राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
२२ रामनरहरियाँ उत्तर दिया है। शान्त रस की तुलना सभी रसों से करते हुए, मम्मट ने उसे पूर्ण रस माना है। तत्त्व ज्ञान को शान्त रस का स्थायी भाव स्वीकार करता है। अग्निपुराण ने शान्त रस को उत्पत्ति 'रति' का अभाव माना है। रुद्रट ने 'सम्यक् ज्ञान', आनन्द वर्धन ने 'तृष्णा क्षय सुख' को शान्त रस का स्थायी भाव माना है। विद्वानों ने अन्य रसों के समान शान्त रस का भेद-प्रभेद करने का प्रयास नहीं किया है। 'रसकलिका' ने (१) वैराग्य, (२) दोष निग्रह (३) सन्तोष, (४) तत्त्व साक्षात्कार—चार भेद शान्त रस का किया है। हिन्दी के काव्याचार्यों ने शान्त रस की परिभाषा की है। कुलपति मिश्र कहते हैं : तत्त्व ज्ञान ते कविता में जहँ प्रगटै निर्वेद । कहैं सान्त रस जासु को सो है, मौमो भेद । ( रसरहस्य : २८ ) यहाँ पर मम्मट के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है। पद्माकर कहते हैं : सुरस शान्त निर्वेद है जाको थाई भाव । ( जगद्विनोद : ७२० ) कवि केशव दास जी कहते हैं : सबते होय उदास मन बसै एक हीं ठौर । ताहो सो समरस कहत केशव कपि सिरमौर । ( रसिक प्रिया १४:३७ ) हास्य रस द्वारा मनुष्य में हास्य रस की अधिकता होती है। हँसी आती है। करुण कविता का पाठ करते समय करुणा उत्पन्न होतो है। हृदय भर आता है। वीर रस काव्य सुनने पर उत्साह उत्पन्न होता है। अंग फडकने लगते हैं। शान्त रस की कविता पाठ के समय मन शान्त रहता है। कल्हण के शब्दो में 'स्थेय' भाव अर्थात् न्याय दृष्टि उत्पन्न होतो है। वह इतिहास को तोलने लगता है। भावातिरेक में स्वयं बह नहीं जाता। काश्मीरी आचार्य काश्मीरी पण्डित अलंकार शास्त्र के आलोचक
श्री आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वन्यालोक (सन् ८५५— ८८४ ई०) तृतीय उद्योत में (२५-२७) में शान्त रस पर प्रकाश डाला है। तृष्णा का प्रध्वंसा- भाव शान्तरस कहा गया है। एक अच्छा उदाहरण उक्त पुस्तक की तारावती टीका में उपस्थित किया गया है। मनुष्य को पूर्ण तृप्ति हो जाती है तो उसे एक प्रकार का आनन्द होता है—जैसे स्वादिष्ट भोजन के पश्चात् एक प्रकार के आनन्द का अनुभव होता है। ठीक इसी प्रकार तृष्णा क्षय के सुख में भी एक प्रकार के आनन्द का बोध होता है। यही आनन्द शान्त रस का स्थायी भाव है। शान्त एक प्रकार की प्राकृतिक चित्त वृत्ति होती है। रति आदि मैथुन चित्तवृत्तियाँ हैं। सभी रसों की शान्त अवस्था को शान्त रस कह सकते हैं। तृष्णा सुख का जहाँ परितोष होता है, वहीं शान्त रस का उदय होता है। विषयों की अभिलाषा से निवृत्ति प्राप्त करना निर्वेद है। उसे वैराग्य भी कहते हैं। यही निर्वेद शान्त रस का स्थायी भाव है। 'शान्तश्च तृष्णाक्षयसुखस्य यः परिपोषस्तल्लक्षणो रसः प्रतीयत एव । ( ध्वन्यालोक : ३:२६ ) कल्हण ने सभी रसो का समावेश राजतरंगिणी काव्य में किया है। शान्त को उसने प्रधान माना है। शृंगार से शान्त रस तक पहुँचने के लिए बीच में वीर रस का माध्यम लेना पड़ता है। शृंगार का विरोधी रस शान्त रस है। अतएव सीधे शृंगार से शान्त रस पर नहीं जाया जा सकता। इसी प्रकार शान्त रस से शृंगार रस पर आने के लिए बीच में अद्भुत रस का माध्यम लेना पड़ता है। कल्हण ने इस प्राचीन परम्परागत काव्य पद्धति का अनुसरण किया है। एक मत शान्त रस का अन्तर्भाव बीभत्स रस में मानता है। कारण दिया जाता है। शान्त रस के लिए विषयों से घृणा होती है। यह तर्क सम्मत
प्रथम तरङ्ग २३ तदमन्दरसस्यन्दसुन्दरेयं निपीयताम् । श्रोत्रशुक्तिपुटैः स्पष्टमङ्ग राजतरङ्गिणी ॥ २४ ॥ २४ सुहृद्वर ! शांत सुंदर रसधार युक्त इस राजतरंगिणी का अपने कर्णशुक्तिपुटों (सुतुहियों) द्वारा आनंदपूर्ण उन्मुक्त भाव से परिपूर्ण रसास्वादन कीजिए । नहीं है। शान्त रस का स्थायी भाव घृणा नहीं हो सकती। वह शान्त रस का व्यभिचारी भाव हो सकता है। मनुष्य जीवन का लक्ष्य भारतीय विचारधारा- नुसार मोक्ष प्राप्ति है। सभी विद्या, धर्म, मत- मतान्तर एवं सिद्धान्त मनुष्य को इसी दिशा की ओर ले जाते हैं। प्रश्न उपस्थित होता है। राजनीति और मोक्ष से क्या सम्बन्ध है। राजतरंगिणी इतिहास ग्रन्थ है। उसका सम्बन्ध तत्कालीन काश्मीर की राजनीति से है। भारत में राजनीति साध्य नही साधन मात्र समझा गया है। देश में शान्ति रखकर अराज- कता को दूर हटाना है। शान्तिमय वातावरण तथा समाज से ही मानव अपने चरम उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। चाणक्य ने उसे सूत्रवत् योग-क्षेम शब्द में रखा है। इस योग-क्षेम का चरम लक्ष्य मोक्ष प्राप्ति है। राज्य इसमें सहायक होता है। मोक्ष प्राप्ति सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। इस पुरुषार्थ की तरफ शान्त रस बढ़ाता है। अतएव शान्त रस काश्मीरी साहित्यशास्त्री अभिनवगुप्त (सन् ९५०-८६० ई०) के शब्दो में अन्य रसों की अपेक्षा श्रेष्ठ रस है। कल्हण ने अपने पूर्व के अलंकार शास्त्री तथा काव्याचार्यों के मत के अनुसार शान्त रस को श्रेष्ठ रस मानकर काश्मीर के पूर्व विद्वानों के मतों का अनुकरण किया है। पाठभेद : श्लोक संख्या २४ में 'स्यंद' का 'स्पंद', 'मंग' का 'संग' 'सांग' और 'राज' का 'राजा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २४ (१) शुक्ति पुट-इस शब्द का साधारण अर्थ होता है, सीप का खोल या सुतुही। शुक्ति पुट तरल पदार्थ पीने के काम में आता है। श्री आर. एस. पण्डित इस श्लोक पर टिप्पणी लिखते हैं। 'कल्हण प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक हिराक्लीत्तस की तरह जीवन को शाश्वत माना है। तरंगिणी के जल के समान जीवन का क्रम टूटता नहीं है। वह सतत चलता रहा है। भारतीय और यूनानी दोनों जीवन की अविच्छिन्नता में विश्वास करते थे। सुरा पीने के लिए शुक्ति पुट के गिलास कल्हण के समय प्रचलित रहे होंगे। वह तरंग ६:३६६ के सन्दर्भ में इसकी पुष्टि करता है। कुलीनों में इस प्रकार के पानपात्र प्रचलित थे। वरनियर का उदाहरण उन्होंने दिया है-"औरंगजेब काश्मीर में आया था तो उसे तिब्बती हरित मणि भेंट किया गया था। जिसका मुगलों के दरबार में बड़ा मूल्याकंन था। उसका रंग हरापन लिये था। उसपर उज्ज्वल शिराएँ थीं। वह इतना सख्त था कि हीरे के चूर्ण से ही उसे बनाया जा सकता था। इस प्रकार के पत्थरों से प्याले और अलंकृत पात्र बनाये जाते थे।" श्रोत्रशुक्तिपुटैः-यह शब्द काश्मीर में बहुत प्रचलित था। कल्हण के पश्चात् महाकवि जगद्धर भट्ट ने स्तुति कुसुमाञ्जलि में इस शब्द का प्रयोग किया है। उस समय काश्मीर में मुस्लिम राज स्थापित हो चुका था। उनका अनुमानित काल सन् १३५० ईस्वी है। कल्हण से २०२ वर्ष पश्चात् हुए थे।' पीता सुधा श्रवण शुक्ति पुटैः समक्ष- मास्वादिता पुनरियं शिवभक्तिरेव ॥ (नवम स्तोत्र : ३५)
२४ राजतरङ्गिणी पुरा सतीसरः कल्पारम्भात् प्रभृति भूरभूत् । कुक्षौ हिमाद्रेर्णोभिः पूर्णे मन्वन्तराणि षट् ॥ २५ ॥ काश्मीर वर्णन २५ कल्प का प्रारंभ था। छः मन्वन्तर बीत चुके थे। उस पुरा काल में हिमाद्रि कुक्षि¹ में अर्णवपूर्ण सतीसर² था।
जीवन और तरंगिणी की उपमा भारतीय दार्शनिक विचार की ओर लक्ष्य करती है। भारतीय आत्मा को अमर मानते हैं। जीवन कभी नष्ट नहीं होता। वह चलता रहता है। चलता रहेगा। जीवन की यह धारा कभी विच्छिन्न होने वाली नहीं है। पाठभेद · श्लोक संख्या २५ में 'पुरा' शब्द का पाठभेद 'पुरः' मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २५. (१) हिमाद्रि कुक्षि—हिमाद्रि शब्द का उल्लेख नीलमत पुराण में किया गया है। 'हिमाद्रि कुक्षि' शब्द काश्मीर के लिये नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी दोनों में मिलता है। कुक्षि का अर्थ कोख होता है। माता की कोख में जिस प्रकार शिशु सुरक्षित तथा आराम से रहता है, उसी प्रकार काश्मीर हिमालय की गोद में सब प्रकार से रक्षित सुखपूर्वक है। माता शिशु को अपने बाहु से घेर कर कोख में रखती है। हिमालय काश्मीर को शिशु तुल्य अपने शैल बाहु से घेरकर माता की तरह गोद में रखे हुए हैं। शिशु माँ के पीन पयोधर से चिपका रहता है। बिना प्रयास दुग्ध पान करता रहता है। ठीक इसी प्रकार काश्मीर में जलधारा चारो ओर शैल श्रृंग से स्रवित होकर बिना प्रयास काश्मीर की प्यास बुझाती रहती है। कुक्षि शब्द का प्रयोग इसी अर्थ में अनेक काव्यो में महान् भारतीय साहित्यकारों ने किया है। अश्वघोष ने कपिलवस्तु नगर को—'कुक्षिः हिमद्रि- रिरिव' कहा है (१ ३५२:३५५)। ऋग्वेद में— 'कुक्षि सोम पातमा.'—कोख के लिये कुक्षि शब्द का प्रयोग किया गया है ( १:८.७)। अथर्ववेद
१:८:७ तथा ७ ९:१२, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१:३८) में कुक्षिका का अर्थ भरा पूरा, रक्षित होना, किया गया है। ऋग्वेद (२:११:११) तथा १०:८६:१४, अथर्व वेद २:५:४,२:३३:४, ४:१६:३, ९:५:६० या ६०१, १०:९:१७ एवं ऋग्वेद में एक स्थान पर और कुक्षि का प्रयोग मिलता है। 'इय कुक्षयः सोम धानाः' अर्थात् दूध के समान कुक्षियाँ सोम गाधन हैं (३.३६:८)। रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने कुक्षि शब्द का प्रयोग दरी अर्थ में किया है—'पुंनाग गहनं कुक्षि बहुलोदालकाकुलम्।' वाल्मीकि रामायण, किष्किन्ध्या काण्ड ४२:७। हिमाद्रि कुक्षि शब्द का प्रयोग बड़े अच्छे ढंग से नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी में किया गया है। इसमें हिम बर्फ के लिये और अद्रि शैल के लिये व्यवहृत किया गया है। हिमाद्रि का अर्थ होता है बर्फ का पहाड़। कुक्षि का अर्थ कोख है। महाभारत में सागर तट के देशों के लिये भी कुक्षि शब्द का प्रयोग किया गया है यथा—'ततः सागरकुक्षिस्थान···' सभापर्व ३२:१६। अतः हिमालय शैल की कोख में स्थित प्रदेश काश्मीर है। इसका संकेत हिमाद्रि कुक्षि शब्द करता है। हिमालय के अंक में स्थित काश्मीर माता की कोख में शिशु की तरह रक्षित है। हिमाद्रि शब्द का प्रयोग विशाल किंवा विग्रहराज (सन् १०५६-१०६४ ई०) 'चमन वंश' अजमेर तथा शाकम्भरी के सम्बन्ध में किया गया है। (इण्डियन एण्टीक्वेरी १९:२१५ अप्रकाशित) हिमाद्रि शब्द का प्रयोग हिमालय के लिये नीलमत पुराण तथा राजतरंगिणी दोनो ने किया है।
प्रथम तरङ्ग २५
प्राचीन काल में हिमालय का नाम, हिमवान् हिमाचल, हिमवंत, हैमवत, हिम शैल, पर्वतराज, नगाधिराज आदि था और आज भी है। भारतवर्ष का एक नाम हैमवत वर्ष है। वह हिमालय के नाम पर रखा गया है। हिमालय पर्वत इस प्रकार वर्ष पर्वत है। हैमवत क्षेत्र को किन्नर खण्ड भी कहीं-कहीं कहा गया है। (ब्रह्माण्ड पुराण २:१५:३१, वायु पुराण ३४:२८)। काश्मीर के साहित्य में हिमवंत शब्द का प्रयोग हिमालय पर्वत के लिये किया गया है। काश्मीर के उत्तर में उत्तरकुरुओं तथा मद्रो को इसके मूल अर्थात् दक्षिण निवास करने का उल्लेख है। हिमवंत शब्द में हिमालय की पर्वतमालाओं के अतिरिक्त आधुनिक नामधारी कराकोरम (कृष्ण गिरि), सुलेमान पहाड़ (धंजन पर्वत), हिंदू कुश (निषध), अल्ताई (चंडीरण) या माल्यवान् पर्वतमालाएँ आ जाती है। कराकुरम पर्वत के पूर्वीय शैलबाहु को 'विद्युत्' पर्वत कहा जाता है। सुलेमान पर्वत अर्थात् धंजन पर्वत के दक्षिणी भाग को 'कीर्तहर' पर्वत कहते हैं। (हरिवंश पुराण: १:१८ मत्स्य पुराण अ० १३, महाभारत वनपर्व २५३:१३५, १०, ६९४, ६९५; सभापर्व ३:५८-६०)। क्षुद्र हिमवंत पश्चिमी तथा महा हिमवंत हिमालय की पूर्वीय पर्वतमालाओ के लिये व्यवहृत किया गया है। विशेष द्रष्टव्य परिशिष्ट 'हिमालय' है। २. सती सर—नीलमत पुराण में सतीसर का निम्नलिखित उल्लेख मिलता है। इदं च शिखरं पश्य देशेऽस्मिन्नृप पश्चिमे । ६२ । नौबन्धनम् इति ख्यातं पुण्यं पापभयापहम् ॥41॥ कृतयुगे सदा काले व्यतीते तु मनुप्रदा । ६३ । विदधाति प्रजासर्गं यथापूर्वम् अरिन्दम ॥42॥ नौदेहन् सती देवी भूमिर् भवति पार्थिव । ६४ । यांस्त सु भूमीं भवति सरस् तु विमलोदकम् ॥43॥ षड्योजनायतम् रम्यं तदर्धेन च विस्तृतम् । ६५ । सतीदेशम् इति ख्यातं देवाक्रीडं मनोहरम् ॥44॥ आकाशम् इव गम्भीरं जलजैश् च विवर्जितम् ॥६६। शीतलामलपानीयम् सर्वभूमिमनोहरम् ॥45॥ अस्मिन् वैवस्वते प्राप्ते राजन् मन्वन्तरे किल । ६७ । मारीचाय ददौ दक्षः कश्यपाय त्रयोदश ॥46॥
अबुल फजल सतीसर को उमासर कहता है— काश्मीर पेश अज अग्रत सती सर नाम अस्त सती- नाम ईजा अस्त व सर नाम ए होज कता। फारस के लोग प्रायः हिंदू गाथा को मानते हैं। इतिहासकार बयैउद्दीन बेयल अपवाद है। वह कहता है 'आदम शरन दीप अर्थात् लंका से काश्मीर में आये। सेथ के वंश में काश्मीर का राज्य ११०० वर्ष रहा। हजरत सुलेमान ने काश्मीर को आबाद किया। उसने अपने भतीजा इसोन को काश्मीर का राजा बनाया। 'हिंदुओं ने राजा हरीमंद के नेतृत्व में काश्मीर पर विजय प्राप्त की। उसका वंश जलप्लावन तक राज्य करता रहा। जलप्लावन के पश्चात् तुर्किस्तान की एक जाति काश्मीर में आकर आबाद हो गयी। 'काश्मीर निवासियो को एकेश्वरवाद का उपदेश हजरत मूसा ने दिया। वे काश्मीर की भूमि पर दिवंगत हुए। उनकी मजार अथवा कब्र काश्मीर में है। उसका अभी पता लगाना बाकी है। कालांतर में काश्मीरियों ने हिंदुओं की बुतपरस्ती स्वीकार कर ली। काश्मीरियो के इस दोष के कारण काश्मीर में जलप्लावन हुआ था।' वाकयाते काश्मीर में उल्लेख है—'काश्मीर प्रदेश जल से भरा था। दैत्य जलदेव वहाँ रहता था। वह मनुष्यों को खाता था। आसपास जो कुछ मिलता था, खा जाता था।' विस्तृत वर्णन जलोद्भव के प्रसंग में किया गया है।
२६ राजतरङ्गिणी
सम्राट् अकबर के समय में प्रथम बार कश्मीर पर कश्मीर के अतिरिक्त अन्य कश्मीर वंशीय मुसलमान का राज्य स्थापित हुआ। सम्राट् अकबर जिस समय कश्मीर पहुँचे, तो अबुलफजल को कश्मीरियों ने एक पुस्तक, जिसका नाम 'राज- तरंगिणी' था, समर्पित की। उसमें चार हजार वर्ष पूर्व से कश्मीर के राजाओं का इतिहास लिखा था। यह पुस्तक संस्कृत में थी। सम्राट् अकबर ने आदेश दिया कि पुस्तक का फारसी में अनुवाद किया जाय। अबुल फजल अकबर का प्रियपात्र था। उसके नवरत्नों में एक था। आइने अकबरी में एक अध्याय सूबा कश्मीर पर लिखा गया है। वह राजतरंगिणी तथा तत्कालीन स्थिति पर आधारित है। मंत्री होने के कारण अबुल फजल साधनसंपन्न था। उसका वर्णन साधिकारिक माना जायेगा। वह लिखता है— 'इस इतिहास में कहा गया है कि कश्मीर का अधिकांश भाग प्रारंभिक काल मे केवल उसके पर्वतों को छोड़कर जलमग्न था। उसे सतीसर कहते थे। सती महादेव की पत्नी है। सर का अर्थ सरोवर अर्थात् जहाँ जल एकत्र रहता है, किया जाता है। 'ब्रह्मा का एक दिन १४ मन्वन्तरों का होता है। प्रत्येक मन्वन्तर में ७० कल्प होते हैं। सत्तर चतुर्युग मिलकर एक कल्प होता है। यह वर्ष सम्राट् अकबर के राज्य काल का चौदहवाँ वर्ष है। कश्मीर में जिस समय आबादी हुई उसे बीते सातवें मन्वन्तर का २७वां कल्प हैं। तीन युग २८वें मन्वन्तर का बीत चुका है। चौथे युग का ४७०१वाँ सौर वर्ष व्यतीत हो चुका है।' वरनियर अपने नवें पत्र में लिखता है : 'प्राचीन काल में कश्मीर जल से भरा था। कश्यप ने बारहमूला के पास जल बहने के लिये मार्ग बनाया था। यह जहाँगीर काल के ऐतिहासिक श्री हैदर मलिक वल्द हसन मल्लिक बिन मल्लिक मुहम्मद नजी छदवराह [ १६१७-१६१९] के इतिहास में मिलता है। छदवराह श्रीनगर के पास एक गाँव है। वह कश्मीर का एक कुलीन था। यह इतिहास प्राचीन काल से अकबर के कश्मीर विजय तक का संक्षिप्त इतिहास है। उसका आधार राजतरंगिणी है। बड़शाह जैनुलआवदीन की आज्ञा पर इसका फारसी में अनुवाद किया गया था। इसका नाम 'बहसुल असम्र' रखा गया था। सन् १५९४ में बदायूंनी को अकबर ने आज्ञा दी थी कि वह उसका अनुवाद करे।' वरनियर लिखता है : 'निस्संदेह यह क्षेत्र कभी जल से भरा था। थेसलो की भी पूर्व काल में यही अवस्था थी। वह भी कभी जल से भरा था। किंतु मैं यह नहीं विश्वास करता कि जहाँ काटकर जल बहना (बारहमूला) बताया जाता है वहाँ पत्थर काटा गया है। वह आदमी का काम नहीं हो सकता। वह पर्वत बहुत ऊँचा है। मैं समझता हूँ कि यहाँ पर्वत बैठ गया है। यह भूकंप के कारण हुआ होगा। क्योंकि कश्मीर में भूकंप बहुत आते हैं।' सतीसर और काश्मीर—शुक ने चौथी राज- तरंगिणी में काश्मीर को सतीसर कहा है। सतीसर देश शब्द कश्मीर के लिए व्यवहृत होता रहा है। शुक लिखता है—मिरजा हैदर मुहम्मद वाक्पटु नौशेरवां के समान हैं। इस जगत् में पूर्वकालीन राजाओं के उन कार्यों को कहने के लिए पैदा हुआ है जो सतीसर में बहुत दिनों से बुरी हालत में थे। (दत्त ३५१) कश्मीर पर मुगलों के आक्रमणों की चर्चा करते हुए पुनः लिखता है—इस प्रकार सतीसर देश के पापियों पर वज्रपात हुआ। आकाश में धूमकेतु निरन्तर पूर्व और पश्चिम दिखाई देने रहे। (दत्त २७३)
प्रथम तरङ्ग २७ मुगलों के आक्रमण के पूर्व काश्मीर को सतीसर कहा जाता था । मैं समझता हूँ । सतीसर शब्द काश्मीर उपत्यका के लिए प्रयुक्त होता रहा है। इसमें वह भूखण्ड आता है जो कभी जल मग्न था । बारहमूला से वीर नाग तक का भूखण्ड वास्तव, में सतीसर था । अतएव काश्मीर मण्डल, काश्मीर राज्य तथा सतीसर शब्दों के अर्थ में भिन्नता है । काश्मीर मण्डल और काश्मीर राज्य के अन्दर सतीसर देश किंवा भूखण्ड का समावेश हो जाता है । सतीसर में काश्मीर मण्डल अथवा काश्मीर राज्य का समावेश नही होता । सतीसर काश्मीर मण्डल अथवा राज्य का एक भूखण्ड था । क्षेमेन्द्र ने लोक प्रकाश में तीन स्थानों पर सती सर का उल्लेख किया है । उससे मेरे मत की पुष्टि होती है : श्रीमत्सतीसरासा शारिकाशैलभूषितम् । श्रीजैननगरादस्मान्नानोपवनविभूषितम् ॥ २ ॥ अस्ति त्रिभुवनाख्या मुत्तमं भूषणं भुवः । श्रीकश्मीरपुरं रम्यं नानोपवनशोभितम् ॥३॥ ( पृष्ठ ३४ ) सतीसर में शारिका शैल, जैन नगर, तथा काश्मीर पुरं का उल्लेख किया गया है । शारिका पर्वत सूखे सतीसर में है । जिस समय सतीसर में जल भरा था उस समय द्वीप की तरह इसका शिखर दिखाई पड़ता था । सतीसर के जल की गहराई ३०० से ४०० फीट तक थी । इस पर अकबर द्वारा निर्मित दुर्ग आज वर्तमान है । जैन नगरो का उल्लेख जोनराज श्रीवर तथा शुक की राजतरंगिणियों में है । ( दत्त ४७, १३१, १३८, २०६, ३७१ ) कश्मीर पुर शब्द यहाँ श्रीनगर किंवा प्रवरसेनपुर के लिये आया है । श्रीनगर शब्द लोग भूल गये थे । कश्मीर पुर शब्द श्रीनगर के लिए व्यवहृत होने लगा था । प्रवरसेनपुर का भी उल्लेख लोक प्रकाश (पृष्ठ ३५) मे किया गया है । श्रीनगर शब्द का उल्लेख जोनराज, श्रीवर और शुक की राज तरंगिणियों में प्रायः, नही मिलता है । प्रवर पुर ( द० २८, २०१, ४२६ ) तथा प्रवरेश पुर का ( द० २३२ ) उल्लेख मिलता है । लोक प्रकाश में पृष्ठ ६० पर पुनः सतीसर का उल्लेख किया गया है : त्रिविष्टपस्य सारं तत्पार्थिवं क्षेत्रमीश्वरम् । तत्रापि सारं हिमवांस्तत्र सारं सतीसरः ॥२॥ सतीसर और काश्मीर मण्डल में स्पष्ट भेद किया गया है : मनुवारजभित्यूचुः पूतनात्मकध्यते किल । सतीसरसि ग्रामाणां यत्प्रमाणमुदीरितम् । षष्टियामसहस्राणि षष्टिग्रामशतानि च । षष्टियामस्त्रयो ग्रामा ह्येतत्कश्मीरमण्डलम् ॥३॥ शुक की चौथी और अन्तिम राजतरंगिणी है । जिसे शुक काश्मीरी पंडित ने प्राचीन शैली पर लिखा है । तत्पश्चात् काश्मीर में पुरानी शैली पर संस्कृत में इतिहास लिखने की परम्परा लोप हो गयी । मुगल शासन के साथ मुसलमान लेखको का काल आता है । उन्होने परसियन अर्थात् फारसी मे अधिकतर लिखा है । काश्मीरी पण्डित भी फारसी में विद्वत्ता प्राप्त कर, प्रथम फारसी में लिखे तत्पश्चात् उर्दू में और अब अग्रेजो में लिखने लगे है । जनरल ए. कनिंघम भूगर्भीय चिन्हो के अध्ययन से इसो परिणाम पर पहुँचे है कि काश्मीर उपत्यका जल से भरी थी । वे लिखते हैं : 'एक पर्वतीय चट्टान ( बिलफ़ ) तन्तमूल तथा बारहमूला के १६ मील अधोभाग में समकोण बनाती झेलम नदी से ऊपर उठी है । उसको ऊँचाई करीब ३ या ४ सो फीट होगी । कुछ स्थानो पर मैने देखा
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प्रथम तरङ्ग २९
महासागर के धरातल तथा समुद्र के नीचे से निकली हैं। मूल झील का नमकीन जल क्रमशः अनेक मीठे चश्मों तथा स्रोतस्विनियों के आते जलों की बाढ़ के कारण लोप हो गया। उसी समय बारहमूला के समीप पर्वत जो कि जल के उस स्थान पर रोक रखा था फट कर अलग होगया। दूसरे जल के अवरोध अलोड़ मिट्टी (एल्लूवियन) के जमा होने में सहायक हुए जोकि बाड़ों के कारण पहाड़ी की मिट्टी लाने लगे। वे मिट्टी को बाहर जाने से रोकने लगे और यही कारण है कि अपनी पड़ोसी भूखण्डों किंवा प्रदेशों की अपेक्षा काश्मीर उपत्यका में अधिक मिट्टी जम गयी। क्रमशः इस नवीन बनी हुई झील में जल के कारण स्वतः गहरी प्रणाली अपने लिए बना लिए और समय-समय पर वे अचानक पानी के स्तर के घटाव के कारण कुछ जल रोकने वाले बारहमूला के पास वाले व्यवधानों को अपने साथ बहाता गया। इस बात का प्रमाण कुछ भागों में मिलता है जहाँ कि चूने के पत्थरों पर क्रमशः जल के घटाव के कारण किनारों के जल के कारण घिसते हुए ढालू हो गये हैं। जैसे जैसे समय बीतता गया और क्रमशः झील के जल का स्तर नीचा होता गया। पानी जो पहले झील में था वह झेलम नदी के गति के स्तर में आ गया। और झेलम नदी ने स्वयं एक नाली का रूप उपत्यका के सब से निचले भाग में धारण कर लिया और इस प्रकार वहाँ बारहमूला पास के बचे हुये पानी रोकने वाले व्यवधानों को घिसने लगी और द्रुतगामी गतिशील नदी का रूप धारण कर लिया जैसा कि हम उसे आज उपत्यका को त्याग कर जाते हुए देखते हैं। चारो तरफ के पर्वतों से आता हुआ बढ़ता पानी झेलम के कारण बाहर निकलता जाता है और उपत्यका को अपना पुराना झील का रूप बनने नहीं देता।" ट्रॅवेल इन काश्मीर—७१-७३
कनिंघम द्वारा वर्णित स्थानों को मैंने स्वयं सन् १९६४ में जाकर देखा। बामजू की गुफा के अन्दर एक मन्दिर बना है। गुफा अँधेरी है। लगभग २१० फीट लम्बी है। आगे चलते-चलते पतली हो जाती है। इसके विषय में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इस गुफा में पानी टपकता रहता है। मक्खों के छाता की तरह जल टपकने से छत बन गयी हैं। एण्डरू विलगन वहाँ जिस समय आये थे। यहाँ पर मनुष्यों की हड्डियाँ पड़ी थीं। मालूम होता है मन्दिर के दर्शनार्थ कोई यात्री आया रहा होगा और मर गया था। गुफा में मशाल की रोशनी से जाया जाता है। यहा पर्वत सीधा उठता है। ढाल कम है। उस पर भूगर्भीय चिन्ह आज भी वर्तमान हैं जिनसे कनिंघम के तर्क की पुष्टि होती है।
पामपुर तथा समीपवर्ती करेवा पर यदि व्यक्ति खड़ा हो जाय तो उसे चारो ओर ऊँचा पर्वत मिलेगा। जमीन भूरी और कुछ बलुई है। यहाँ केसर होती है। बनिहाल श्री नगर की सड़क कुछ करेवा के समीप से जाती है। वहाँ पर करेवा की बनावट स्पष्ट बताती है कि उसमें तीन तरह की मिट्टी का स्तर है। कोई भी यात्री बस अथवा मोटर से यात्रा करते समय इसे लक्ष्य कर सकता है।
गुहा निवासियों की जो खुदाई बर्जहोम काश्मीर में हुई है वह भी एक टीले पर है। वहाँ पहुँचने के लिए कच्ची सड़क बनाई गयी है। सड़क बनाने में ढाल की कुछ जमीन काटी गयी है। मेरी दृष्टि में यह बात थी। मैने वहाँ भी टीले अर्थात् करेवा की बनावट में भूमि के स्तरों की मिट्टी में अन्तर पाया। श्री खजाची केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग का, जो इस समय वहाँ टेस्ट लगाकर खनन कार्य कर रहे थे, मैने ध्यान आकर्षित कराया। मैने अपने शिपिंग बोर्ड के चेयर- मैन के काल में भारत के पत्तनों का भ्रमण किया है। जल की गति तथा उनके द्वारा भूमि पर पड़े चिह्नों का अध्ययन किया है। यहाँ की खोदाई से स्पष्ट प्रतीत होता है कि टीले के निचले भाग में कभी जल था। उस जल का चिह्न खुले हुए स्थान पर प्रकट होता है।
३८ राजतरङ्गिणी १
है कि पर्वतीय चट्टानें ८ सो फीट ऊँचाई से कम नहीं हैं । तन्तमूल के समीप झेलम समुद्र की सतह से ५ हजार फीट ऊंचाई पर है । समस्त काश्मीर उपत्यका जलमय रही होगी । जब तक वह चट्टान घिसकर पतली नहीं हो गई होगी । काश्मीर की झील का जल स्तर समुद्र की सतह से ५८०० फीट ऊँचा है । उपत्यका में इस समय तक के बचे करेवा और बिखरी एलूवियल (कछारी) समतल भूमि से ५० या १०० फीट ऊंचाई पर जल रहा होगा । भारतण्ड की ऊँची भूमि जल के नीचे नहीं रही होगी । वामजू की गुफा के चूने के पत्थरो के चट्टान के ऊपर समयर तटवर्ती पानी की सतह का चिह्न स्पष्ट दिखाई देता है । इसी प्रकार वामन के पवित्र जलस्रोत के ऊपर इस प्रकार के चिह्न दिखाई देते हैं । शुपियान नदी पर स्थित रामू के सराय के ऊपर करेवा एक किनारा बनाता है । उसको ऊंचाई १०० फीट है । उसके क्षैतिज परतो में विभिन्नता है । सबसे ऊँचाई पर २० फीट की जमीन एलूवियल है । उसके पश्चात् २० फिट का परत गोले-गोले पत्थरो और भुरभुरी मिट्टी का बना है । सबसे नीचे का परत कड़ी नीली मिट्टी का है । यह परत निश्चय ही झील के जल की निश्चल स्थिति के कारण बन गया होगा । किन्तु मध्यवर्ती मिट्टी की परत उस समय बनी होगी जब उपत्यका का जड़ बड़े वेग के साथ तन्तमूल के नीचे वाली चट्टान के अवरोध के हट जाने के कारण निकला होगा । यह जणावरोध चट्टान के अकस्मात् टूट जाने के कारण हुआ होगा । सबसे ऊपर की मिट्टी उस समय जमी होगी जबकि पानी घटता-घटता अपनी वर्तमान स्थिति पर आ गया होगा । तत्पश्चात् चट्टान का अवरोध अथवा पानी रोकने वाली पथरीली नदी का नदीगर्त क्रमशः जल प्रवाह के कारण घिसता-घिसता क्षीण हो गया होगा तो विभिन्न नदियों ने झील के पुराने गर्त में नवीन धाराओं में अपने को परिणत कर लिया होगा । जब तक कि मोनार, पामपुर तथा खानपुर के करवा घटते पानी के कारण द्वीप तुल्य लगते होंगे । और कालान्तर में लम्बे चोपटे शिखरीय पहाड़ियों के रूप में खुले मैदान में रह गये जैसे आज दिखाई पड़ते है ।' (लद्दार) डब्लू वेकफील्ड लिखते हैं : कोई प्रामाणिक प्रमाण इस बात का नहीं मिलता कि काश्मीर उपत्यका झील से अकस्मात् अपनी वर्तमान दशा में किस समय परिवर्तित हो गयी है जैसा कि आज दिखाई देती है । न तो हमे यह प्रमाण मिलता है कि यह झील कब सूख गयी । अथवा यह प्रक्रिया बारहमूला दर्रा के समीप हठात् एक मार्ग बन जाने के कारण हो गया अथवा इसका पानी कालान्तर में निकलता गया ।' (हैप्पी वैली ६९, ६०) वाइन के इस सिद्धान्त पर कि वह कभी समुद्री जल की झील थी और समुद्र का पानी निकल जाने पर प्राकृतिक मीठे पानी के झरनों के कारण नमकीन जल समाप्त होकर काश्मीर उपत्यका ने वर्तमान रूप प्राप्त किया है, वेकफील्ड लिखता है- इसका कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिलता कि उपत्यका का जल हठात् बाहर निकल गया और उसने वह रूप प्राप्त कर लिया है जिसे हम आज देखते हैं । बातो की जाँच करने और जैसा कि एक योग्य भूगर्भ-शास्त्रीय करता है । बात उल्टी साबित होती है । वाइन ने उन्हें स्वय सम्मुख रखा है । वह योग्य तथा निपुण पर्यवेक्षक था । वह यहाँ के निवासियो की परम्परा में विश्वास करता है कि उपत्यका अपने मूल रूप में ३०० या ४०० फीट गहरी झील थी । किन्तु वह कहता है कि समय प्रभाव के कारण पानी बहकर बाहर निकल गया । अपने पर्यवेक्षण में वह इस नतीजे पर आगया है कि यहाँ गहरी हरी अथवा बादामी चट्टानो की पहाड़ियों को जो काश्मीर के चारो तरफ है वे विशाल
प्रथम तरङ्ग २९ महासागर के धरातल तथा समुद्र के नीचे से निकली है। मूल झील का नमकीन जल क्रमशः अनेक मीठे चश्मों तथा स्रोतस्विनियों के आते जलों की बाढ़ के कारण लोप हो गया। उसी समय बारहकूला के समीप पर्वत जो कि जल के उस स्थान पर रोक रखा था फट कर अलग होगया। दूसरे जल के अवरोध अलोढ़ मिट्टी (एल्लूवियन) के जमा होने में सहायक हुए जोकि बाढ़ों के कारण पहाड़ी की मिट्टी लाने लगे। वे मिट्टी को बाहर जाने से रोकने लगे और यही कारण है कि अपनी पड़ोसी भूखण्डों किंवा प्रदेशों की अपेक्षा काश्मीर उपत्यका में अधिक मिट्टी जम गयी। क्रमशः इस नवीन बनी हुई झील में जल के कारण स्वतः गहरी प्रणाली अपने लिए बना लिए और समय-समय पर वे अचानक पानी के स्तर के घटाव के कारण कुछ जल रोकने वाले बारहकूला के पास वाले व्यवधानों को अपने साथ बहाता गया। इस बात का प्रमाण कुछ भागों में मिलता है जहां कि चूने के पत्थरों पर क्रमशः जल के घटाव के कारण किनारों के जल के कारण घिसते हुए ढालू हो गये हैं। जैसे जैसे समय बीतता गया और क्रमशः झील के जल का स्तर नीचा होता गया। पानी जो पहले झील में था वह झेलम नदी के गति के स्तर में आ गया। और झेलम नदी ने स्वयं एक नाली का रूप उपत्यका के सब से निचले भाग में धारण कर लिया और इस प्रकार वहाँ बारहकूला पास के बचे हुये पानी रोकने वाले व्यवधानों को घिसने लगी और द्रुतगामी गतिशील नदी का रूप धारण कर लिया जैसा कि हम उसे आज उपत्यका को त्याग कर जाते हुए देखते हैं। चारों तरफ के पर्वतों से आता हुआ बढ़ता पानी झेलम के कारण बाहर निकलता जाता है और उपत्यका को अपना पुराना झील का रूप बनने नहीं देता।” ट्रेवेल इन काश्मीर—७१-७३ कनिंघम द्वारा वर्णित स्थानों को मैंने स्वयं सन् १९६४ में जाकर देखा। पामपूर की गुफा के
अन्दर एक मन्दिर बना है। गुफा अँधेरी है। लगभग २१० फीट लम्बी है। आगे चलते-चलते पतली हो जाती है। इसके विषय में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इस गुफा में पानी टपकता रहता है। मक्खी के छाता की तरह जल टपकने से छत बन गयी है। एण्डरू विलसन वहाँ जिस समय आये थे। यहाँ पर मनुष्यों की हड्डियाँ पड़ी थी। मालूम होता है मन्दिर के दर्शनार्थ कोई यात्री आया रहा होगा और मर गया था। गुफा में मशाल की रोशनी से जाया जाता है। यहाँ पर्वत सीधा उठता है। ढाल कम है। उस पर भूगर्भीय चिन्ह आज भी वर्तमान हैं जिनसे कनिंघम के तर्क की पुष्टि होती है। पामपूर तथा समीपवर्ती करेवा पर यदि व्यक्ति खड़ा हो जाय तो उसे चारों ओर ऊँचा पर्वत मिलेगा। जमीन भूरी और कुछ बलुई है। यही वेसर होती है। वनिहाल श्री नगर की सड़क कुछ करेवा के समीप से जाती है। वहाँ पर करेवा की बनावट स्पष्ट बताती है कि उसमें तीन तरह की मिट्टी का स्तर है। कोई भी यात्री बस अथवा मोटर से यात्रा करते समय इसे लक्ष्य कर सकता है। गुहा निवासियों की जो खुदाई बर्जहोम काश्मीर में हुई है वह भी एक टीले पर है। वहाँ पहुँचने के लिए कच्ची सड़क बनाई गयी है। सड़क बनाने में ढाल की कुछ जमीन काटी गयी है। मेरी दृष्टि में यह बात थी। मैंने वहाँ भी टीले अर्थात् करेवा की बनावट में भूमि के स्तरों की मिट्टी में अन्तर पाया। श्री खजांची केन्द्रीय पुरातत्त्व विभाग का, जो इस समय वहाँ टेण्ट लगाकर खनन कार्य कर रहे थे, मैंने ध्यान आकर्षित कराया। मैंने अपने शिपिंग बोर्ड के चेयर- मैन के काल में भारत के पत्तनों का भ्रमण किया है। जल की गति तथा उनके द्वारा भूमि पर पड़े चिह्नों का अध्ययन किया है। यहाँ की खोदाई से स्पष्ट प्रतीत होता है कि टीले के निचले भाग में कभी जल था। उस जल का चिह्न खुले हुए स्थान पर प्रकट होता है।
२० राजतरङ्गिणी अथ वैवस्वतोऽस्मिन् प्राप्ते मन्वन्तरे सुरान्। द्रुहिणोपेन्द्ररुद्रादीनवतार्य प्रजासृजा ॥ २६ ॥ २६ वैवस्वत मन्वन्तर¹ का प्रारम्भ था। सतीसर में जलोद्भव असुर निवास करता था प्रजापात कश्यप ने द्रुहिण, उपेन्द्र, रुद्र से प्रार्थना की। देवताओं के साथ जलोद्भव वध निमित्त उतरे। वूलर लेक काश्मीर उपत्यका का सबसे निचला मत्स्य पुराण विष्णु पुराण नीलमत पुराण स्थान और पूर्व सतीसर का अवशेष समुद्र की सतह १. स्वायंभुव " १. स्वायंभुव से ५१८७ फीट ऊँचा है। श्रीनगर ५२३५ फीट २. स्वारोचिष " २. स्वारोचिष समुद्र की सतह से ऊँचा है। बावन जिसके समीप ३. उत्तम, औत्तम " ३. औत्तम वामजू गुफा है वह भूमि समुद्र की सतह से ५८१६ ४. तामस " ४. तामस फीट ऊँचा है। अवन्तीपुर तथा बिज बेहरा अर्थात् ५. रैवत " ५. रैवत विजयेश्वर ५४०० फीट समुद्र की सतह से ऊँचा ६. चाक्षुष " ६. चाक्षुष है। श्रीनगर तथा अवन्तीपुर और बिज बेहरा के ७. वैवस्वत " ७. वैवस्वत बीच अनेक करेवा तथा पामपुर हैं। इस प्रकार यह ८. सावर्णि " ८. अर्क सावर्णि स्पष्ट है कि जिस समय काश्मीर उपत्यका में जल ९. दक्ष सावर्णि रुचि ९. ब्रह्म सावर्णि भरा होगा उस समय वामजू पामपुर आदि जो वूलर १०. ब्रह्म सावर्णि भौम १०. भद्राश्व (रुद्रेन) लेक की सतह से ऊँचाई पर हैं सर के तट होगी। दोनों पाठ हैं) वहाँ पर पानी का चिह्न बन जाना स्वाभाविक है। ११. धर्म सावर्णि ११. दक्ष सावर्णि १२. रुद्र पुत्र सावर्णि १२. रौच्य काश्मीर में सन् १५५२, १६८०, जून २६ १३. देव सावर्णि १३. भौत्य सन् १८२८ तथा सन् १८८५ में भयंकर भूकंप १४. इन्द्र सावर्णि आया था। सन् १८८५ के भूकंप से १३०,००० नीलमत में भूतकालीन छः तथा वर्तमान सातव वर्ग मील क्षेत्र प्रभावित हुआ था। लगभग ५०० मनु वैवस्वत का नाम मिलता है परन्तु भविष्य के वर्ग मील में तो महाभयंकर विनाश हुआ था। मनुओ के नामो में भिन्नता है • लगभग २०,००० मकान, १०,००० जानवर, कालकल्पावुभौ पूज्यौ मनवश्च चतुर्दश। ३००० मनुष्य, मर गये थे। बारहमूला में सबसे अतीताश्च भविष्याश्च तेषाम् नामानि मे शृणु ॥ भयानक असर हुआ था। वहाँ एक किला, यात्री —५६४/ ६० निवास तथा शहर के लगभग तीन चौथाई मकान स्वायंभुवो मनुः पूर्वम् मनुः स्वारोचिषस्तथा। नष्ट हो गये थे। द्यौत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ॥ —५६१/६९१ पादटिप्पणियाँ : वैवस्वतोऽर्कसावर्णिर्ब्रह्मसावर्ण्य एव च। २६ (१) वैवस्वत मन्वन्तर—नीलमत पुराण भद्रेश दक्ष सावर्णी रौच्य भौतस्तथैव च ॥ तथा अन्य पुराणों में वर्णित मनुओ के नाम तथा —५70/६९२ तालिका में अंतर है— संपूजनीया देवेन्द्रस्तथा मन्वन्तरानुदश। —571/६९३
प्रथम तरङ्ग ३१ भागवत पुराण : ३:१:५२-५६, ५:१.२२, ८:१:१९, ८:१:२३, २७, ८:५:२, १३:१०, ११, १८, २४, २७, ३०, ३३, ८.७:५ ब्रह्माण्ड पुराण : २:१४.४, वायु पुराण : ६२, मनुस्मृति : १:६१-६३, विष्णु पुराण : ३:२-३ ऋग्वेद : १:८०:१६, २:३३:१३, ८:३०:३, ८:६३:१, ८:५१:१, १०:१००:५ तैत्तिरीय संहिता १:५:१:३ शतपथ ब्राह्मण ७:५.५:३, २:२:१०:२, २-··· ६०१, २:३:८:३ जैमिनो उपनिषद् ब्राह्मण : ३:१५:१, ऐतरेय ब्राह्मण ५:१४:१:२ ३:१:९:४, अथर्ववेद ८:१०:२४, ३:३:२:१ १४:२:४१ ५:४:१०:५, पंचविश २३:१:६७। नीलमत पुराण के अनुसार १२ सौर मास का एक वर्ष होता है। दो मास का एक ऋतु, ६ ऋतुओं का एक अयन, २ अयनों का एक वर्ष और ४३२००० वर्षों का एक कलियुग होता है। कलियुग का दूना (८६४००० वर्ष) द्वापर, कलियुग का तिगुना (१२९६०००) त्रेता काल और चौगुना (१७२८००० वर्ष) सतयुग किंवा कृत युग काल होता है। एक मन्वंतर ७१ चतुर्युगों का होता है। मन्वंतर के अंत में सब कुछ नष्ट हो जाता है। सब कुछ जलमय हो जाता है। युग का प्रमाण ४३२००० वर्ष तथा मन्वंतर का प्रमाण १७२८००० वर्ष है। केवल हिमालय, हेमकूट, निषध, नील, श्वेत, शृङ्गवान्, गंधमादन, मेरु, माल्यवान्, महेन्द्र, मलय, सह्य, शक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य, पारियात्र का नाश नहीं होता। जम्बूद्वीप का सर्वथा विनाश हो जाता है। प्रलय के पश्चात् स्वयं महादेव जल स्वरूप स्थित रहते हैं। देवीसती एक नाव का रूप तत्काल धारण कर लेती हैं।। मनु उस नाव पर सर्व प्रकार के बीज रख देते हैं। मत्स्य रूप धारण कर विष्णु उस नाव को एक शृङ्ग की ओर खींच लाते हैं। उसे पर्वत के मस्तक पर लाकर बांध देते हैं। वह पर्वत शिखर काश्मीर की पश्चिम दिशा में स्थित नौबंधन शिखर है। शिखर पुण्यदायक है। पाप तथा भय को हरता है। कृतयुग के इतना समय बीत जाने पर मनु पुनः प्रजावर्ग की यथापूर्व रचना आरम्भ करते हैं। नावस्वरूप देह धारण की हुई सती देवी स्वयं भूमि का रूप धारण करती है। छः योजन लम्बा तथा ३ योजन चौड़ा रम्य विमलोदक सर बन जाता है। यहाँ देवगण मनोहर क्रीड़ा करते हैं। इस देश की ख्याति सती देश (काश्मीर) हो जाती है। जलजो से विवर्जित शीतल अमल जलपूर्ण देश की सब भूमि मनोहर हो जाती है। वैवस्वत मन्वंतर के आरंभ में दक्ष अपनी १३ कन्याओं का विवाह मरीचि के पुत्र कश्यप ऋषि से कर देते हैं। नीलमत पुराण ५०-६७ (ब्रीज) ३३-५५ .(जादू)। नौबंधन तीर्थ का शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख मिलता है १:८:१:१। बाइबिल में जलप्लावन किंवा जलप्रलय तथा नाव और उस पर सब प्रकार के बीज तथा सब प्रकार के प्राणियो का एक जोड़ा रखने का वर्णन मिलता है। उस नाव को 'हज़रत नूह का आर्क' कहते हैं। वह पर्वत शिखर पर जाकर रुक जाती है। कुरान शरीफ और बाइबिल मे यह गाथा दी गयी है। हिमालय और हेमकूट : प्रलय काल मे हिमालय तथा हेमकूट पर्वतो के बच जाने की बात नीलमत पुराण मानता है। हिमालय तथा हेमकूट दो भिन्न-भिन्न पर्वत माने गए हैं। हेमकूट पर्वत हिमालय के दक्षिण में है। बाण ने हर्षचरित के अध्याय ७ में कहा है कि अर्जुन ने राजसूय यज्ञ के समय हेमकूट पर अधिकार किया था। विक्रमोर्वशीय नाटक के प्रथम अध्याय में हेमकूट, तथा हेमकूट शिखर का उल्लेख आया है।
३२ राजतरंगिणी यहाँ पर हिमालय के लिये उसरा प्रयोग किया गया चारों युगों के महायुग का काल ४३२०००० है । हेमकूट क्षेत्र को पुरुष वर्ष तथा हिमवत् क्षेत्र को सौर वर्ष है । ब्रह्मा का एक दिन एक सहस्र महायुगों किन्नर खंड कहा गया है । किन्नर खंड आधुनिक का होता है । इस एक दिन को १ कल्प कहते हैं । हिमालय प्रदेशका किन्नौर-मंडल है । किम्पुरुष एक सत्युग का समय मान १७,२८,००० सौर वर्ष है । वर्ष है । इसे हिमालय के दूसरी तरफ पुराणों के त्रेता का समय मान १२, ९६,००० सौर वर्ष है । अनुसार मानते हैं । द्वापर का मान वर्ष ८,६४,००० वर्ष है । कलियुग का ४, ३२,००० मान वर्ष है । सृष्टि वर्ष का आदि- ( भागवत पुराण ५:१९; मत्स्य पुराण ११३:२९, काल आज से ७, १४, ४०,४१,४६,२५६ वर्ष पूर्व ११४:५९;६३-६५, १२१:४९, वायु पुराण ३४.२८, हुआ है । विष्णु पुराण २:२;१२ ।) ब्रह्मा की एक सहस्र वर्ष आयु जितनी विष्णु की किम्पुरुष प्रियव्रत का पौत्र और आग्नीध्र के नव एक घड़ी होती है । बारह लाख विष्णुओ की आयु पुत्रों में एक था । आग्नीध्र ने अपने पुत्रों के लिये के जितनी, रुद्र की आधी कला होती है । रुद्र की जम्बू द्वीप के वर्षों को विभाजित किया था । ( विष्णु एक अर्बुद आयु के काल का समय अक्षर ब्रह्म का पुराण २ १:१७ तथा १९ ) । किम्पुरुष वर्ष को उसने समय होता है । अपने पुत्र हेमकूट को दिया था । किम्पुरुष-वर्ष का राजा द्रुम्न था । कृष्ण तथा जरासंध के संघर्ष में मनुस्मृति के अनुसार कालपरिमाण में १८ निमेष द्रुम्न ने जरासंध का पक्ष लेकर कृष्ण के विपक्ष में की एक काष्ठा; तीस काष्ठाओं की एक कला; तीस युद्ध किया था । जरासंध ने गोमन्त आक्रमण के समय कलाओं का एक मुहूर्त, तीस मुहूर्तों का एक अहोरात्र पश्चिम पार्श्व में आक्रमणार्थ द्रुम्न को नियुक्त किया होता है । अहोरात्र का विभाग सूर्य के उदय अस्त के था । भागवत पुराण ( १:६:१२ तथा १०:५२:११ ) कारण होता है । मानव के दो पक्ष पितरों का एक के अनुसार परीक्षित ने उत्तर के देशों के विजय काल अहोरात्र होता है । कृष्ण पक्ष पित्रो के कर्म करने में किम्पुरुष देश को जीता था । तथा शुक्लपक्ष शयन निमित्त है । इसी प्रकार भूतों वैदिक साहित्य में किम्पुरुष के लिये घृणास्पद अर्थात् प्राणियों के लिये दिन चेष्टा तथा रात्रि शयन शब्दों का प्रयोग किया गया है । कुछ विद्वानों ने निमित्त निश्चित किया गया है । इन्हें जंगली, कुत्सित तथा कहीं बंदरों जैसे मनुष्यों मानव का एक वर्ष देवताओं का एक अहोरात्र की नकल करने वाला कहा है । ( ऐतरेय ब्राह्मण होता है । उत्तरायण देवताओं की चेष्टा तथा दक्षिणा- २:८, शतपथ ब्राह्मण १:२:३:९ तथा ७:५:२:३२; यन रात्रिकाल माना जाता है । चालीस हजार वर्ष ऐतरेय ब्राह्मण ३:१:१२.१ ।) का सत्युग होता है । चार सहस्र वर्षों की संध्या जगत् सृजन कर्ता ब्रह्मा है । उनकी आयु १०० तथा संध्यांश होता है । त्रेतायुग तीन सहस्र वर्षों का वर्षों की है । पूर्वार्द्ध काल ब्रह्मा का व्यतीत हो चुका होता है । तीन सौ वर्षों की संध्या तथा संध्यांश है । अर्थात् अपने जीवन का ५० वर्ष वे व्यतीत कर होता है । द्वापर दो सहस्र वर्षों का होता है । दो चुके हैं । ब्रह्मा के उत्तरार्द्ध काल के चारों महायुगों सौ वर्षों का संध्यांश होता है । कलियुग एक सहस्र के प्रथम मास के प्रथम पक्ष के प्रथम दिन की ३ घड़ी वर्षों का होता है । एक सौ वर्षों की संध्या तथा तथा ४२ पल अब तक बीत चुका है । संध्यांश होता है । ४
प्रथम तरङ्ग ३३ ―― चारों युग मिलकर देवताओं का एक युग होता है। देवताओं के सहस्र युग मिलकर ब्रह्मा का एक दिन होता है। सहस्र युगों की एक रात्रि होती है। इस प्रकार देवताओं के एक सहस्र वर्ष दिन तथा रात्रि मिलकर ब्रह्मा का अहोरात्र होता है। देवताओं के इकहत्तर गुने वर्षों का एक मन्वंतर होता है (मनुस्मृति १:६४-७६) । इस समय श्वेत वाराह कल्प के छः मन्वंतर बीत चुके हैं। राजतरंगिणी तथा नीलमत पुराण में इसी ओर संकेत किया गया है। सातवाँ वैवस्वत मन्वंतर चल रहा है। उसके २८वें महायुग के कलियुग का प्रथम चरण संधि में है। कार्तिक शुक्ल ६ के प्रथम प्रहर में श्रवण नक्षत्र, वृद्धियोग में सत्युग का जन्म हुआ था। सत्युग में, (१) मत्स्य (२) कच्छप, (३) वाराह और (४) नृसिंह अवतार हुए हैं। वैशाख शुक्ल तृतीया सोमवार को रोहिणी नक्षत्र, शोभन योग के द्वितीय प्रहर में त्रेता की उत्पत्ति हुई है। त्रेता में (१) वामन, (२) परशुराम एवं (३) रामचन्द्र के अवतार हुए हैं। माघ कृष्ण अमावस्या, शुक्रवार को धनिष्ठा नक्षत्र, परिघ योग; वृष लग्न में द्वापर की उत्पत्ति हुई है। इसमें (१) कृष्ण तथा (२) बुद्ध दो अवतार हुए हैं। भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी, रविवार, अश्लेषा नक्षत्र, व्यतीपात योग में अर्धरात्रि काल के मिथुन लग्न में कलियुग का जन्म हुआ है। विष्णु पुराण (अंश ४ अध्याय २४, श्लोक ११०-११३) के अनुसार भगवान् कृष्ण के स्वर्गारोहण के दिन से कलियुग आरम्भ होता है। कृष्ण के स्वर्गारोहण के साथ ही युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ राज्यत्याग किया था। इस युग में केवल कल्कि नामक एक अवतार होगा। कलिगताब्द संवत् इस समय ५०६८ तथा काश्मीर का सप्तर्षि संवत् ५०४३ तथा विक्रम संवत् २०२४ तथा शक संवत् १८८६ तथा सन् १६६७ ई०; हिजरी सन् १३८६-८७ और फसली सन् १३७४-७५ है। इस सनातन तथा प्रचलित संवत्सर गणना के अनुसार द्वापर में कृष्ण का अवतार ग्रहण करना ठीक बैठ जाता है। भगवान बुद्ध का समय २५०० वर्ष ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध होता है। यह अवतार द्वापर काल में नहीं पड़कर कलियुग में पड़ता है। नीलमत पुराण ने बुद्ध को एक अवतार माना है। एक विचित्र पहेली है। ज्योतिषियों का इसका समाधान करना आवश्यक है। नीलमत पुराण में बुद्धपूजा का वर्णन है। बुद्ध को भगवान् का अवतार माना गया है। विश्रादैत्यो जगन्नाथ प्राप्ते ब्रह्मन् कलियुगे । अष्टाविंशतिमे भाविबुद्धोनाम जगद्गुरुः ॥८०६॥ शास्त्रीय धारणा के अनुसार इस मन्वंतर के अवतार बुद्ध नहीं वामन हैं। सप्तर्षि : (१) अत्रि (२) कश्यप (३) गौतम (४) जमदग्नि (५) भरद्वाज (६) वशिष्ठ (७) विश्वामित्र है। वैवस्वत मन्वंतर के देवगण-१० अंगिरस, २ अश्विनी, १२ आदित्य, १० भृगुदेव, ४६ मरुत, ११ रुद्र, ८ वसु, १० विश्वेदेव और १२ साध्य हैं। इस मन्वंतर के इंद्र का नाम-उर्ध्वस्विन्, किंवा महाबल है। मनु के पुत्र; अरिष्ठ, इक्ष्वाकु, इल, करुष, कुश- नाभ, घृष्ट, नभ, नृग, पृषध्र, प्राशु, वसुमति तथा शर्याति हैं। काश्मीर किंवा कश्मीर काश्मीर किंवा कश्मीर शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में अनेक मत हैं। सनातन मत है। कश्यप ऋषि ने सतीसर को सूख जाने पर आबाद किया था। सतीसर का नाम कश्यपपुर पड़ गया। कश्यपपुर का अपभ्रंश कश्मीर किंवा काश्मीर शब्द है। ५
३४ राजतरङ्गिणी
पुर, नगर, पत्तन तथा क्षेत्र शब्दो के अर्थों में अन्तर है । नगर तथा पत्तन शहरी क्षेत्र का द्योतक है । किसी संज्ञा के अन्त में जोड़ देने पर नगर किंवा पत्तन स्थान विशेष का परिचायक होता है । पुर शब्द इससे भिन्न है । किसी व्यक्ति वाचक संज्ञा के साथ पुर जोड़ा जाता है । किसी स्थान को बसाने वाले व्यक्ति के साथ पुर शब्द जोड़ कर बसाने वाले की स्मृति चिरस्थायी की जाती है । काश्मीर में अवन्तीपुर, शूरपुर, जयपुर, प्रवरसेनपुर, जोनपुर, प्रतापपुर, हिरण्यपुर, कनिष्कपुर, जुष्कपुर, शिवपुरी, ब्रह्मपुरी, विष्णुपुरी, अभिमन्युपुर, आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं । श्रीनगर किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर नहीं बसाया गया था । उसका नाम श्रीनगर पड़ा । परन्तु श्रीनगर में ही प्रवरसेन ने नगर बसाया तो उसका नाम प्रवरसेनपुर हो गया । नागरिक शब्द देशीय किंवा राष्ट्रीयता का बोधक है । सम्पूर्ण देश के व्यक्तियों के लिए नागरिक शब्द व्यवहृत होता है । पौरजन किंवा पौर शब्द स्थानीय निवास स्थान का परिचायक है । वह किसी एक नगर में रहने की ओर संकेत करता है । नागरिक शब्द का समावेश अंग्रेजी सिटिजन शब्द में हो जाता है । काश्मीर में पुर शब्द व्यक्ति विशेष के नाम के साथ जोड़कर नगर वाचक बना दिया जाता था । आजकल पुर के स्थान पर व्यक्तियो के साथ नगर शब्द जोड़ने की प्रथा चल निकली है जैसे—टाटानगर, मोदीनगर गंगानगर, सरदारनगर आदि । पत्तन शब्द नगर तथा शहर के लिए प्रयुक्त किया जाता है । यह शब्द नदी तथा समुद्रतटीय नगर तथा बन्दरगाहो के लिये विशेष रूप से व्यवहृत हुआ है । पत्तन व्यापार का केन्द्र होता है । विशाखा पत्तन, मछली पत्तन आदि इसके उदाहरण है । समुद्र तटीय नगरों के अतिरिक्त अन्य स्थानों के नगरों के लिए नगर अर्थ में पत्तन शब्द का बहुत कम व्यवहार किया गया है ।
चाणक्य पत्तन शब्द की यही परिभाषा देता है— वारिस्थल पथ पत्तनानि च निवेशयेत् । (अध्यक्षप्रचार द्वितीय अधिकरण १ अध्याय १ प्रकरण १९) क्षेत्र शब्द का अपभ्रंश खेत शब्द है । अन्नोत्पा- दक भूमि, समतल भूमि, उत्पत्ति स्थान, प्रदेश तथा तथा तीर्थ स्थान के लिए क्षेत्र शब्द का व्यवहार किया गया है। क्षेत्र भूखण्ड विशेष की निर्धारित सीमा के लिए आता है । क्षेत्र के अन्तर्गत नगर, पुर, पत्तन, ग्राम आदि सब आ जाते हैं । काश्मीर में क्षेत्र शब्द तीर्थ स्थानों की सीमा के लिए व्यवहृत किया गया है। वाराह क्षेत्र, मडव क्षेत्र, उत्तर मानस क्षेत्र, विजयेश्वर क्षेत्र, नन्दिक्षेत्र, आदि इसके उदाहरण हैं । कुछ विदेशी विद्वानो ने एक और मत प्रकट किया है । 'कशप' नाम कश्यप ऋषि का है । 'मर' शब्द का अर्थ 'मठ' है । 'कशपमर' प्राचीन नाम था । कशपमर बिगड़ कर कश्मीर हो गया है । शुद्ध शाब्दिक अर्थ भी लगाया गया है । 'क' का अर्थ जल है । 'समीर' का अर्थ वायु किंवा हवा है । 'क' + 'समीर' दोनों शब्द मिलकर कसमीर हो गया है। कश्मीर का जल-वायु सर्वश्रेष्ठ है । अपनी जल वायु की उत्तमता के कारण भूखण्ड का नाम कश्मीर पड गया है । और अर्थ लगाया गया है । वायु के कारण जल सतीसर के बाहर निकल गया । अतएव भूखण्ड का नाम कश्मीर पड़ गया । डा० सूफी ने एक मत का प्रतिपादन किया है । उनका मत है । 'कस' का अर्थ होता है धोत 'मीर' का 'अर्थ' पर्वत है । कश्मीर चारों ओर पर्वत से घिरा है । कटोरा जैसा लगता है ।' इसलिए इस भूखण्ड का नाम कश्मीर पड़ गया । कुछ विद्वानो ने कश्मीर शब्द की व्युत्पत्ति को तोड़ मरोड़ कर एक विचित्र मत का प्रतिपादन किया है । उनका मत है । 'कश' एक शामी अर्थात्
प्रथम तरङ्ग ३५ सेमेटिक जाति या ट्राइब थी। उस जाति ने 'कश' नगर बसाया। यह नगर बुखारा में है। उसे अब 'शहर-ए-सब्ज' कहते हैं। वह दक्षिण, पश्चिम और पूर्व दिशाओं में पर्वत से घिरा है। वह शहर सातवीं शताब्दी में आबाद हुआ था। यहीं से काश्मीर में सेमेटिक लोग आये। यहूदियों का काश्मीर में आबाद होना सिद्ध होता है। हिन्दूराज काल में काश्मीर में कोई बाहरी आबाद नहीं हो सकता था। यहूदी इसके अपवाद थे। यहूदी सेमेटिक अर्थात् शामी जात है। अतएव अनुमान लगाया गया है कि इसका नाम 'कश' के आधार पर कश्मीर पड़ गया। उक्त वर्ग के लेखकों ने एक और अनुमान लगाया है। 'काशान' या 'काशगर' शब्द का अपभ्रंश कश्मीर हो गया। 'काशान' इराक में शहर है। तेहरान से १५० मील तथा इस्फ़हान से ९० मील ईशान दिशा में पड़ता है। देश भर में सबसे अधिक यहाँ गरमी पड़ती है। 'काशगर' चीनी तुर्किस्तान में उसकी पश्चिमी सीमान्त पर शहर है। काश्मीर के रहने वाले मुसल- मान काश्मीर को 'कशीर' कहते हैं। स्थानीय मुस- लिम जनता कश्मीर को 'कसीर' कहती है। इसलिए कश्मीर शब्द को 'काशगर' 'काशान' तथा 'कश' नगरों से जोड़ने का प्रयास किया गया है। श्रीनगर के स्थान पर कश्मीर शब्द श्रीनगर के लिए मुस्लिम काल में प्रयुक्त होता रहा है। सिखों के काश्मीर में आधिपत्य स्थापित हो जाने पर श्रीनगर और कश्मीर समानार्थक माने जाते थे। उक्त तीनों शहर हैं। श्रीनगर को कश्मीर कहा जाता था। अतएव 'कशीर' शब्द ही कश्मीर शब्द का मूल है। श्री स्तीन ने कश्मीर शब्द का अपभ्रंश 'कशीर' शब्द को माना है। उर्दू तथा फारसी में 'ब्राह्मण' शब्द को 'बरहमन' अबतक लिखते हैं। इसी प्रकार 'कश्मीर' को अगर उर्दू तथा फारसी के लेखक 'कशीर' लिखने लगे हों तो कोई आश्चर्य की बात नहीं मानी जा सकती है जिस प्रकार मुसलमान होने पर पुराना नाम बद- लकर मुस्लिम नाम रख दिया जाता है। उसी प्रकार काश्मीर मुस्लिम बहुल आबादी तथा मुस्लिम राज होने के कारण 'कश्मीर' के स्थान पर उसे 'कशीर' और काश्मीरी भाषा को 'कौशुर' कहा जाने लगा। इसी प्रकार १४ वीं शताब्दी में शाह हमदान ने जो काश्मीर उपत्यका के रक्षक सन्त मुसलमानों द्वारा माने जाते हैं। काश्मीर का नाम 'बाग-ए- सुलेमान' रख दिया था। शंकराचार्य पर्वत का नाम भी बदलकर 'तख्त-ए-सुलेमान' रखा गया। 'अनन्त' नाग शहर का नाम इस्लामाबाद पड़ा। यद्यपि आज भी अनन्त नाग एक जिला है। 'कश्मीर' या 'काश्मीर' शब्द महाभारत, पुराणादि सभी ग्रन्थों में मिलते हैं। उनका अस्तित्व आज से ४ या ५ हजार वर्ष पूर्व था। उस समय 'बाइबिल' जिसमें 'हजरत सुलेमान' का नाम आता है का अस्तित्व ही नहीं था। मुस्लिम काल का इतिहास चौदह सदी से अधिक तथा बाइबिल काल ईसा पूर्व २ हजार वर्ष से ऊपर नहीं जाता। कश्मीर शब्द प्राचीन शब्द है। यही प्रचलित है। निश्चयात्मक रूप से 'कश्यप' से इस शब्द को जोड़ना उचित प्रतीत होता है। · कम से कम २ हजार वर्षों से इतिहास इस बात का साक्षी है कि 'काश्मीर' शब्द सर्वदा प्रयुक्त होता रहा है। पतंजलि ने काश्मीर शब्द का उल्लेख किया है। उसके पश्चात् पाणिनि ने काश्मीर शब्द का उल्लेख किया है। प्लोतमी (सन् १५० ई०) यूरोपियन लेखक ने काश्मीर का नाम 'कस्र्पीरा' दिया है। वराहमिहिर (५वीं शताब्दी) के वृहद् संहिता में काश्मीर का उल्लेख किया है। हुयेन सांग (स० ५४१ ई०) चीनी पर्यटक ने काश्मीर को 'किया शि मिलो' लिखा है। रत्नावली नाटक (७ वी सदी) ('काश्मीरदेशजे क्षेत्रे कुमकुमम् पद्मवेदितन्-)' 'काश्मीर' शब्द का स्पष्ट उल्लेख है।
३६ राजतरङ्गिणी काश्मीरी लेखक क्षेमेन्द्र (सन् ९९० ई०) ने समयमातृका में कंकाली से काश्मीर का वर्णन कराया है। इसी समय प्रथम बार 'पंचाल धारा' अर्थात् पीरपंजाल या पीरपेन्चाल का उल्लेख किया गया है। बिल्हण (१०६३-१७) ने विक्रमाङ्क देव चरित के अन्तिम अध्याय में काश्मीर का वर्णन किया है। देशी, विदेशी, काश्मीरी सभी लेखकों ने काश्मीर किंवा कश्मीर शब्द का प्रयोग किया है। 'कश' काशीर' 'काशगर' 'काशान' आदि नामों से कश्मीर शब्द को सम्बन्धित करना मौलिक इतिहास को दूसरे रंग में रंगना कहा जायगा। राजतरंगिणी के लेखक कल्हण (रचना काल ११४८-११४९) द्वितीय राजतरंगिणी के लेखक जोनराज (रचना काल १४४६-१४५९) जोनराज तरंगिणी के लेखक श्रीवर (रचनाकाल १४५९-१४८६) राजावली पिटक के लेखक प्रजाभट्ट (सन् १५१३-१५१४) तथा श्री शुक (सन् १५८६) ने काश्मीर शब्द का ही प्रयोग किया है। इस प्रकार देखा जा सकता है कि सोलहवीं शताब्दी तक 'कशीर' 'कश' आदि शब्दो का पता नहीं था। इसके पश्चात् संस्कृत लेखकों की परम्परा का लोप होता है। उनका स्थान परसियन तथा उर्दू लेखक लेते हैं। इस काल में 'कश' 'कशीर' आदि शब्दों की व्युत्पत्ति तथा उनसे काश्मीर शब्द को जोड़ने का प्रयास किया जाने लगा। शक्तिसंगम तंत्र (भाग ३:७:९) में कश्मीर की सीमा का वर्णन किया गया है। इस तंत्र में भारत के लगभग ५६ देशों का वर्णन मिलता है। काश्मीर के सीमा निर्धारण में सहायता मिलती है। इसके अनुसार शारदामठ से कुंकुमाद्रि अर्थात् पामपुर तक का क्षेत्र काश्मीर कहा जाता था। शारदामठमारम्य कुंकुमाद्रितटांतरम्। तावत्काश्मीर देशः स्यात्पञ्चाशद्योजनान्तकः ॥ एक विचार है। उत्तर कुरु के लोग काश्मीर में आबाद थे। काश्मीर की सीमा के लिए कहा गया है। वह शारदा मठ अर्थात् वर्तमान शारदी तीर्थ जो कृष्णगंगा तथा कनकौरी नदी के संगम पर स्थित है; वहाँ से लेकर कुंकुमाद्रि अर्थात् पामपुर के केसर उत्पादक पहाड़ियों तक विस्तृत था। उसका विस्तार ५० योजन था। पामपुर मैं चार बार जा चुका हूँ। यह छोटा कस्बा है। ऊनी वस्त्र उत्पादन का बहुत बड़ा केन्द्र है। श्री गांधी आश्रम उत्तर प्रदेश का ऊन उत्पादन केंद्र है। केसर की खेती तथा उपज के लिये पामपुर प्रसिद्ध है। पामपुर के समीप कोई बड़ा पर्वत नहीं है। बानेहाल से श्रीनगर आने वाली सड़क के दक्षिण पार्श्व में पर्वतमालाएँ काफी दूर पड़ती हैं। पामपुर क्षेत्र में छोटी छोटी मिट्टी की पहाड़ियाँ बहुत मिलती हैं। दूर पर वितस्ता नदी बहती है। समथर भूमि अधिक नहीं है। भूमि का रंग भूरा है। सेव, बादाम बबूगोशा के बाग प्रायः मिलते हैं। कुंकुमाद्रि का अर्थ केसर का पहाड़ होता है। पामपुर की मृत्तिका पहाड़ियों से इसका अर्थ लगाया जा सकता है। सुदूर स्थित पर्वतमाला शीत ऋतु में तुषार पात से ढक जाती है। पामपुर का विस्तृत भूरा भूखण्ड दोनों ओर हिमाच्छादित पर्वतों के मध्य अत्यंत सुंदर दिखाई पड़ता है। अक्टूबर मास में दोनों ओर की पर्वतमालाओं पर तुषारपात आरंभ हो जाता है। मैं यह दृश्य देख कर मुग्ध हो गया था। लगभग एक घण्टा चुपचाप एक सेव के बाग में बैठा रहा। इस नगर के अतीत को स्मरण करता रहा। नवम्बर मास सन् १९६३ की काश्मीर यात्रा में वर्णन की सत्यता देखकर चकित हो गया। इसी तंत्र में देवी के वर्णन के साथ उल्लेख है।
[Page Header] प्रथम तरङ्ग ३५
[Left Column] काश्मीरात्तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवेशि मानसेशाच्च दक्षिणे ॥ श्लोक ३० पृष्ठ ७ औपधा ( औरसा ? ) श्चानि भद्राश्च किरातानां च जातयः । तोमरा हंसमार्गाश्च काश्मीरास्तंगणास्तथा ॥ मार्कण्डेय, वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराणों में 'काश्मी- रास्तंगणांस्तथा' उल्लेख आया है । मार्कण्डेय पुराण में एक स्थान पर सौराष्ट्र के साथ 'काश्मीराश्च सुराष्ट्राश्च' वर्णन मिलता है । यहाँ भोटांत देश के संबन्ध में कहा गया है कि वह काश्मीर से आरम्भ होकर कामरूप के पश्चिम तक फैला था । उसके पश्चिम में मानसरोवर, पूर्व में काश्मीर अर्थात् उत्तर में कामरूप तथा मानस में है । वर्तमान भूटान पूर्वकालीन भोट्ट देश का एक खंड मात्र है । पुराणो से प्रकट होता है । प्राचीन काल में भोट शब्द तिब्बत निवासियों के लिये प्रयुक्त होता था । भूटान से लेकर काश्मीर अर्थात् हिमालय के उत्तर का भूखंड तिब्बत का भाग रहा है । मानसेश का अर्थ शिव का निवास स्थान अर्थात् मानसरोवर है । विष्णु पुराण (अंश ४:१९) में वर्णन है । चन्द्रभागा और काश्मीर आदि देशो पर व्रात्य, म्लेच्छ, शूद्रादि राजागण राज्य का भोग करेंगे । , काश्मीर के प्राचीन गौरव पर विचार करने लगा । उसे यादकर दुःख और उमड़ते हुए मन के अतिरिक्त और कुछ मुझे नहीं मिला । शक्तिसंगम तंत्र ३:८:१२-१४ में कूर्मप्रस्थ का वर्णन किया गया है । कूर्मप्रस्थं महेशानि कथ्यते श्रृणु साम्प्रतम् ।।१२।। गोकर्णं दक्षभागे कामाख्या पूर्वगोचरः । उत्तरे मानरेश. स्यात् पश्चिमे शारदा भवेत् ।।१३ शारदा शब्द के विषय में कह चुका हूँ । काश्मीर
[Right Column] के लिये अनेक ग्रंथो तथा स्थानो पर शारदा शब्द प्रयोग किया गया है । यह बात सिद्ध होती है ! कूर्मप्रस्थ की सीमा के सन्दर्भ में कहा गया है । कूर्मप्रस्थ के उत्तर में (मानेश मानसरोवर), दक्षिण में गोकर्ण (नेपाल), पूर्व में कामाख्या (कामरूप), पश्चिम में शारदा (काश्मीर) है । मैने गोकर्ण महादेव का मन्दिर नेपाल में देखा है । उसका वर्णन अपनी पुस्तक 'जाग्रत् नेपाल' में किया है । देवस्थान मुझे बहुत सुन्दर, दिव्य तथा जाग्रत् प्रतीत हुआ ।. 'परेण हिमवन्त' उत्तरकुरु को कहा गया है । श्री जिमर ने वैदिक इंडेक्स १:८४ में काश्मीर को उत्तरकुरु कहा है । पाली साहित्य में उत्तरकुरु का स्थान सुमेरु के उत्तर बताया गया है । काश्मीर को को उत्तरकुरु के दक्षिण दिखाया गया है । उत्तर- कुरु को समुद्र से आवृत बताया गया है । ऐतरेय ब्राह्मण (८:१४:४) में उत्तरकुरु हिमालय के पार बताया गया है । वाल्मीकीय रामायण (४:५३:५६) में उत्तर में समुद्र का होना कहा गया है । ऐतरेय ब्राह्मण (८:२३) में वसिष्ठ सात्यहव्य ने उसे देव- क्षेत्र कहा है । काश्मीर का उल्लेख वीर पुरुषदत्त के नागार्जुनी कोण्डा लेख में आता है । पाणिनि ने उसका उल्लेख (४.२:१३३) किया है । पतंजलि ने (३:२:२ पृष्ठ १८८, १८९) तथा (१:१:६ पृष्ठ २७६) महाभारत और वृहत्संहिता में इसका देश रूप में उल्लेख किया है (१४:२९) । रामायण में काश्मीर आनंद रामायण में काश्मीर का वर्णन मिलता है । आनंद रामायण के याग कांड सर्ग ३:३२:३४ 'श्लोकों' में काश्मीर का उल्लेख आया है । अश्वमेध यज्ञ का आयोजन भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने किया था । यज्ञ का अश्व छोड़ा गया । वीर शत्रुघ्न, मंत्री, सामंत, सेना सहित अश्व की रक्षा के लिये साथ भेजे गये थे । शूरसेन, पांचाल, कुरुक्षेत्र, कुरु-जांगल, देश होते हुए अश्व ने काश्मीर
३८ राजतरङ्गिणी में प्रवेश किया। तत्पश्चात् भिल्ल देश, गौड़ देश, शुकदेश, यवनदेश, ताम्रदेश होता अश्व करतोया तट पर पहुँचा। वहाँ से चलता ज्वालामुखी के पर्वतीय क्षेत्रों में अश्व ने प्रवेश किया ! आनंद रामायण ने काश्मीर तथा उसके चारों ओर के देशों का वर्णन किया है। यह भौगोलिक वर्णन अंशतः ठीक है। काश्मीर के सीमावर्ती देशो यथा, गांधार, कांबोज, शिवि आदि देशो का स्पष्ट उल्लेख नही किया गया है। मालूम होता है कि आनंद रामायण के लेखक के समय में उन देशों की गणना यवन किंवा शक देश में होने लगी थी। भगवान् श्रीरामचन्द्र जी ने उत्तरी दिशा की तीर्थ यात्रा की थी। उसका वर्णन यात्रा कांड, आनंद रामायण (सर्ग ९।१-३१) में किया गया है। उसमे उनका ज्वालामुखी, देवप्रयाग, अलकनंदा के तट से होते हुए, श्रीबदरी आश्रम पहुँचना दिखाया गया है। श्रीबदरी आश्रम के पश्चात् श्रीराम केदारेश्वर गये। वहां से हिमाद्रि पर गये। यहाँ से महापथ होते हुए मानसरोवर की यात्रा की। मानसरोवर से बिंदु सरोवर गये। वहाँ से हिमालय होते हुए मेरु पर्वत गये। तत्पश्चात् कैलास पर गये। वहाँ से भागीरथी के तट से होते हुए हरिद्वार आए। हरिद्वार से कुरुक्षेत्र होते हुए इंद्रप्रस्थ पहुँचे। इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) से मधुवन (मथुरा), वृन्दावन, गोकुल तथा गोवर्धन होते हुए अवंतिका अर्थात् उज्जैन गये। मानसरोवर के पश्चात् देव, गंधर्व, किन्नर जातियों का उल्लेख आता है। प्रतीत होता है। भगवान रामचन्द्र काश्मीर के ऊपर अर्थात् उत्तरीय सीमा स्पर्श करते हुए, मेरु तक पहुंचे थे। भगवान् श्रीराम वहाँ से कैलास गये। इससे स्पष्ट होता है। उन्होंने पश्चिम की तीर्थ यात्रा यथा जालंधर, मूलस्थान, गांधार, कांबोज अथवा शिवि देश की नहीं की। मेरु के दक्षिण काश्मीर का स्थान निर्विवाद रूप से सभी प्राचीन ग्रन्थों ने स्वीकार किया है। वाल्मीकीय रामायण में काश्मीर. का नाम मुझे कही पर मिल नही सका। संभव है। अपने दृष्टिदोष के कारण उसे न देख सका हूँ। परन्तु मै समझता हूँ कि काश्मीर का स्पष्ट रूप से उल्लेख रामायण में नहीं है। योग वासिष्ठ रामायण मे काश्मीर का सबसे अधिक ऐतिहासिक और प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन किया गया है। काश्मीर इतिहास पर उससे विशेष प्रकाश पड़ता है। उस स्थान का वर्णन श्लोक २६ टिप्पणी में किया गया है। राज तरंगिणी में श्रीराम के काश्मीर आने की बात तथा उसका क्या प्रमाण है, आदि पर यथास्थान प्रकाश डाला गया है। एक स्थान पर उल्लेख मिलता है। राम ने काश्मीर में एक मंदिर का निर्माण करवाया था। महाभारत में काश्मीर महाभारत सभा पर्व (२७:१७) और भीष्म पर्व (९:५३-६७) में उल्लेख मिलता है। काश्मीर भारतीय जनपद था। अर्जुन ने इसे दिग्विजय के समय जीता था। सभा पर्व (३.४०१२:५२) तथा वन पर्व (५१.२६) के अनुसार काश्मीर निवासी महाराज युधिष्ठिर के लिये भेंट लाये थे। द्रोण पर्व (११:१६ तथा ७०:११) में उल्लेख आता है। काश्मीर को भगवान् श्रीकृष्ण तथा परशुराम ने विजय किया था। अर्जुन ने अपने दिग्विजय के समय काश्मीर को जीता था। तत. काश्मीँरकान् वीरान् क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः । व्यजयल्लोहितं चैव मण्डलैर्दशभिः सह ॥ —सभापर्व २७:१७ तिल्लारा मर्मराश्च मधुमत्तः सुकन्दरूः । काश्मीराः सिन्धुसौवीरा गान्धारादर्शकास्तथा ॥ —भीष्मपर्व ९:५३-६७
प्रथम तरङ्ग ३६ द्रविडाः सिंहलाश्चैव राजा काश्मीरकस्तथा । कुन्तिभोजो महातेजाः पार्थिवो गौरवाहनः ॥ —सभापर्व : ३४:१२ काश्मीराश्च कुमाराश्च घोरका हंसकायनाः । शिवि त्रिगर्त यौधेया राजन्या मद्र केकयाः ॥ —सभापर्व : ५२:१४ केकयान् मालवांश्चैव तथा काश्मीरकानपि । अद्राक्षमहमाहूतान् यज्ञे ते परिवेषकान् ॥ —म० :-वनपर्व ५१.२६ आवन्त्यान् दाक्षिणात्यांश्च पर्वतीयान् दशेरकान् । काश्मीरकानौरसिकान् पिशाचांश्च समुद्रगलान् ॥ —द्रोणपर्व ११:१६ भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजोत्तमाः । ततः काश्मीरदरदान् कुन्तिशुद्रकमालवान् ॥ —द्रोणपर्व: ७०:११ काश्मीर मंडल के विशेष महत्त्व का उल्लेख महाभारत में मिलता है । काश्मीर मडल में उत्तर के ऋषियो यथा नहुष, यंयाति, अग्नि तथा कश्यप का परस्पर विचार विनियम हुआ था । काश्मीरमण्डलं चैतत् सर्वपुण्यमरिंदम ॥ महर्षिभिश्चाप्युषितं पश्येदं भ्रातृभिः सह ॥ १० ॥ यत्रोत्तराणां सर्वेषामृषीणां नाहुषस्य च । अग्नेश्चैवात्र संवादः काश्यपस्य तु भारत ॥११॥ —वन पर्व : १३० काश्मीर मंडल के चंद्रभागा तथा वितस्ता नदियो में सात दिन नित्य स्नान करने पर कहा गया है, मनुष्य निर्मल हो जाता है । सप्ताहं चन्द्रभागां वै वितस्ता भूमिमालिनीम् । विगाह्य वै निराहारो निर्मलो मुनिवद् भवेत् ॥७॥ काश्मीरमण्डले नद्यो या. पतन्ति महानदम् । ता नदी: सिन्धुमासाद्य शीलवान् स्वर्गमाप्नुयात्॥९॥ अनुशासन पर्व : २५:७०९ उत्तर दिशा में कश्यप का निवास बताया गया है । काश्मीर उत्तर दिशा में है : अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपेश्च महानृषिः । गौतमश्च भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ॥३८॥ ऋषीकतनयश्चोग्रो जमदग्निः प्रतापवान् । धनेश्वरस्य गुरवः सप्तैते उत्तराश्रितः ॥ —अनुशासन पर्व : १५०:३८-३९ कश्यप की पत्नियां दक्ष की कन्याएं अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा, प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि, कद्रू थी । ते भार्ये कश्यपस्यास्तां कद्रूश्च विनता च ह । प्रादात् ताभ्यां वरं प्रीतः प्रजापतिसमः पतिः ॥ —आदि पर्व १६:६ दितिर्दितिश्चैदनुः काला दनायुः सिंहिका तथा । क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनि ॥१३॥ कद्रूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत । एतासां वीर्यसम्पन्नं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥१३॥ —आदि पर्व : ६५:१२ सुर, असुर दोनों के पूर्वपुरुष कश्यप हैं । मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः । जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः ॥ —आदि पर्व : ६६:३४ ज्येष्ठ पत्नी अदिति से १२ जनों का जन्म हुआ था : त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा । मारीचः कश्यपस्तस्यामादित्यान् समजीजनत् ॥ — आदि पर्व : ७५:१० कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से भगवान् वामन का अवतार हुआ था । कश्यपस्यात्मजः श्रीमानदित्या गर्भधारितः । पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम् ॥