राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२ रामनरहरियाँ उत्तर दिया है। शान्त रस की तुलना सभी रसों से करते हुए, मम्मट ने उसे पूर्ण रस माना है। तत्त्व ज्ञान को शान्त रस का स्थायी भाव स्वीकार करता है। अग्निपुराण ने शान्त रस को उत्पत्ति 'रति' का अभाव माना है। रुद्रट ने 'सम्यक् ज्ञान', आनन्द वर्धन ने 'तृष्णा क्षय सुख' को शान्त रस का स्थायी भाव माना है। विद्वानों ने अन्य रसों के समान शान्त रस का भेद-प्रभेद करने का प्रयास नहीं किया है। 'रसकलिका' ने (१) वैराग्य, (२) दोष निग्रह (३) सन्तोष, (४) तत्त्व साक्षात्कार—चार भेद शान्त रस का किया है। हिन्दी के काव्याचार्यों ने शान्त रस की परिभाषा की है। कुलपति मिश्र कहते हैं : तत्त्व ज्ञान ते कविता में जहँ प्रगटै निर्वेद । कहैं सान्त रस जासु को सो है, मौमो भेद । ( रसरहस्य : २८ ) यहाँ पर मम्मट के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। पद्माकर कहते हैं : सुरस शान्त निर्वेद है जाको थाई भाव । ( जगद्विनोद : ७२० ) कवि केशव दास जी कहते हैं : सबते होय उदास मन बसै एक हीं ठौर । ताहो सो समरस कहत केशव कपि सिरमौर । ( रसिक प्रिया १४:३७ ) हास्य रस द्वारा मनुष्य में हास्य रस की अधिकता होती है। हँसी आती है। करुण कविता का पाठ करते समय करुणा उत्पन्न होतो है। हृदय भर आता है। वीर रस काव्य सुनने पर उत्साह उत्पन्न होता है। अंग फडकने लगते हैं। शान्त रस की कविता पाठ के समय मन शान्त रहता है। कल्हण के शब्दो में 'स्थेय' भाव अर्थात् न्याय दृष्टि उत्पन्न होतो है। वह इतिहास को तोलने लगता है। भावातिरेक में स्वयं बह नहीं जाता। काश्मीरी आचार्य काश्मीरी पण्डित अलंकार शास्त्र के आलोचक
श्री आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोक (सन् ८५५— ८८४ ई०) तृतीय उद्योत में (२५-२७) में शान्त रस पर प्रकाश डाला है। तृष्णा का प्रध्वंसा- भाव शान्तरस कहा गया है। एक अच्छा उदाहरण उक्त पुस्तक की तारावती टीका में उपस्थित किया गया है। मनुष्य को पूर्ण तृप्ति हो जाती है तो उसे एक प्रकार का आनन्द होता है—जैसे स्वादिष्ट भोजन के पश्चात् एक प्रकार के आनन्द का अनुभव होता है। ठीक इसी प्रकार तृष्णा क्षय के सुख में भी एक प्रकार के आनन्द का बोध होता है। यही आनन्द शान्त रस का स्थायी भाव है। शान्त एक प्रकार की प्राकृतिक चित्त वृत्ति होती है। रति आदि मैथुन चित्तवृत्तियाँ हैं। सभी रसों की शान्त अवस्था को शान्त रस कह सकते हैं। तृष्णा सुख का जहाँ परितोष होता है, वहीं शान्त रस का उदय होता है। विषयों की अभिलाषा से निवृत्ति प्राप्त करना निर्वेद है। उसे वैराग्य भी कहते हैं। यही निर्वेद शान्त रस का स्थायी भाव है। 'शान्तश्च तृष्णाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीयत एव । ( ध्वन्यालोक : ३:२६ ) कल्हण ने सभी रसो का समावेश राजतरंगिणी काव्य में किया है। शान्त को उसने प्रधान माना है। शृंगार से शान्त रस तक पहुँचने के लिए बीच में वीर रस का माध्यम लेना पड़ता है। शृंगार का विरोधी रस शान्त रस है। अतएव सीधे शृंगार से शान्त रस पर नहीं जाया जा सकता। इसी प्रकार शान्त रस से शृंगार रस पर आने के लिए बीच में अद्भुत रस का माध्यम लेना पड़ता है। कल्हण ने इस प्राचीन परम्परागत काव्य पद्धति का अनुसरण किया है। एक मत शान्त रस का अन्तर्भाव बीभत्स रस में मानता है। कारण दिया जाता है। शान्त रस के लिए विषयों से घृणा होती है। यह तर्क सम्मत