भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरङ्ग २७ मुगलों के आक्रमण के पूर्व काश्मीर को सतीसर कहा जाता था । मैं समझता हूँ । सतीसर शब्द काश्मीर उपत्यका के लिए प्रयुक्त होता रहा है। इसमें वह भूखण्ड आता है जो कभी जल मग्न था । बारहमूला से वीर नाग तक का भूखण्ड वास्तव, में सतीसर था । अतएव काश्मीर मण्डल, काश्मीर राज्य तथा सतीसर शब्दों के अर्थ में भिन्नता है । काश्मीर मण्डल और काश्मीर राज्य के अन्दर सतीसर देश किंवा भूखण्ड का समावेश हो जाता है । सतीसर में काश्मीर मण्डल अथवा काश्मीर राज्य का समावेश नही होता । सतीसर काश्मीर मण्डल अथवा राज्य का एक भूखण्ड था । क्षेमेन्द्र ने लोक प्रकाश में तीन स्थानों पर सती सर का उल्लेख किया है । उससे मेरे मत की पुष्टि होती है : श्रीमत्सतीसरासा शारिकाशैलभूषितम् । श्रीजैननगरादस्मान्नानोपवनविभूषितम् ॥ २ ॥ अस्ति त्रिभुवनाख्या मुत्तमं भूषणं भुवः । श्रीकश्मीरपुरं रम्यं नानोपवनशोभितम् ॥३॥ ( पृष्ठ ३४ ) सतीसर में शारिका शैल, जैन नगर, तथा काश्मीर पुरं का उल्लेख किया गया है । शारिका पर्वत सूखे सतीसर में है । जिस समय सतीसर में जल भरा था उस समय द्वीप की तरह इसका शिखर दिखाई पड़ता था । सतीसर के जल की गहराई ३०० से ४०० फीट तक थी । इस पर अकबर द्वारा निर्मित दुर्ग आज वर्तमान है । जैन नगरो का उल्लेख जोनराज श्रीवर तथा शुक की राजतरंगिणियों में है । ( दत्त ४७, १३१, १३८, २०६, ३७१ ) कश्मीर पुर शब्द यहाँ श्रीनगर किंवा प्रवरसेनपुर के लिये आया है । श्रीनगर शब्द लोग भूल गये थे । कश्मीर पुर शब्द श्रीनगर के लिए व्यवहृत होने लगा था । प्रवरसेनपुर का भी उल्लेख लोक प्रकाश (पृष्ठ ३५) मे किया गया है । श्रीनगर शब्द का उल्लेख जोनराज, श्रीवर और शुक की राज तरंगिणियों में प्रायः, नही मिलता है । प्रवर पुर ( द० २८, २०१, ४२६ ) तथा प्रवरेश पुर का ( द० २३२ ) उल्लेख मिलता है । लोक प्रकाश में पृष्ठ ६० पर पुनः सतीसर का उल्लेख किया गया है : त्रिविष्टपस्य सारं तत्पार्थिवं क्षेत्रमीश्वरम् । तत्रापि सारं हिमवांस्तत्र सारं सतीसरः ॥२॥ सतीसर और काश्मीर मण्डल में स्पष्ट भेद किया गया है : मनुवारजभित्यूचुः पूतनात्मकध्यते किल । सतीसरसि ग्रामाणां यत्प्रमाणमुदीरितम् । षष्टियामसहस्राणि षष्टिग्रामशतानि च । षष्टियामस्त्रयो ग्रामा ह्येतत्कश्मीरमण्डलम् ॥३॥ शुक की चौथी और अन्तिम राजतरंगिणी है । जिसे शुक काश्मीरी पंडित ने प्राचीन शैली पर लिखा है । तत्पश्चात् काश्मीर में पुरानी शैली पर संस्कृत में इतिहास लिखने की परम्परा लोप हो गयी । मुगल शासन के साथ मुसलमान लेखको का काल आता है । उन्होने परसियन अर्थात् फारसी मे अधिकतर लिखा है । काश्मीरी पण्डित भी फारसी में विद्वत्ता प्राप्त कर, प्रथम फारसी में लिखे तत्पश्चात् उर्दू में और अब अग्रेजो में लिखने लगे है । जनरल ए. कनिंघम भूगर्भीय चिन्हो के अध्ययन से इसो परिणाम पर पहुँचे है कि काश्मीर उपत्यका जल से भरी थी । वे लिखते हैं : 'एक पर्वतीय चट्टान ( बिलफ़ ) तन्तमूल तथा बारहमूला के १६ मील अधोभाग में समकोण बनाती झेलम नदी से ऊपर उठी है । उसको ऊँचाई करीब ३ या ४ सो फीट होगी । कुछ स्थानो पर मैने देखा