भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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२४ राजतरङ्गिणी पुरा सतीसरः कल्पारम्भात् प्रभृति भूरभूत् । कुक्षौ हिमाद्रेर्णोभिः पूर्णे मन्वन्तराणि षट् ॥ २५ ॥ काश्मीर वर्णन २५ कल्प का प्रारंभ था। छः मन्वन्तर बीत चुके थे। उस पुरा काल में हिमाद्रि कुक्षि¹ में अर्णवपूर्ण सतीसर² था।

जीवन और तरंगिणी की उपमा भारतीय दार्शनिक विचार की ओर लक्ष्य करती है। भारतीय आत्मा को अमर मानते हैं। जीवन कभी नष्ट नहीं होता। वह चलता रहता है। चलता रहेगा। जीवन की यह धारा कभी विच्छिन्न होने वाली नहीं है। पाठभेद · श्लोक संख्या २५ में 'पुरा' शब्द का पाठभेद 'पुरः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २५. (१) हिमाद्रि कुक्षि—हिमाद्रि शब्द का उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है। 'हिमाद्रि कुक्षि' शब्द काश्मीर के लिये नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी दोनों में मिलता है। कुक्षि का अर्थ कोख होता है। माता की कोख में जिस प्रकार शिशु सुरक्षित तथा आराम से रहता है, उसी प्रकार काश्मीर हिमालय की गोद में सब प्रकार से रक्षित सुखपूर्वक है। माता शिशु को अपने बाहु से घेर कर कोख में रखती है। हिमालय काश्मीर को शिशु तुल्य अपने शैल बाहु से घेरकर माता की तरह गोद में रखे हुए हैं। शिशु माँ के पीन पयोधर से चिपका रहता है। बिना प्रयास दुग्ध पान करता रहता है। ठीक इसी प्रकार काश्मीर में जलधारा चारो ओर शैल श्रृंग से स्रवित होकर बिना प्रयास काश्मीर की प्यास बुझाती रहती है। कुक्षि शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में अनेक काव्यो में महान् भारतीय साहित्यकारों ने किया है। अश्वघोष ने कपिलवस्तु नगर को—'कुक्षिः हिमद्रि- रिरिव' कहा है (१ ३५२:३५५)। ऋग्वेद में— 'कुक्षि सोम पातमा.'—कोख के लिये कुक्षि शब्द का प्रयोग किया गया है ( १:८.७)। अथर्ववेद

१:८:७ तथा ७ ९:१२, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१:३८) में कुक्षिका का अर्थ भरा पूरा, रक्षित होना, किया गया है। ऋग्वेद (२:११:११) तथा १०:८६:१४, अथर्व वेद २:५:४,२:३३:४, ४:१६:३, ९:५:६० या ६०१, १०:९:१७ एवं ऋग्वेद में एक स्थान पर और कुक्षि का प्रयोग मिलता है। 'इय कुक्षयः सोम धानाः' अर्थात् दूध के समान कुक्षियाँ सोम गाधन हैं (३.३६:८)। रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने कुक्षि शब्द का प्रयोग दरी अर्थ में किया है—'पुंनाग गहनं कुक्षि बहुलोदालकाकुलम्।' वाल्मीकि रामायण, किष्किन्ध्या काण्ड ४२:७। हिमाद्रि कुक्षि शब्द का प्रयोग बड़े अच्छे ढंग से नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी में किया गया है। इसमें हिम बर्फ के लिये और अद्रि शैल के लिये व्यवहृत किया गया है। हिमाद्रि का अर्थ होता है बर्फ का पहाड़। कुक्षि का अर्थ कोख है। महाभारत में सागर तट के देशों के लिये भी कुक्षि शब्द का प्रयोग किया गया है यथा—'ततः सागरकुक्षिस्थान···' सभापर्व ३२:१६। अतः हिमालय शैल की कोख में स्थित प्रदेश काश्मीर है। इसका संकेत हिमाद्रि कुक्षि शब्द करता है। हिमालय के अंक में स्थित काश्मीर माता की कोख में शिशु की तरह रक्षित है। हिमाद्रि शब्द का प्रयोग विशाल किंवा विग्रहराज (सन् १०५६-१०६४ ई०) 'चमन वंश' अजमेर तथा शाकम्भरी के सम्बन्ध में किया गया है। (इण्डियन एण्टीक्वेरी १९:२१५ अप्रकाशित) हिमाद्रि शब्द का प्रयोग हिमालय के लिये नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी दोनो ने किया है।