राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[Page Header] प्रथम तरङ्ग ३५
[Left Column] काश्मीरात्तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवेशि मानसेशाच्च दक्षिणे ॥ श्लोक ३० पृष्ठ ७ औपधा ( औरसा ? ) श्चानि भद्राश्च किरातानां च जातयः । तोमरा हंसमार्गाश्च काश्मीरास्तंगणास्तथा ॥ मार्कण्डेय, वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराणों में 'काश्मी- रास्तंगणांस्तथा' उल्लेख आया है । मार्कण्डेय पुराण में एक स्थान पर सौराष्ट्र के साथ 'काश्मीराश्च सुराष्ट्राश्च' वर्णन मिलता है । यहाँ भोटांत देश के संबन्ध में कहा गया है कि वह काश्मीर से आरम्भ होकर कामरूप के पश्चिम तक फैला था । उसके पश्चिम में मानसरोवर, पूर्व में काश्मीर अर्थात् उत्तर में कामरूप तथा मानस में है । वर्तमान भूटान पूर्वकालीन भोट्ट देश का एक खंड मात्र है । पुराणो से प्रकट होता है । प्राचीन काल में भोट शब्द तिब्बत निवासियों के लिये प्रयुक्त होता था । भूटान से लेकर काश्मीर अर्थात् हिमालय के उत्तर का भूखंड तिब्बत का भाग रहा है । मानसेश का अर्थ शिव का निवास स्थान अर्थात् मानसरोवर है । विष्णु पुराण (अंश ४:१९) में वर्णन है । चन्द्रभागा और काश्मीर आदि देशो पर व्रात्य, म्लेच्छ, शूद्रादि राजागण राज्य का भोग करेंगे । , काश्मीर के प्राचीन गौरव पर विचार करने लगा । उसे यादकर दुःख और उमड़ते हुए मन के अतिरिक्त और कुछ मुझे नहीं मिला । शक्तिसंगम तंत्र ३:८:१२-१४ में कूर्मप्रस्थ का वर्णन किया गया है । कूर्मप्रस्थं महेशानि कथ्यते श्रृणु साम्प्रतम् ।।१२।। गोकर्णं दक्षभागे कामाख्या पूर्वगोचरः । उत्तरे मानरेश. स्यात् पश्चिमे शारदा भवेत् ।।१३ शारदा शब्द के विषय में कह चुका हूँ । काश्मीर
[Right Column] के लिये अनेक ग्रंथो तथा स्थानो पर शारदा शब्द प्रयोग किया गया है । यह बात सिद्ध होती है ! कूर्मप्रस्थ की सीमा के सन्दर्भ में कहा गया है । कूर्मप्रस्थ के उत्तर में (मानेश मानसरोवर), दक्षिण में गोकर्ण (नेपाल), पूर्व में कामाख्या (कामरूप), पश्चिम में शारदा (काश्मीर) है । मैने गोकर्ण महादेव का मन्दिर नेपाल में देखा है । उसका वर्णन अपनी पुस्तक 'जाग्रत् नेपाल' में किया है । देवस्थान मुझे बहुत सुन्दर, दिव्य तथा जाग्रत् प्रतीत हुआ ।. 'परेण हिमवन्त' उत्तरकुरु को कहा गया है । श्री जिमर ने वैदिक इंडेक्स १:८४ में काश्मीर को उत्तरकुरु कहा है । पाली साहित्य में उत्तरकुरु का स्थान सुमेरु के उत्तर बताया गया है । काश्मीर को को उत्तरकुरु के दक्षिण दिखाया गया है । उत्तर- कुरु को समुद्र से आवृत बताया गया है । ऐतरेय ब्राह्मण (८:१४:४) में उत्तरकुरु हिमालय के पार बताया गया है । वाल्मीकीय रामायण (४:५३:५६) में उत्तर में समुद्र का होना कहा गया है । ऐतरेय ब्राह्मण (८:२३) में वसिष्ठ सात्यहव्य ने उसे देव- क्षेत्र कहा है । काश्मीर का उल्लेख वीर पुरुषदत्त के नागार्जुनी कोण्डा लेख में आता है । पाणिनि ने उसका उल्लेख (४.२:१३३) किया है । पतंजलि ने (३:२:२ पृष्ठ १८८, १८९) तथा (१:१:६ पृष्ठ २७६) महाभारत और वृहत्संहिता में इसका देश रूप में उल्लेख किया है (१४:२९) । रामायण में काश्मीर आनंद रामायण में काश्मीर का वर्णन मिलता है । आनंद रामायण के याग कांड सर्ग ३:३२:३४ 'श्लोकों' में काश्मीर का उल्लेख आया है । अश्वमेध यज्ञ का आयोजन भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने किया था । यज्ञ का अश्व छोड़ा गया । वीर शत्रुघ्न, मंत्री, सामंत, सेना सहित अश्व की रक्षा के लिये साथ भेजे गये थे । शूरसेन, पांचाल, कुरुक्षेत्र, कुरु-जांगल, देश होते हुए अश्व ने काश्मीर