राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरङ्ग २३ तदमन्दरसस्यन्दसुन्दरेयं निपीयताम् । श्रोत्रशुक्तिपुटैः स्पष्टमङ्ग राजतरङ्गिणी ॥ २४ ॥ २४ सुहृद्वर ! शांत सुंदर रसधार युक्त इस राजतरंगिणी का अपने कर्णशुक्तिपुटों (सुतुहियों) द्वारा आनंदपूर्ण उन्मुक्त भाव से परिपूर्ण रसास्वादन कीजिए । नहीं है। शान्त रस का स्थायी भाव घृणा नहीं हो सकती। वह शान्त रस का व्यभिचारी भाव हो सकता है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य भारतीय विचारधारा- नुसार मोक्ष प्राप्ति है। सभी विद्या, धर्म, मत- मतान्तर एवं सिद्धान्त मनुष्य को इसी दिशा की ओर ले जाते हैं। प्रश्न उपस्थित होता है। राजनीति और मोक्ष से क्या सम्बन्ध है। राजतरंगिणी इतिहास ग्रन्थ है। उसका सम्बन्ध तत्कालीन काश्मीर की राजनीति से है। भारत में राजनीति साध्य नही साधन मात्र समझा गया है। देश में शान्ति रखकर अराज- कता को दूर हटाना है। शान्तिमय वातावरण तथा समाज से ही मानव अपने चरम उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। चाणक्य ने उसे सूत्रवत् योग-क्षेम शब्द में रखा है। इस योग-क्षेम का चरम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। राज्य इसमें सहायक होता है। मोक्ष प्राप्ति सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। इस पुरुषार्थ की तरफ शान्त रस बढ़ाता है। अतएव शान्त रस काश्मीरी साहित्यशास्त्री अभिनवगुप्त (सन् ९५०-८६० ई०) के शब्दो में अन्य रसों की अपेक्षा श्रेष्ठ रस है। कल्हण ने अपने पूर्व के अलंकार शास्त्री तथा काव्याचार्यों के मत के अनुसार शान्त रस को श्रेष्ठ रस मानकर काश्मीर के पूर्व विद्वानों के मतों का अनुकरण किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या २४ में 'स्यंद' का 'स्पंद', 'मंग' का 'संग' 'सांग' और 'राज' का 'राजा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २४ (१) शुक्ति पुट-इस शब्द का साधारण अर्थ होता है, सीप का खोल या सुतुही। शुक्ति पुट तरल पदार्थ पीने के काम में आता है। श्री आर. एस. पण्डित इस श्लोक पर टिप्पणी लिखते हैं। 'कल्हण प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक हिराक्लीत्तस की तरह जीवन को शाश्वत माना है। तरंगिणी के जल के समान जीवन का क्रम टूटता नहीं है। वह सतत चलता रहा है। भारतीय और यूनानी दोनों जीवन की अविच्छिन्नता में विश्वास करते थे। सुरा पीने के लिए शुक्ति पुट के गिलास कल्हण के समय प्रचलित रहे होंगे। वह तरंग ६:३६६ के सन्दर्भ में इसकी पुष्टि करता है। कुलीनों में इस प्रकार के पानपात्र प्रचलित थे। वरनियर का उदाहरण उन्होंने दिया है-"औरंगजेब काश्मीर में आया था तो उसे तिब्बती हरित मणि भेंट किया गया था। जिसका मुगलों के दरबार में बड़ा मूल्याकंन था। उसका रंग हरापन लिये था। उसपर उज्ज्वल शिराएँ थीं। वह इतना सख्त था कि हीरे के चूर्ण से ही उसे बनाया जा सकता था। इस प्रकार के पत्थरों से प्याले और अलंकृत पात्र बनाये जाते थे।" श्रोत्रशुक्तिपुटैः-यह शब्द काश्मीर में बहुत प्रचलित था। कल्हण के पश्चात् महाकवि जगद्धर भट्ट ने स्तुति कुसुमाञ्जलि में इस शब्द का प्रयोग किया है। उस समय काश्मीर में मुस्लिम राज स्थापित हो चुका था। उनका अनुमानित काल सन् १३५० ईस्वी है। कल्हण से २०२ वर्ष पश्चात् हुए थे।' पीता सुधा श्रवण शुक्ति पुटैः समक्ष- मास्वादिता पुनरियं शिवभक्तिरेव ॥ (नवम स्तोत्र : ३५)