संरम्भं | १५ | ८५ |
| दिगभ्यो निमन्त्रिताश्चैनम | १५ | ५९ | धर्मलोपभयाद्राज्ञी | १ | ७६ |
| दिन दिने शैवलवन्त्य | १६ | ४६ | धातारं तपसा प्रीतं | १० | ४३ |
| दिनेषु गच्छत्सु नितान्त | ३ | ८ | धारास्वनोद्गारिदरीमु | १३ | ४७ |
| दिलीपसूनोः स बृह | ३ | ५४ | धियः समग्रैः स गुणैरु | ३ | ३० |
| दिलीपानन्तरं राज्ये | ४ | २ | घमधूमो वसागन्धी | १५ | १६ |
| दिवं मरुत्वानिव भो | ३ | ४ | धूमादग्नेः शिखाः पश्चादु | १७ | ३४ |
| दिशः प्रसेदुर्मरुतो ववुः | ३ | १४ | धृतिरस्तमिता रतिश्च्यु | ८ | ६६ |
| दिशि मन्दायते तेजो | ४ | ४९ | ध्रुवमस्मि शठः शुचिस्मिते | ८ | ४९ |
| दिष्टान्तमाप्स्यति भवान | ९ | ७९ | ध्वजपटं मदनस्य धनु | ९ | ४५ |
| दीर्घेष्वमी नियमिताः | ५ | ७३ | न | ||
| दुकूलवासाः स वधूस | ७ | १९ | न किलानुययुस्तस्य | १ | २७ |
| दुदोह गां स यज्ञाय | १ | २६ | न कृपणा प्रभवत्यपि | ९ | ८ |
| दुरितदर्शनेन ध्वंस्त | १७ | ७४ | न केवलं गच्छति तस्य | १८ | ४९ |
| दुरितैरपि कर्तुमात्म | ८ | २ | न खरो न च भूयसा | ८ | ९ |
| दुर्गाणि दुर्ग्रहाण्यासंस्त | १७ | ५२ | न चावदद्भर्तुरवर्णं | १४ | ५७ |
| दुर्जातिबन्धुरयमृक्ष | १३ | ७२ | न चोपलेभे पूर्वैषा | १० | २ |
| दूरादयश्चक्रनिभस्य | १३ | १५ | न तस्य मण्डले राज्ञो | १७ | ५८ |
| दूरापवर्जितच्छत्रैस्तस्या | १७ | ७९ | नदत्सु तूर्येष्वविभाव्य | ७ | ३८ |
| दूर्वायवाङ्कुरप्लक्षकत्व | १७ | १२ | नदद्भिः स्निग्धगम्भीरं | १७ | ११ |
| दृढभक्तिरिति ज्येष्ठे | १२ | १९ | न धर्ममर्थकामाभ्यां व | १७ | ५७ |
| दृष्टदोषमपि तन्न | १९ | ४९ | न नवः प्रभुता फलोदया | ८ | २२ |
| दृष्टसारमथ रुद्रका | ११ | ४७ | न पृथग्जनवच्छुचो व | ८ | ९० |
| दृष्टा विचिन्वता तेन | १२ | ६१ | न प्रसेहे स रुद्धार्कं | ४ | ८२ |
| दैत्यस्त्रीगण्डलेखानां | १० | १२ | न प्रहर्तुमलमस्मि निर्द | ११ | ८४ |
| द्विषां विपह्य काकुत्स्थ | ४ | ४१ | नभश्चरैर्गीतयशाः स ले | १८ | ६ |