राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग २५
प्राचीन काल में हिमालय का नाम, हिमवान् हिमाचल, हिमवंत, हैमवत, हिम शैल, पर्वतराज, नगाधिराज आदि था और आज भी है। भारतवर्ष का एक नाम हैमवत वर्ष है। वह हिमालय के नाम पर रखा गया है। हिमालय पर्वत इस प्रकार वर्ष पर्वत है। हैमवत क्षेत्र को किन्नर खण्ड भी कहीं-कहीं कहा गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण २:१५:३१, वायु पुराण ३४:२८)। काश्मीर के साहित्य में हिमवंत शब्द का प्रयोग हिमालय पर्वत के लिये किया गया है। काश्मीर के उत्तर में उत्तरकुरुओं तथा मद्रो को इसके मूल अर्थात् दक्षिण निवास करने का उल्लेख है। हिमवंत शब्द में हिमालय की पर्वतमालाओं के अतिरिक्त आधुनिक नामधारी कराकोरम (कृष्ण गिरि), सुलेमान पहाड़ (धंजन पर्वत), हिंदू कुश (निषध), अल्ताई (चंडीरण) या माल्यवान् पर्वतमालाएँ आ जाती है। कराकुरम पर्वत के पूर्वीय शैलबाहु को 'विद्युत्' पर्वत कहा जाता है। सुलेमान पर्वत अर्थात् धंजन पर्वत के दक्षिणी भाग को 'कीर्तहर' पर्वत कहते हैं। (हरिवंश पुराण: १:१८ मत्स्य पुराण अ० १३, महाभारत वनपर्व २५३:१३५, १०, ६९४, ६९५; सभापर्व ३:५८-६०)। क्षुद्र हिमवंत पश्चिमी तथा महा हिमवंत हिमालय की पूर्वीय पर्वतमालाओ के लिये व्यवहृत किया गया है। विशेष द्रष्टव्य परिशिष्ट 'हिमालय' है। २. सती सर—नीलमत पुराण में सतीसर का निम्नलिखित उल्लेख मिलता है। इदं च शिखरं पश्य देशेऽस्मिन्नृप पश्चिमे । ६२ । नौबन्धनम् इति ख्यातं पुण्यं पापभयापहम् ॥41॥ कृतयुगे सदा काले व्यतीते तु मनुप्रदा । ६३ । विदधाति प्रजासर्गं यथापूर्वम् अरिन्दम ॥42॥ नौदेहन् सती देवी भूमिर् भवति पार्थिव । ६४ । यांस्त सु भूमीं भवति सरस् तु विमलोदकम् ॥43॥ षड्योजनायतम् रम्यं तदर्धेन च विस्तृतम् । ६५ । सतीदेशम् इति ख्यातं देवाक्रीडं मनोहरम् ॥44॥ आकाशम् इव गम्भीरं जलजैश् च विवर्जितम् ॥६६। शीतलामलपानीयम् सर्वभूमिमनोहरम् ॥45॥ अस्मिन् वैवस्वते प्राप्ते राजन् मन्वन्तरे किल । ६७ । मारीचाय ददौ दक्षः कश्यपाय त्रयोदश ॥46॥
अबुल फजल सतीसर को उमासर कहता है— काश्मीर पेश अज अग्रत सती सर नाम अस्त सती- नाम ईजा अस्त व सर नाम ए होज कता। फारस के लोग प्रायः हिंदू गाथा को मानते हैं। इतिहासकार बयैउद्दीन बेयल अपवाद है। वह कहता है 'आदम शरन दीप अर्थात् लंका से काश्मीर में आये। सेथ के वंश में काश्मीर का राज्य ११०० वर्ष रहा। हजरत सुलेमान ने काश्मीर को आबाद किया। उसने अपने भतीजा इसोन को काश्मीर का राजा बनाया। 'हिंदुओं ने राजा हरीमंद के नेतृत्व में काश्मीर पर विजय प्राप्त की। उसका वंश जलप्लावन तक राज्य करता रहा। जलप्लावन के पश्चात् तुर्किस्तान की एक जाति काश्मीर में आकर आबाद हो गयी। 'काश्मीर निवासियो को एकेश्वरवाद का उपदेश हजरत मूसा ने दिया। वे काश्मीर की भूमि पर दिवंगत हुए। उनकी मजार अथवा कब्र काश्मीर में है। उसका अभी पता लगाना बाकी है। कालांतर में काश्मीरियों ने हिंदुओं की बुतपरस्ती स्वीकार कर ली। काश्मीरियो के इस दोष के कारण काश्मीर में जलप्लावन हुआ था।' वाकयाते काश्मीर में उल्लेख है—'काश्मीर प्रदेश जल से भरा था। दैत्य जलदेव वहाँ रहता था। वह मनुष्यों को खाता था। आसपास जो कुछ मिलता था, खा जाता था।' विस्तृत वर्णन जलोद्भव के प्रसंग में किया गया है।