राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ राजतरङ्गिणी
सम्राट् अकबर के समय में प्रथम बार कश्मीर पर कश्मीर के अतिरिक्त अन्य कश्मीर वंशीय मुसलमान का राज्य स्थापित हुआ। सम्राट् अकबर जिस समय कश्मीर पहुँचे, तो अबुलफजल को कश्मीरियों ने एक पुस्तक, जिसका नाम 'राज- तरंगिणी' था, समर्पित की। उसमें चार हजार वर्ष पूर्व से कश्मीर के राजाओं का इतिहास लिखा था। यह पुस्तक संस्कृत में थी। सम्राट् अकबर ने आदेश दिया कि पुस्तक का फारसी में अनुवाद किया जाय। अबुल फजल अकबर का प्रियपात्र था। उसके नवरत्नों में एक था। आइने अकबरी में एक अध्याय सूबा कश्मीर पर लिखा गया है। वह राजतरंगिणी तथा तत्कालीन स्थिति पर आधारित है। मंत्री होने के कारण अबुल फजल साधनसंपन्न था। उसका वर्णन साधिकारिक माना जायेगा। वह लिखता है— 'इस इतिहास में कहा गया है कि कश्मीर का अधिकांश भाग प्रारंभिक काल मे केवल उसके पर्वतों को छोड़कर जलमग्न था। उसे सतीसर कहते थे। सती महादेव की पत्नी है। सर का अर्थ सरोवर अर्थात् जहाँ जल एकत्र रहता है, किया जाता है। 'ब्रह्मा का एक दिन १४ मन्वन्तरों का होता है। प्रत्येक मन्वन्तर में ७० कल्प होते हैं। सत्तर चतुर्युग मिलकर एक कल्प होता है। यह वर्ष सम्राट् अकबर के राज्य काल का चौदहवाँ वर्ष है। कश्मीर में जिस समय आबादी हुई उसे बीते सातवें मन्वन्तर का २७वां कल्प हैं। तीन युग २८वें मन्वन्तर का बीत चुका है। चौथे युग का ४७०१वाँ सौर वर्ष व्यतीत हो चुका है।' वरनियर अपने नवें पत्र में लिखता है : 'प्राचीन काल में कश्मीर जल से भरा था। कश्यप ने बारहमूला के पास जल बहने के लिये मार्ग बनाया था। यह जहाँगीर काल के ऐतिहासिक श्री हैदर मलिक वल्द हसन मल्लिक बिन मल्लिक मुहम्मद नजी छदवराह [ १६१७-१६१९] के इतिहास में मिलता है। छदवराह श्रीनगर के पास एक गाँव है। वह कश्मीर का एक कुलीन था। यह इतिहास प्राचीन काल से अकबर के कश्मीर विजय तक का संक्षिप्त इतिहास है। उसका आधार राजतरंगिणी है। बड़शाह जैनुलआवदीन की आज्ञा पर इसका फारसी में अनुवाद किया गया था। इसका नाम 'बहसुल असम्र' रखा गया था। सन् १५९४ में बदायूंनी को अकबर ने आज्ञा दी थी कि वह उसका अनुवाद करे।' वरनियर लिखता है : 'निस्संदेह यह क्षेत्र कभी जल से भरा था। थेसलो की भी पूर्व काल में यही अवस्था थी। वह भी कभी जल से भरा था। किंतु मैं यह नहीं विश्वास करता कि जहाँ काटकर जल बहना (बारहमूला) बताया जाता है वहाँ पत्थर काटा गया है। वह आदमी का काम नहीं हो सकता। वह पर्वत बहुत ऊँचा है। मैं समझता हूँ कि यहाँ पर्वत बैठ गया है। यह भूकंप के कारण हुआ होगा। क्योंकि कश्मीर में भूकंप बहुत आते हैं।' सतीसर और काश्मीर—शुक ने चौथी राज- तरंगिणी में काश्मीर को सतीसर कहा है। सतीसर देश शब्द कश्मीर के लिए व्यवहृत होता रहा है। शुक लिखता है—मिरजा हैदर मुहम्मद वाक्पटु नौशेरवां के समान हैं। इस जगत् में पूर्वकालीन राजाओं के उन कार्यों को कहने के लिए पैदा हुआ है जो सतीसर में बहुत दिनों से बुरी हालत में थे। (दत्त ३५१) कश्मीर पर मुगलों के आक्रमणों की चर्चा करते हुए पुनः लिखता है—इस प्रकार सतीसर देश के पापियों पर वज्रपात हुआ। आकाश में धूमकेतु निरन्तर पूर्व और पश्चिम दिखाई देने रहे। (दत्त २७३)