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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

[Page Header] प्रथम तरङ्ग ३५

[Left Column] काश्मीरात्तु समारभ्य कामरूपाच्च पश्चिमे । भोटान्तदेशो देवेशि मानसेशाच्च दक्षिणे ॥ श्लोक ३० पृष्ठ ७ औपधा ( औरसा ? ) श्चानि भद्राश्च किरातानां च जातयः । तोमरा हंसमार्गाश्च काश्मीरास्तंगणास्तथा ॥ मार्कण्डेय, वायु तथा ब्रह्माण्ड पुराणों में 'काश्मी- रास्तंगणांस्तथा' उल्लेख आया है । मार्कण्डेय पुराण में एक स्थान पर सौराष्ट्र के साथ 'काश्मीराश्च सुराष्ट्राश्च' वर्णन मिलता है । यहाँ भोटांत देश के संबन्ध में कहा गया है कि वह काश्मीर से आरम्भ होकर कामरूप के पश्चिम तक फैला था । उसके पश्चिम में मानसरोवर, पूर्व में काश्मीर अर्थात् उत्तर में कामरूप तथा मानस में है । वर्तमान भूटान पूर्वकालीन भोट्ट देश का एक खंड मात्र है । पुराणो से प्रकट होता है । प्राचीन काल में भोट शब्द तिब्बत निवासियों के लिये प्रयुक्त होता था । भूटान से लेकर काश्मीर अर्थात् हिमालय के उत्तर का भूखंड तिब्बत का भाग रहा है । मानसेश का अर्थ शिव का निवास स्थान अर्थात् मानसरोवर है । विष्णु पुराण (अंश ४:१९) में वर्णन है । चन्द्रभागा और काश्मीर आदि देशो पर व्रात्य, म्लेच्छ, शूद्रादि राजागण राज्य का भोग करेंगे । , काश्मीर के प्राचीन गौरव पर विचार करने लगा । उसे यादकर दुःख और उमड़ते हुए मन के अतिरिक्त और कुछ मुझे नहीं मिला । शक्तिसंगम तंत्र ३:८:१२-१४ में कूर्मप्रस्थ का वर्णन किया गया है । कूर्मप्रस्थं महेशानि कथ्यते श्रृणु साम्प्रतम् ।।१२।। गोकर्णं दक्षभागे कामाख्या पूर्वगोचरः । उत्तरे मानरेश. स्यात् पश्चिमे शारदा भवेत् ।।१३ शारदा शब्द के विषय में कह चुका हूँ । काश्मीर

[Right Column] के लिये अनेक ग्रंथो तथा स्थानो पर शारदा शब्द प्रयोग किया गया है । यह बात सिद्ध होती है ! कूर्मप्रस्थ की सीमा के सन्दर्भ में कहा गया है । कूर्मप्रस्थ के उत्तर में (मानेश मानसरोवर), दक्षिण में गोकर्ण (नेपाल), पूर्व में कामाख्या (कामरूप), पश्चिम में शारदा (काश्मीर) है । मैने गोकर्ण महादेव का मन्दिर नेपाल में देखा है । उसका वर्णन अपनी पुस्तक 'जाग्रत् नेपाल' में किया है । देवस्थान मुझे बहुत सुन्दर, दिव्य तथा जाग्रत् प्रतीत हुआ ।. 'परेण हिमवन्त' उत्तरकुरु को कहा गया है । श्री जिमर ने वैदिक इंडेक्स १:८४ में काश्मीर को उत्तरकुरु कहा है । पाली साहित्य में उत्तरकुरु का स्थान सुमेरु के उत्तर बताया गया है । काश्मीर को को उत्तरकुरु के दक्षिण दिखाया गया है । उत्तर- कुरु को समुद्र से आवृत बताया गया है । ऐतरेय ब्राह्मण (८:१४:४) में उत्तरकुरु हिमालय के पार बताया गया है । वाल्मीकीय रामायण (४:५३:५६) में उत्तर में समुद्र का होना कहा गया है । ऐतरेय ब्राह्मण (८:२३) में वसिष्ठ सात्यहव्य ने उसे देव- क्षेत्र कहा है । काश्मीर का उल्लेख वीर पुरुषदत्त के नागार्जुनी कोण्डा लेख में आता है । पाणिनि ने उसका उल्लेख (४.२:१३३) किया है । पतंजलि ने (३:२:२ पृष्ठ १८८, १८९) तथा (१:१:६ पृष्ठ २७६) महाभारत और वृहत्संहिता में इसका देश रूप में उल्लेख किया है (१४:२९) । रामायण में काश्मीर आनंद रामायण में काश्मीर का वर्णन मिलता है । आनंद रामायण के याग कांड सर्ग ३:३२:३४ 'श्लोकों' में काश्मीर का उल्लेख आया है । अश्वमेध यज्ञ का आयोजन भगवान् श्री रामचन्द्रजी ने किया था । यज्ञ का अश्व छोड़ा गया । वीर शत्रुघ्न, मंत्री, सामंत, सेना सहित अश्व की रक्षा के लिये साथ भेजे गये थे । शूरसेन, पांचाल, कुरुक्षेत्र, कुरु-जांगल, देश होते हुए अश्व ने काश्मीर

३८ राजतरङ्गिणी में प्रवेश किया। तत्पश्चात् भिल्ल देश, गौड़ देश, शुकदेश, यवनदेश, ताम्रदेश होता अश्व करतोया तट पर पहुँचा। वहाँ से चलता ज्वालामुखी के पर्वतीय क्षेत्रों में अश्व ने प्रवेश किया ! आनंद रामायण ने काश्मीर तथा उसके चारों ओर के देशों का वर्णन किया है। यह भौगोलिक वर्णन अंशतः ठीक है। काश्मीर के सीमावर्ती देशो यथा, गांधार, कांबोज, शिवि आदि देशो का स्पष्ट उल्लेख नही किया गया है। मालूम होता है कि आनंद रामायण के लेखक के समय में उन देशों की गणना यवन किंवा शक देश में होने लगी थी। भगवान् श्रीरामचन्द्र जी ने उत्तरी दिशा की तीर्थ यात्रा की थी। उसका वर्णन यात्रा कांड, आनंद रामायण (सर्ग ९।१-३१) में किया गया है। उसमे उनका ज्वालामुखी, देवप्रयाग, अलकनंदा के तट से होते हुए, श्रीबदरी आश्रम पहुँचना दिखाया गया है। श्रीबदरी आश्रम के पश्चात् श्रीराम केदारेश्वर गये। वहां से हिमाद्रि पर गये। यहाँ से महापथ होते हुए मानसरोवर की यात्रा की। मानसरोवर से बिंदु सरोवर गये। वहाँ से हिमालय होते हुए मेरु पर्वत गये। तत्पश्चात् कैलास पर गये। वहाँ से भागीरथी के तट से होते हुए हरिद्वार आए। हरिद्वार से कुरुक्षेत्र होते हुए इंद्रप्रस्थ पहुँचे। इंद्रप्रस्थ (दिल्ली) से मधुवन (मथुरा), वृन्दावन, गोकुल तथा गोवर्धन होते हुए अवंतिका अर्थात् उज्जैन गये। मानसरोवर के पश्चात् देव, गंधर्व, किन्नर जातियों का उल्लेख आता है। प्रतीत होता है। भगवान रामचन्द्र काश्मीर के ऊपर अर्थात् उत्तरीय सीमा स्पर्श करते हुए, मेरु तक पहुंचे थे। भगवान् श्रीराम वहाँ से कैलास गये। इससे स्पष्ट होता है। उन्होंने पश्चिम की तीर्थ यात्रा यथा जालंधर, मूलस्थान, गांधार, कांबोज अथवा शिवि देश की नहीं की। मेरु के दक्षिण काश्मीर का स्थान निर्विवाद रूप से सभी प्राचीन ग्रन्थों ने स्वीकार किया है। वाल्मीकीय रामायण में काश्मीर. का नाम मुझे कही पर मिल नही सका। संभव है। अपने दृष्टिदोष के कारण उसे न देख सका हूँ। परन्तु मै समझता हूँ कि काश्मीर का स्पष्ट रूप से उल्लेख रामायण में नहीं है। योग वासिष्ठ रामायण मे काश्मीर का सबसे अधिक ऐतिहासिक और प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन किया गया है। काश्मीर इतिहास पर उससे विशेष प्रकाश पड़ता है। उस स्थान का वर्णन श्लोक २६ टिप्पणी में किया गया है। राज तरंगिणी में श्रीराम के काश्मीर आने की बात तथा उसका क्या प्रमाण है, आदि पर यथास्थान प्रकाश डाला गया है। एक स्थान पर उल्लेख मिलता है। राम ने काश्मीर में एक मंदिर का निर्माण करवाया था। महाभारत में काश्मीर महाभारत सभा पर्व (२७:१७) और भीष्म पर्व (९:५३-६७) में उल्लेख मिलता है। काश्मीर भारतीय जनपद था। अर्जुन ने इसे दिग्विजय के समय जीता था। सभा पर्व (३.४०१२:५२) तथा वन पर्व (५१.२६) के अनुसार काश्मीर निवासी महाराज युधिष्ठिर के लिये भेंट लाये थे। द्रोण पर्व (११:१६ तथा ७०:११) में उल्लेख आता है। काश्मीर को भगवान् श्रीकृष्ण तथा परशुराम ने विजय किया था। अर्जुन ने अपने दिग्विजय के समय काश्मीर को जीता था। तत. काश्मीँरकान् वीरान् क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः । व्यजयल्लोहितं चैव मण्डलैर्दशभिः सह ॥ —सभापर्व २७:१७ तिल्लारा मर्मराश्च मधुमत्तः सुकन्दरूः । काश्मीराः सिन्धुसौवीरा गान्धारादर्शकास्तथा ॥ —भीष्मपर्व ९:५३-६७

प्रथम तरङ्ग ३६ द्रविडाः सिंहलाश्चैव राजा काश्मीरकस्तथा । कुन्तिभोजो महातेजाः पार्थिवो गौरवाहनः ॥ —सभापर्व : ३४:१२ काश्मीराश्च कुमाराश्च घोरका हंसकायनाः । शिवि त्रिगर्त यौधेया राजन्या मद्र केकयाः ॥ —सभापर्व : ५२:१४ केकयान् मालवांश्चैव तथा काश्मीरकानपि । अद्राक्षमहमाहूतान् यज्ञे ते परिवेषकान् ॥ —म० :-वनपर्व ५१.२६ आवन्त्यान् दाक्षिणात्यांश्च पर्वतीयान् दशेरकान् । काश्मीरकानौरसिकान् पिशाचांश्च समुद्रगलान् ॥ —द्रोणपर्व ११:१६ भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजोत्तमाः । ततः काश्मीरदरदान् कुन्तिशुद्रकमालवान् ॥ —द्रोणपर्व: ७०:११ काश्मीर मंडल के विशेष महत्त्व का उल्लेख महाभारत में मिलता है । काश्मीर मडल में उत्तर के ऋषियो यथा नहुष, यंयाति, अग्नि तथा कश्यप का परस्पर विचार विनियम हुआ था । काश्मीरमण्डलं चैतत् सर्वपुण्यमरिंदम ॥ महर्षिभिश्चाप्युषितं पश्येदं भ्रातृभिः सह ॥ १० ॥ यत्रोत्तराणां सर्वेषामृषीणां नाहुषस्य च । अग्नेश्चैवात्र संवादः काश्यपस्य तु भारत ॥११॥ —वन पर्व : १३० काश्मीर मंडल के चंद्रभागा तथा वितस्ता नदियो में सात दिन नित्य स्नान करने पर कहा गया है, मनुष्य निर्मल हो जाता है । सप्ताहं चन्द्रभागां वै वितस्ता भूमिमालिनीम् । विगाह्य वै निराहारो निर्मलो मुनिवद् भवेत् ॥७॥ काश्मीरमण्डले नद्यो या. पतन्ति महानदम् । ता नदी: सिन्धुमासाद्य शीलवान् स्वर्गमाप्नुयात्॥९॥ अनुशासन पर्व : २५:७०९ उत्तर दिशा में कश्यप का निवास बताया गया है । काश्मीर उत्तर दिशा में है : अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपेश्च महानृषिः । गौतमश्च भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः ॥३८॥ ऋषीकतनयश्चोग्रो जमदग्निः प्रतापवान् । धनेश्वरस्य गुरवः सप्तैते उत्तराश्रितः ॥ —अनुशासन पर्व : १५०:३८-३९ कश्यप की पत्नियां दक्ष की कन्याएं अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा, प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि, कद्रू थी । ते भार्ये कश्यपस्यास्तां कद्रूश्च विनता च ह । प्रादात् ताभ्यां वरं प्रीतः प्रजापतिसमः पतिः ॥ —आदि पर्व १६:६ दितिर्दितिश्चैदनुः काला दनायुः सिंहिका तथा । क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनि ॥१३॥ कद्रूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत । एतासां वीर्यसम्पन्नं पुत्रपौत्रमनन्तकम् ॥१३॥ —आदि पर्व : ६५:१२ सुर, असुर दोनों के पूर्वपुरुष कश्यप हैं । मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः । जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः ॥ —आदि पर्व : ६६:३४ ज्येष्ठ पत्नी अदिति से १२ जनों का जन्म हुआ था : त्रयोदशानां पत्नीनां या तु दाक्षायणी वरा । मारीचः कश्यपस्तस्यामादित्यान् समजीजनत् ॥ — आदि पर्व : ७५:१० कश्यप की पत्नी अदिति के गर्भ से भगवान् वामन का अवतार हुआ था । कश्यपस्यात्मजः श्रीमानदित्या गर्भधारितः । पूर्णे वर्षसहस्रे तु प्रसूता गर्भमुत्तमम् ॥

४० | राजतरंगिणी


बौद्धसाहित्य

बौद्ध ग्रंथों में काश्मीर का बहुत वर्णन मिलता है। दिव्यावदान शतक, बोधि सत्त्वावदान, कल्पलता, में उल्लेख मिलता है। काश्मीर के निवासी नाग जाति के थे। काश्मीर राज्य के विषय में चीनी यात्रियो ने लिखा है 'राज्य ७००० ली आवर्त्त में फैला है। चारो घोर ऊंची पर्वतमालाओ से परिवेष्टित है। राजधानी वितस्ता के पश्चिम तट पर स्थित है। देश की भूमि अत्यंत उर्वरा है। अन्न, फल, तथा पुष्प अत्यधिक उत्पन्न होते हैं। वनस्पतियां तथा ओषधियां यथेष्ट रूप से मिलती हैं। जलवायु ठंडी है। तथा रुक्ष है। मनुष्य अत्यंत रूपवान होते हैं। उनका रंग साफ है। वे विद्यानुरागी हैं। उनमें अश्रमिक (बौद्ध धर्म नहीं मानने वाले) तथा बौद्ध धर्मानुयायी दोनों है। स्तूप तथा संघाराम देश में मिलते हैं।' पर्यटक युवान च्वांग लिखता है "काश्मीर पूर्व काल में गांधार देश में सम्मिलित था। तृतीय बुद्ध परिषद् के पश्चात् मोग्गलि पुत्र तिस्स काश्मीर में धर्म प्रचारार्थ भेजे गये थे। अशोक के समय काश्मीर मौर्य साम्राज्य के अंतर्गत था। गंधार जातक में काश्मीर तथा गंधार का उल्लेख मिलता है।" बौद्धग्रंथों में १६ जनपदों में काश्मीर और गंधार को सम्मिलित किया है। इनका विवरण पुक्कुसाति तथा महारुपिन की कथाओं से प्राप्त होता है। जातकों से पता लगता है। बुद्ध काल में व्यापारीगण विदेश से काश्मीर और गंधार तक व्यापार करते थे। मिलिन्द प्रश्न (मिलिन्दपन्हो) में, 'कासिकोसालेऽपि कश्मीरे गंधारे ऽपि'-का उल्लेख मिलता है। काश्मीर का गंधार के साथ उल्लेख किया गया है। युवान- च्वांग ने लिखा है-'कभी गंधार के अंतर्गत काश्मीर था' कल्हण की राजतरंगिणी, महाभारत तथा किसी सूत्र से पता नहीं चलता कि कभी किसी ऐतिहासिक युग में काश्मीर गंधार के अंतर्गत था। राजतरंगिणी काल से लेकर कोटा रानी के लंबे चार हजार वर्षों में कही संकेत नहीं मिलता कि काश्मीर गांधार में सम्मिलित था। भौगोलिक दृष्टि से काश्मीर तथा गांधार सीमांत देश थे। अतएव काशी, कोशल के समान बौद्ध साहित्य में गंधार काश्मीर का नाम से लिया गया है। महावंश में उल्लेख आता है। स्थविर धौतिक राजा मिलिंद [ मिनाण्डर ] के समय काश्मीर गांधार में बौद्ध धर्म प्रचारार्थ आये थे। भूरिदत्त जातक से मालूम होता है। कृमियों, फतिंगों, सर्पों, मेढ़कों, कीड़ों, मक्खियों आदि की हत्या कम्बोज जनपद के लोग करते थे। इन हत्याओं के कारण मनुष्य विशुद्ध हो जाता था। यूआन च्वांग ने [सातवी शताब्दी] काश्मीर राज्य के दक्षिण स्थित राजपुरो अर्थात् वर्तमान राजोरी के लिये लिखा है-यहाँ के लोग कीड़ों मकोड़ों की हत्या करते थे। मुझे ऋग्वेद में काश्मीरका उल्लेख नहीं मिला। 'वैदिक कथा।' पुस्तक लिखते समय मैंने वैदिक साहित्य को अध्ययन किया उस समय इस पर विशेष ध्यान रखा कि काश्मीर का वर्णन वेद में है या नहीं। एक दिन श्री डा० ज्वाला प्रसाद सिंघल अपनी नव प्रकाशित पुस्तक 'स्फिनिक्स स्पीक्स' लेकर मेरे निवास स्थान १५ कैनिगलेन नई दिल्ली में आये। उन्होंने वेद में काश्मीर के उल्लेख की चर्चा उठायी। मुझे कुछ आश्चर्य हुआ। निसन्देह ऋग् वेद में 'वितस्ता' नदी का नाम है। वितस्ता काश्मीर से निकल कर पंजाब में बहती है। वैदिक पुरुषों को वितस्ता नदी का ज्ञान था। इससे अनुमान लगाया गया है कि काश्मीर मण्डल का ज्ञान वैदिक पुरुषों को था। इस बात को प्रमा- णित करने के लिये डा० सिंघल ने अपनी पुस्तक में तर्क उपस्थित किया है। मैंने पुस्तक पढ़ने के लिये समय मांगा। इसी बीच उनके पुस्तक के विषय की चर्चा समाचार पत्रो में

प्रथम तरंग ४१

मे छपी। उसमें उन्होंने एक नवीन सिद्धान्त का मत को यहाँ पर संक्षेप में उद्धृत कर देना मैं उचित प्रतिपादन किया है। कुछ समय पश्चात् वे पुन. समझता हूँ। आये। इस प्रयोग मे उन्होंने स्वीकार किया कि 'यह कहा जाता है कि काश्मीर की भूमि एक श्री ए. सी. दास के 'ऋग्वेदिक इण्डिया' पुस्तक से झील थी। वह १६००० वर्ग मील क्षेत्र में फैली वे प्रभावित हुए हैं। उनका सिद्धान्त उक्त पुस्तक थी। यह २००० फीट गहरी थी। चारों ओर से मिलता है। पर्वतो से घिरी थी। तिब्बत उत्तर मे, कैलास पूर्व उनके काश्मीर विषयक सिद्धान्त को मैं यहाँ संक्षेप मे, और सप्तसिन्धु का भूमि खण्ड दक्षिण तथा में उद्धृत कर देना उचित समझता हूँ। उनके दक्षिण पश्चिम में था। हमने देखा है कि जिन्दा- सिद्धान्त को स्वीकार करने के पूर्व काश्मीर के भूग- वेस्ता में इस चतुष्कोणीय भूमि का नाम 'वरण' अर्थात् र्भीय ज्ञान का विशेष अध्ययन आवश्यक है। 'वरुण' का देश कहा गया है। उसका उल्लेख 'हफ्त काश्मीर मे गुहा निवासियो के स्थानो पर खनन हिग्द' अर्थात् 'सप्त सिन्ध' के पूर्व किया गया है। कार्य केन्द्रीय सरकार द्वारा हुआ है। उनसे काश्मीर 'नागा जाति' चीनी तुर्किस्तान तथा उसके आस पास उपत्यका के भूगर्भीय रचना पर प्रकाश पडता है। रहती थी। उनके देश के साथ 'गरुड़' का देश मिला मैंने इन गुफाओं तथा उनमे प्राप्त सामग्रियों को था। दोनो जातियों मे सघर्ष होता रहता था। अत- सन् १९६२ तथा सन् १९६६ में काश्मीर जाकर एव नागा जाति ने काश्मीर में गरुड जाति के भय देखा तथा अध्ययन किया है। के कारण शरण लिया।

भूगर्भीय स्तर के अध्ययन से इतना अवश्य स्पष्ट       'कहा जाता है कि काश्मीर में एक भेद पर्वत

हो जाता है कि काश्मीर उपत्यका जल से कभी पूर्ण था। उस पर देवी सरस्वती अपने वाहन मोर पर थी। पानी कभी निकल गया। सूखी भूमि हो गयी। रहती थी। यह पर्वत भी तोडा गया और सरस्वती डा० सिंघल द्वारा प्रतिपादित अन्य सिद्धान्तों को, तथा पार्वती ने सरिताओं का रूप धारण कर लिया। जब तक कुछ और अनुसन्धान न हो जाय और प्रमाण न मिल जाय, स्वीकार करने मे कठिनता होगी। 'ऋग्वेद' इस कथानक को अर्थयुक्त रूप से वेद की जिन ऋचाओं का उल्लेख डा० सिंघल ने उपस्थित करता है। 'इन्द्र' का प्रथम कार्य यह था किया है ओर जो अर्थ उन्होंने लगाने का प्रयास किया कि उसने अहिदस्यु 'वृत्र' तथा उसकी माता संहार है वे अत्यन्त विवादास्पद हैं। किया। जिन्होंने मेघ से गिरते जल को नागाओ द्वारा रचित गुहा में बन्द कर रखा था। इन्द्र ने भेद का 'त्रित' के सम्बन्ध में मैंने अपनी पुस्तक 'वैदिक भी निर्धन कर वध कर दिया। दस्युओं का जो वहाँ कथा' ( २७-३३) में विस्तृत प्रकाश डाला है। पर रहते थे उनका संहार किया। उसने वज्र प्रहार मैं डा० सिंघल की विवृति का समर्थन करने में अस- द्वारा पर्वत तोड डाला। वह जल बह कर 'सप्तसिन्ध' मर्थ हूँ। यहाँ स्थानाभाव से विशेष विवृति करना की सात नदियाँ हुई। और समुद्र में जाकर मिल गयी। अप्रासंगिक होगा। 'भेद' का अर्थ जो डा० सिंघल ने 'त्रित' को वाराह भी कहते हैं। अर्थात् बारह- लगाया है वह काश्मीरी परम्परा तथा इतिहास से मूला के समीप वह मारा गया था। सरस्वती उनमे मेल नही खाता। 'गंगोद्भेद' तीर्थ तथा 'भेदादेवी' से मुख्य नदी थी। जो मुक्त की गयी थी। दस्यु लोग 'भेद पर्वत' के प्रसंग मे श्लोक संख्या ३४ की टिप्पणी 'अनासो' अर्थात् नासिका रहित थे। अर्थात् वे चिपटी तथा परिशिष्ट द्रष्टव्य है। तथापि डा० सिंघल के नाक वाले थे। ऋग्वेद में यह भी वर्णन आता है कि

४२ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ] अनार्य शिव, अजस, यक्ष, आदि ने यमुना के तटपर भेद के नेतृत्व में युद्ध किया था जहाँ इन्द्र ने उन्हें पराजित किया था। 'ऋग्वेद' उन अनार्यों का भी वर्णन करता है जो शिश्नदेव की पूजा करते थे। उन्हें भी इन्द्र ने पराजित किया था। 'जिस समय काश्मीर में 'अहिवंशीय दस्यु' लोग जिनका स्वामी वृत्र रहता था, उन दिनो आर्य हिन्दूकुश तथा पामीर के गिरिपाद में रहते थे। हिमालय के उत्तर में तेथिस सागर था। वह क्रमशः सिकुड़ता गया। और पृथ्वी के शियर की गति के कारण चीन में तथा तिब्बत में भूमि का स्तर ऊंचा कर दिया। चीन में भूमि सूख गयी और तिब्बत अधित्यका अर्थात् प्लेटो बन गया। इसलिए तिब्बत को त्रिविष्टप् अर्थात् तीन बार परत किया हुआ कहा जाता है। 'भूगर्भीय गति का प्रभाव काश्मीर पर भी पड़ा जो तिब्बत की पश्चिम सीमा से सम्बन्धित है। पर्वत टूट गया और काश्मीर का जल बाहर निकल गया। नाग लोग प्राकृतिक उथल पुथल में विनष्ट हो गये। इस प्रकार जल निकल जानेपर गिरिपाद से आर्य लोग उतर कर आये और काश्मीर उपत्यका में आबाद हो गये। उस समय नई नदियां सिन्धु में आकर मिली। गान्धार सप्तसिन्धु का एक भाग बन गया। 'वृत्र काश्मीर में मारा गया था। इसका प्रमाण 'भेद' तथा वाराह के वर्णन से प्रकट होता है, जिनका वर्णन काश्मीर के साहित्य में मिलता है। भेद के पराजय की बात यमुना तट पर कही गयी है। काश्मीर के इतिहास में यह कहा गया है कि सरस्वती देवी भेद पर खड़ी थी। यह बात निर्विवाद है कि सरस्वती तथा यमुना का उद्गम एक ही शैल से होता है। भेद मालूम होता है कि उन लोगों का राजा था जो भेद पर्वत पर रहते थे। उनका विनाश शायद काश्मीर उपत्यका का जल निकल जाने के कारण हुआ अथवा राजा सुदास द्वारा इन्द्र

[दायाँ स्तम्भ] की सहायता से मारे गये थे। 'इन्द्रको वहीं देवरूप नही बल्कि प्रकृति की प्रभूत शक्ति मानना चाहिए। एक 'त्रित' देवता का वर्णन वेदों में मिलता है। उसने वृत्र का वध किया था। वृत्र यहाँ वराह कहा गया है। वैदिक ऋचाओ से यह बात प्रमाणित होती है कि वराह वृत्र का निवास बारहमूला में था। 'त्रित' ने वृत्र दैत्य को मारा था जिन्दावेस्ता के प्रथम अध्याय वेन्दीयाद के १८वें पद में आता है। यहाँ 'त्रित' को 'श्रेतिन' कहा गया है। 'त्रित' प्राकृतिक शक्ति का प्रतीक माना गया है। उसे 'त्वष्टार' का पुत्र माना गया है। त्वष्टार को इन्द्र का पिता माना गया है। त्वष्टार को इन्द्रके वज्र तथा देवों के अन्य अस्त्रों का निर्माता माना गया है। 'वरुण, त्रित, इन्द्र के साथ कहा गया है कि वृत्रको मरुत् ने भी मारा था। भूमि की गति के कारण जब काश्मीर का जल बारहमूला के पास से बह निकला होगा तो सम्भव है कि, आन्धी, पानी; भूचाल तथा वज्रपात हुआ हो। मरुत् से वृत्र वध को सम्बन्धित करने से यह प्रकट होता है कि प्राकृतिक उथल-पुथल के कारण काश्मीर का जल बह गया और आर्यों को काश्मीर तथा वहाँ रहने वाली जातियों का ज्ञान था। 'मालूम होता है किऋग्वैदिक आर्यों ने काश्मीर भूखण्ड का कोई नाम नही रखा था। उनके लिए यह 'दस्युओं' का देश था। वे अपने स्थानो से आकर आर्यों को परेशान करते थे। पौराणिक काल में इन्द्र और वृत्र के संघर्ष की बात कथानक रूप में चलाई गयी। आर्यों ने कालान्तर में शिवपूजा स्वीकार कर ली। उस समय 'सती सर' तथा उसमे जल निकलने की घटना को गाथा का रूप दे दिया गया। नागलोग शिव के भक्त थे अतएव 'जलोद्भव' नाम के एक दैत्य की कल्पना कर ली गयी। क्योंकि शिव के भक्त नागाओं को आर्य जिन्होंने शिव की उपासना स्वी-

प्रथम तरंग ४३ कश्यपेन तदन्तःस्थं घातयित्वा जलोद्भवम् । निर्ममे तत्सरो भूमौ कश्मोरा इति मण्डलम् ॥ २७ ॥ २७ असुर जलोद्भव का वध किया गया। सतीसर के उस भूमि स्थान पर काश्मीर मण्डल की स्थापना हुई। कार कर ली थी दैव नाम नही दे सकते थे। काश्यप जो मानव जाति के आदिपुरुष माने जाते है उन्हें लाकर बारहकूला के समीप पर्वत विदारण का आख्यान रच लिया गया। सतीसर इस प्रकार 'काश्यप सर' हो गया। और कालान्तर में काश्मीर हो गया। 'प्राचीन काल के पुरातत्त्व सम्बन्धी प्रमाणों पर अपने सिद्धान्त की पुष्टि करता लेखक कहता है : 'इन्द्रने दस्युओं को काश्मीर उपत्यका में नष्ट किया। इन्द्र ने उनके ९९ दुर्गों को नष्ट किया। काश्मीर के पूंछ क्षेत्र के सोहन नदी में कहा जाता है कि इन पाषण युगीय लोगों के पाषाण यान्त्रिक उपकरण मिले हैं। उनका समय ६,००,००० वर्ष पूर्व माना जाता है। इस प्रकार आदिकालीन लोग काश्मीर उपत्यका में रहते थे इसका प्रमाण ५वें मण्डल के सूक्त ४५ ऋचा ६ पर आधारित किया है। उसमें 'विशिशिप्र' शब्द को वृत्र माना गया है। वहीं कहा गया है कि गऊ की शाला खोदी गयी है। और उससे जल बाहर निकल गया। यहाँ इन्द्र के स्थान पर माता अथवा प्रकृति के लिए कहा गया है कि प्रकृति के कारण काश्मीर उपत्यका का जल वह गया और भूमि निकल आयी। 'विशिशिप्र' शब्द महत्त्व- पूर्ण है क्योकि दस्युओं के प्रारम्भिक पाषाण युग को उपस्थित करता है। 'यह बात इससे और प्रमाणित होती है कि वृत्र तथा उसके दस्यु साथियों के लिए 'इलीविश' शब्द का प्रयोग मण्डल १ सूक्त ३३ ऋचा १२ में किया गया है। जिसका अर्थ गुहा में रहने वाले लोग होते हैं। इससे प्रकट होता है कि दस्यु लोग पाषाण युगीय गुफा में रहने वाले थे। इन बातों से प्रकट होता है कि ऋग्वेदोय आर्य उनके सम- कालीन थे।' लेखक ने श्री स्टूअर्ट पिगोट के 'प्रिहिस्टारिक इण्डिया' का उल्लेख करते हुए कहा है : 'सोअन सभ्यता सोहन नदी का उपत्यका सिन्धु, पूंछ, झेलम के समीप तथा साल्ट रेंज तक विस्तृत थी। पाठभेद : 'कश्मीर' का 'काश्मीरा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७ (१) जलोद्भव : नीलमत पुराण जलोद्भव गाथा का वर्णन करता है। जलोद्भव का अर्थ है, जल से उद्भव अर्थात् जन्म लेनेवाला। काश्मीर में अत्यधिक ठंड पड़ती थी। कुछ लोगों का अनुमान है। जलोद्भव शब्द का अर्थ "तैरता हुआ" हिमखंड है। नीलमत पुराण में निम्नलिखित जलोद्भवोपाख्यान का वर्णन दिया गया है : कृपया सः शिशुनागैरंगले तस्मिन्विवर्धितः । यस्मादयं जले जातस्तस्मादेष जलोद्भवः ॥ —77।११८, ११९ आराध्य तपसा लेभे वरं देवात्पिता महान् । जलेऽमरत्वं मायाञ्च विक्रमं चातुलं तथा ॥ 78।११९, १२० लब्धवायस्तु दैत्येन्द्रो भक्षयामास मानवान् । समीपे सरसस्तस्य नानादेशेव्यवस्थितान् ॥ 79।१२०, १२१ दर्भाभिसार-गान्धार-जुहुण्डर-शकान् रसान् । तंगणान्माण्डवान् मद्रा नन्तर्गिरिबहिर्गिरि ॥ 80।१२१, १२२

४४ राजतरंगिणी

ते हन्यमानाः पांक्तं देशान् संप्रायुवन् भयात् । शून्येषु तेषु देशेषु विससार स निर्भयः ॥ ४।१३२, १३३ भवदन्वितितं सर्वं यथारूपं मया विभो । पालितः संप्रहसुतो दैत्यो नाम्ना जलोद्भवः ॥ १३०।१७५

जलोद्भव असुर का वर्णन वामनपुराण (८०।१८-३३) में दिया गया है। ब्रह्मा के वर- लाभानन्तर गर्वतापहारी असुर जलोद्भव का वध शिव तथा विष्णु के द्वारा हुआ था। यह कथा नीलमत पुराण में वर्णित कथा से मिलती है । शक्र सरोवर पर पौलोमी क साथ क्रीडारत थे । परमदुर्जय संग्रह नामा दैत्येन्द्र वहीं रहता था । शची को देखते ही काममोहित दैत्य का रेतस् सलिलाशय में पतित हो गया । कामोन्मत्त दैत्य ने शची के अपहरण की लालसा की । शक्र तथा संग्रह में तुमुल युद्ध प्रारम्भ हो गया । इन्द्र का युद्ध एक वर्ष तक चलता रहा । सङ्ग्रह युद्ध में हत हो गया ।

उस दुरात्मा के रेतस् से जलोद्भव शिशु उत्पन्न हुआ । जलोद्भव का नागो ने कृपापूर्वक विवर्धन किया । जल से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम जलोद्भव पड़ा ।

जलोद्भव देश का वर्णन महाभारत में आया है । हिमालय समीपस्थ इस देश का होना मिलता है । इस देश पर भीमसेन ने विजय प्राप्त की थी । मैं समझता हूँ कि वह देश काश्मीर है । (सभा पर्व : ३० । ४)

पितामह ब्रह्मा की तपस्या तथा आराधना द्वारा जलोद्भवने तीन वर प्राप्त कर लिये थे । जल में अमरत्व, अतुलनीय विक्रम तथा मायाशक्ति की प्राप्ति । उस दैत्येन्द्र ने समीपवर्ती दार्वाभिसार, गाधार, जहूंडर, शक, खस, तगण, माडव, मद्र, अंतर्गिरि और बहिर्गिरि के निवासियों का भक्षण आरम्भ कर दिया । काश्मीर के समीपवर्ती सीमांत देशों को शून करने लगा । उस पापी के कारण देश जनशून्य हो गया । वह निर्भय हो गया (नीलमत पुराण श्लोक 76-81 ११८-१२२)

वाग्भट वाग्मीरी में कहते हैं : 'जलोद्भव के कारण काश्मीर जनशून्य हो गया था। एक समय मरीचि के पुत्र काश्यप ने जिन्हें कुछ लोग ब्रह्मा का पौत्र कहते हैं, काश्मीर की यात्रा की । कुछ काल तक पवित्र सुमेरु पर्वत पर निवास करने के पश्चात् काश्मीर भूमि की दुरावस्था को देखकर उनका ध्यान आकृष्ट हुआ । उन्होंने दुरावस्था का कारण पूछा । लोगों ने कहा 'जलदेव' 'सतीसर' में निवास करता है। वह हम लोगों को नष्ट करता रहा है।

'काश्यप का हृदय करुणापूर्ण हो गया। वह हरीपुर के समीप नौबंधन में निवास करने लगा । वहाँ उन्होंने एक सहस्र वर्ष तक घोर तपस्या की । महादेव प्रकट हुए। जलदेव को मारने की प्रार्थना स्वीकार की । महादेव ने विष्णु और ब्रह्मा को जलदेव को हटाने के लिये भेजा। विष्णु और जलदेव का छह सौ वर्षों तक संघर्ष होता रहा ।

'विष्णु ने देखा कि जलदेव जल तथा पंक में रहकर अपनी रक्षा करता है । उन्होंने बारामूला के समीप एक जलप्रणाली बनवायी । जल निकल गया। दैत्य दृष्टिगोचर होने लगा । वह खड्गकर मार डाला गया । प्रदेश आबाद हो गया । इस लिये काश्मीर को 'कश्यपसर' कहते हैं।'

रत्नाकर पुराण का अनुवादकर्ता लिखता है,- 'पहले वक्तों में चमनजार काश्मीर में देव और राक्षस वास किया करते थे । इनमे से एक देव जलोद्भव नामी था । वह बडा जालिम और सरकश था । बहुत अरसा तक उसकी लडाइयाँ तीन कारणों यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ रहीं । उसके फना होने के बाद मखलूक खुदा ने इस-

प्रथम तरंग ४५ मोनान का साँस लिया। आहिस्ता आहिस्ता इंसान इस सर जमीन में बसने लगे। लेकिन फिर भी काफी मुद्दत तक देवो और राक्षसों के हाथ तकलीफ उठाते रहे। इस दरमियान मे गरमियो में लोग हिन्दुस्तान से यहाँ आते। जरायत व खेती बाड़ी करते और सदियों के मौसम मे कुछ सर्दी की शिद्दत और कुछ देवों के खौफ से फिर अपने वतन को वापस लौट जाते। बिल आखीर रफ्त रफ्तः यह वला टल गई और लोगों ने मुस्तकिल तौर पर आबाद होकर हुकूमत के कवानोन और रस्म वो रवाज बना लिये।' तारीख कश्मीर हसन, पृष्ठ १०-११ स्कन्द पुराण में ७५ देशों तथा उनके ग्रामों की संख्या दी गई है। काश्मीर का नाम उन ७५ देशो की तालिका में ३२वाँ आता है। काश्मीर के ग्रामों की संख्या ६८००० दी गयी है। श्री स्टाइन ने अपने समय में काश्मीर के ग्रामो की गणना कर उनकी संख्या ६६०६३ दी है। अबुल फजल ने भी आइने अकबरी मे ग्रामसंख्या ६६१७१ दी है। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि पुराणों मे वर्णित काश्मीर संबन्धी बातें कपोलकल्पित नहीं है। २ कश्यप—कश्यप ऋषि का उल्लेख ऋग्वेद (९:११४:२) में मिलता है। सामवेद, (१.१, २.४, १०, १:४:२:२,) में प्रजापति रूप मे उनका वर्णन किया गया है। अथर्व वेद (१:१४.४, २:३३:७, ४:२०:७ ४.२९:३, ४:३७.२) तथा मैत्रायणी संहिता एवं वाजसनेय सहिता शाखा (३:६२) में उन्हे प्राचीन पुरुष कहा गया है। ऐतरेय ब्राह्मण (८:२१) तथा शतपथ ब्राह्मण (१३:७:१:५) के अनुसार उन्होने विश्व- कर्मन् भौवन राजा का अभिषेक किया था। बृहदा- रण्यक उपनिषद् (२:२:६), जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण (४:३:१) तथा ऐतरेय ब्राह्मण (७:२७) में जनमेजय के संदर्भ में उनका उल्लेख किया गया है। बृहद्देवता कश्यप का उल्लेख (३:५७, ५:१५३ १४५), (२:१५७ और ८'१८) मे आता है। कुछ विद्वान् कश्यप का समय ईसा पूर्व ५६९६ वर्ष अर्थात् आज से ७ हजार ८ सौ वर्ष पूर्व मानते हैं। किंतु किसी ठोस प्रमाण पर यह गणना आधारित नही हैं। कश्यप का उल्लेख ऋग्वेद में है। उनका ऋग्वेदिककालीन अथवा उसमे भी पूर्वकालिक होना अनिवार्य है। कश्यप नागाओं के आदि पुरुष है। नीलमत पुराण मे कश्यप तीर्थ यात्रा का वर्णन संग्रहपुत्र जलोद्भव दैत्य वध प्रसंग मे, (श्लोक २०९ से २२७) आता है। कल्हण ने नीलमत से यह प्रसग लिया है। नील नाग ने जलोद्भव के उत्पात का वर्णन निम्नलिखित रूप से नीलमत पुराण में किया है। सद्यो लब्ध्वा वरान् पापो ब्रह्मणोऽव्यक्तयोनितः । न मां गणयति दुष्टो न चाहं तस्य निग्रहे ॥ समर्थो वरदानेन त्रैलोक्याधिपतेः प्रभोः । —137।१८०, १८१ तेनेदं सकलं शून्यं मद्देशे कृतम् प्रभो। खादता नरमांसानि दुष्टेनाकृतबुद्धिना ॥ —138।१८१, १८२ दार्वाभिसारगांधारजालन्धरशकाः खशाः । संगणामाण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिरिः ॥ —139।१८२, १८३ एते वै मुख्यतस्तेन देशाः शून्याकृताः प्रभो। निग्रहे भगवन् तस्य कुरु बुद्धिं जगद्धिताम् ॥ —140।१८३ : १८४ एवमुक्त्वा सथेत्युक्त्वा स्नात्वा तीर्थेषु कृत्स्नतः। आजगाम सतां देशं विमलं तन्त्सरोत्तमम् ॥ —141।१८४, १८५ तत्र स्नात्वा जगामासौ ब्रह्मलोकं सदानतम्। पद्भ्यां च क्रमणं त्यक्त्वा स्वशक्त्यैव नरोत्तमः ॥ —142।१८६, १८९

६४ राजतरंगिणी नीलेन सहितः प्रायान्नागराजमहात्मना। तौ गत्वा ब्रह्मसदनं ववन्दतुररिन्दम॥ —143।१९० देवं कमलयोनिं च संगत्यासनमास्थितौ। वासुदेवेश्वरौ देवावनन्तं च महामतिम्॥ 144।१९१, १९२ तैस्तु संपूजितौ तत्र जलोद्भवविचेष्टितम्। कथयामासतुर्भो ततो देवः पितामहः॥ 145।१९४ संचीयमाने सरसस्तु तोये चकार मायां स जलोद्भवोऽद्यः। अथान्धकारं ससृजे समन्ता- दृष्ट्टयमसीद्भुवनं नृवीर॥ —170।२२२ : २२३ जलोद्भवासृजा मत्तस्तदा चक्रः सुदर्शनः। वभ्राम देशं शून्यं तं सं च जग्राह शंकरः॥ 188।२४२ ऋषयो देवता नागा गन्धर्वाप्सरसां गणाः। द्रष्टुं सर्वे समाजग्मुर्जलोद्भवसररथ॥ 197।२५९ जलोद्भव भयंकर क्रूरकर्मा हो गया था। प्रजा- पति कश्यप तीर्थयात्रा पर निकले थे। कश्यप से कनखल मे आकर नील नाग मिला। उनकी पूजा की। काश्मीर की तीर्थयात्रा निमित्त निवेदन किया। जलोद्भव के अत्याचार की करुण कथा सुनाई। सतीसर के विमल सरोवर की तीर्थयात्रा निमित्त कश्यप उद्यत हो गये। नीलमत पुराण मे निम्न- लिखित उल्लेख इस सम्बन्ध में आता है। कश्यप महर्षि ब्रह्मलोक में नील नाग के साथ गये। वहाँ से ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ सराबित नौबंधन तीर्थ की ओर प्रस्थान किये। उनका अनुकरण देवताओं ने किया। असुरो ने किया। वें अपने-अपने वाहनों के साथ चले। नौबंधन पहुंचे। केशव दृढ़तापूर्वक वहाँ स्थित हो गये। सुर और असुर दोनों की सेना नौबंधन पहुँची। इस महान् वाहिनी की तुमुल ध्वनि जलोद्भव दैत्य ने सुनी, व दहल गया। सुरक्षा निमित्त जल मे छिप गया। शत्रु दैत्य जल से बाहर नही निकल रहा था। उसे जल से बाहर निकलता नही देखकर मधुसूदन नौबंधन में प्रवेश किये। नौबंधन पहुँचकर (कासर नाग अथवा क्रमशसर के) तीनों शिखरों के मध्य मे शिव, दक्षिण हरि तथा उत्तर शिखर पर ब्रह्मा ने स्थान ग्रहण किया। नौबन्धनमथासाद्य केशवो वै व्यवस्थितः॥ देवानुयात्रनिनदं श्रुत्वा दैत्योऽपि दुर्मतिः। जले त्वव्यथ्यमानं भानं विदित्वा न विनिर्गतः॥ —162।२१३. २१४ अनिर्गतं तं च तदा विज्ञाय मधुसूदनः। नौबंध एवमुदितो विवेशाथ सुरैः सह॥ —163।२१५, नौबन्धशिखरे रुद्रो दक्षिणे शिखरे हरिः। उत्तरे शिखरे ब्रह्मा देषामनुसुरासुरः॥ —164।२१६ एवं ते विविशुः शैले ततो देवो जनार्दनः। अनन्तमाह धर्मात्मा वधार्थं दानवस्य तु॥ —165।२१७ जलोद्भव जल में था। विचलित नही हुआ। बिना जल निकले दैत्य दृष्टिगत नही हो सकता था। अतएव भगवान् अनन्त ने पर्वतराज को विदारित कर दिया। जल वेग से निकलने लगा। जल निकल जाने पर जल स्थित सभी भूत संज्ञाहीन हो गये। जलोद्भव ने अंधकार का सृजन किया। घोर अंधकार में नौबंधन आवृत हो गया। शंभु ने अपने दोनो करों में सूर्य तथा चन्द्रमा को लिया। अंधकार तिरोहित हो गया। विष्णु ने दैत्य को देखा। विष्णु और जलोद्भव का युद्ध आरम्भ हुआ। भीषण

प्रथम तरंग ४७ युद्ध के पश्चात् भगवान् के चक्र द्वारा जलोद्भव का मुंड छिन्न हो गया । नीलमत पुराण में वारहमूला के पास जल निकालने की तरफ संकेत किया गया है । नीलाम्बरः काञ्चनबद्धमौलिः संपूज्यमानस्त्रिदशैः समेतैः। विदारयामास स लाङ्गलेन हिमाचलं शैलवरं पृथिव्याम् ॥ —168।२२० विदारिते पर्वतराजराजे विनिर्ययौ तज्जलमाशुवेगात् । वेगेन शब्देन च सर्वभूतान् सन्त्रासयानं कुटिलैस्तरंगैः॥ २२१ हिमाचलाभैर्गगनम् स्पृशद्भिः सम्प्लावमानम् गिरिमस्तकानि ॥ —161।२२१, २२२ अस्मिन्वैवस्वते प्राप्ते राजन् मन्वन्तरे किल । मारीचाय ददौ दक्षः कश्यपाय त्रयोदश ॥ —46।६७-७० एतस्मिन्नेव काले तु कश्यपो भगवान् ऋषिः । तीर्थयात्राप्रसंगेन चचार सकलां महीं ॥ —81।१२३-१२४ तीर्थयात्रागतं श्रुत्वा कश्यपं पन्नगाधिपः । नीलो जगाम तं द्रष्टुं तीर्थे कनखले तथा ॥ —96।१३९ उपविष्टस्तदा नागो व्यज्ञापयत कश्यपम् । पितरं तपसां स्थानं यत्तच्छृणु नराधिप ॥ —99।१४२ उत्तीर्य च महाभागो विपाशां पापनाशिनीम् । दृष्टवान् सकलं देशं तदा शून्यं स कश्यपः ॥ —133।१७६ द्रष्टव्यैष कश्यपः प्रायाच्छ्रुत्वास्तान् पुरन्दरः । ततो देवगणैः सार्धं यान्यस्मिन्केशवान्तिकम् ॥ —149।२०१ तस्योदगाश्रमं चक्रे ब्रह्मा देववरः स्वयम् । पश्चार्धे चाश्रमं चक्रे कश्यपो भगवानृषिः ॥ —180।२३३-२३४ देवर्षिनागमुख्येष्वथितिष्ठत्स्वेव च कश्यपः । उवाच वरदं विष्णुं हस्तौ बद्ध्वा पुरः स्थितः ॥ —198।२६० वसतां रमणीयश्च पुण्यश्च भविता तथा । कश्यपे ब्रुवतीत्येवं नागा वचनमब्रुवन् ॥ —199।२६३-२६४ न वय मानुषैः सार्धं वसामो मुनिपुंगव । तानुवाच तथा क्रुद्धः कश्यपो वै प्रजापतिः ॥ — 201।२६६-२६ एवं उक्ते कश्यपेन नीलः प्राञ्जलिरब्रवीत् । एते क्रोधवशा ब्रह्मन्नाभिजानन्ति किंचन ॥ —202।२६८-२६९ कश्यपस्तमुवाचाथ ऋषिः परमधार्मिकः । वालुकार्णवमध्ये तु द्वीपः षड्योजनायतः ॥ —203।२७६-२७७ कः प्रजापतिरद्दिष्टः कश्यपश्च प्रजापतिः । तेनेदं निर्मितं देशं काश्मीराख्यं भविष्यति ॥ —218।२९१-२९२ एवं निष्पिष्टान् काश्मीरान्दृष्ट्वा हृष्टस्तु कश्यपः । आराध्य शंकरं देवमुमां देवीमचोदयत् ॥ —228।३०५ अदितिर्देवमाता च कश्यपेन प्रचोदिता । त्रिकोटीनांमतो भूत्वा नदीदेशे प्रपर्पति ॥ —231।३०८ शक्रपत्नी शची या च सा च कश्यपचोदिता । नाम्ना इयं यथा याता देशेऽस्मिन् पापसूदनी ॥ —232।३०९ एवं कश्यपवाक्येन देयदानवमातरः । देवपत्न्यस्तथा पुण्याः सरिद्रूपत्वमागताः ॥ —234।३११ तत्र कश्यपवाक्येन तीर्थसागरनिम्नगाः । काश्मीराय तदा जग्मुः सान्निध्यं पुण्यवृद्धये ॥ —235।३१२

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-वार पाठ (लिप्यंतरण) दिया गया है:

४८ राजतरंगिणी कदाचित्कश्यपं द्रष्टुं ययुर्देव्यः प्रकीर्तिताः । तास्तत्र चोदयामास कश्यपो भगवानृषिः ॥ —239।३१६-३१७ आराधयामास तदा सम्यर्थेन तु शंकरम् । तदोवाच हरो भार्या कुरु कश्यपभाषितम् । —242।३२३-३२४ रसातलं जगामासौ पुनस्तामेव कश्यपः । प्रसाद्योन्माजयामास पञ्चहस्त समीपतः ॥ —255,३४५-३४६ सा च दृष्ट्वा कृतघ्नेन तिरोधानं गता पुनः । भूयः कश्यपवाक्येन चोदिता निम्नगोत्तमा ॥ —257।३४७-३४८ भूयः कश्यपवाक्येन नरसिंहाश्रमे शुभा । उन्मज्जिता नदी विप्रैस्तूयमाना सहस्रशः ॥ —259।३४९-३५० क्रोशमात्रे ततो दृष्ट्वा द्वाद्गभेन महानदी । अन्तर्द्धानं जगामासौ ततस्तामाह कश्यपः ॥ —260।३५०-३५१ एवं प्रसादिता भक्त्या कश्यपेन महात्मना । उवाच कश्यपं देवी तं तथावादिनं तदा ॥ —-266।३५७ एवं मशांकां विज्ञाय कश्यपस्त्वब्रवीत् पुनः । त्वमेव परमा शक्तिर्वसुभिर्मरुद्भिः स्तुता । क्षीरोदकन्ये विरजे पवित्रे मङ्गलास्पदे ॥ —273।३६७-३६८ पुनस्तां तु महाभागां ऋषिः प्रोवाच कश्यपः । अवश्यं हलमार्गेण गन्तव्यं सुभगे त्वया ॥ —300।३९९-४०० अन्यथा देश एवायं सरस्त्वमुपयास्यति । भूयो भूयश्चोद्यमाना कश्यपेन सरिद्वरा ॥ —301।४००-४०१ एषा हि पापशमनी वितस्ता निम्नगोत्तमा । कश्यपस्य तु वाक्येन लक्ष्म्या महगता क्षितिम् ॥ —321।४२२ प्रजापतिः कश्यपो हि सर्वभूतपिता प्रभो । त्वया तु शोभतेऽत्यर्थं पुत्रेणात्यन्तधार्मिकः ॥ —352।४५५ कार्त्तिक्यां समतीतायां संप्राप्ते प्रथमेऽहनि । कश्मीरा निर्मिता पूर्वं कश्यपेन महात्मना ॥ —450।५६१ ब्राह्मयं कश्यपं वह्निं धातुं गगनमेव च । माल्यैर्गन्धैस्तथा धूपैर्नैवेद्यैश्च पृथक् पृथक् ॥ —542।६६४ ऋषयो बालखिल्याश्च कश्यपास्त्यनारदाः । तथैवाप्सरसः पुण्याः पूज्या देवाश्च सोमपाः ॥ —605।७२७ आषाढ्यां समतीतायां यदा स्याद् द्विजरोहिणी । तदा तु कश्यपः पूज्यो देशस्यास्य प्रवर्तकः ॥ —710।८४७ दिवाकरेण सौम्येन वह्निना पवनेन च । कश्यपेनाथ भृगुना पुलस्त्येन तथात्रिणा ॥ —1155।१३६६-१३६७ रामोऽपि तपसा दीप्तो वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ दत्वा महीं कश्यपाय महेन्द्रं पर्वतं गतः ॥ —-1225।१४३८-१४३९ नीलमत पुराण से मालूम होता है कि वारमौर मे कश्यप स्वामी, कश्यपेशा तथा कश्यपेश्वर के देव- स्थान थे । कश्यपस्वामी : कार्त्तवीर्यार्जुनस्वामी दृष्ट्वा तं च दिवाकरम् । मार्तण्डं कश्यपस्वामि विश्वगाङ्गरुतं रविम् ॥ —1017।११९८९ ब्रह्माखं वरदं दृष्ट्वा शैलरूपधरं स्वयम् । विष्णुस्वामि हरस्वामि कश्यपस्वामिनस्तथा ॥ —1019।११९१ कश्यपेशाः चक्रेश्वरं सचन्द्रेशं कश्यपेशां विलोहितम् । कामेशां स चमिष्टेशां भूतेशं सगडेश्वरम् ॥ —1023।११९४-९५

प्रथम तरङ्ग ४९

[बायाँ स्तम्भ] कश्यपेश्वरः हिमाचलेशं शंखेशं देशं चैवसिलेश्वरम् । महानन्दीश्वरं शम्भुं वरदं कश्यपेश्वरम् ॥ —1025।१९९७ शम्भुंस्तथा चन्द्रदिवाकरौ द्वौ जग्राह देवोऽथ करद्वयेन। प्रकाशमासीज्जगतो निमेषाद्ध्वस्तं तथा सर्वमथान्धकारम् ॥ 171।२२३-२२४ ध्वस्तेऽन्धकारे हरिरप्रमेयः योगेन कृत्वा स्वपरं शरीरम् दैत्येन युद्धं स चकार सार्धं देहेन चान्येन स युद्धमैक्षत् ॥—172।२२४ विष्णोश्च दैत्येन बभूव युद्धं घोरं द्रुमैः पर्वतमस्तकैश्च युद्धं च ते देवगणाः समस्ताः प्रहृष्टचित्ता ददृशुः समन्तात् ॥ 173।२२५-२२६ जल निकल जाने के कारण सतीसर सुंदर आनंद कानन में परिणत हो गया । अबुल फजल आइने अकबरी में लिखता है—'जब जल घट गया, तो कश्यप जो अपनी तपस्या के लिए प्रसिद्ध थे, ब्राह्मणो को इस देश मे आबाद करने के लिए लाये । आद- मियो की तादाद बहुत बढ गयी, तो शासन करना आवश्यक हो गया । 'सभा में एक मत से लोगो ने जो उनमें गुणी था, राजा चुन लिया । उस समय से काश्मीर में राजतंत्र स्थापित हो गया । राजा गोनन्द के समय तक चलता रहा । उसे आज अर्थात् १४ वर्ष अकबर के शासन काल से ४४४४ वर्ष हो चुके हैं ।' कश्यपपुर ( मुलतान ) मुलतान का प्राचीन नाम था । तत्पश्चात् हंसपुर, वेगपुर, शांबपुर तथा अंत में इसका नाम मूलस्थान हुआ । वर्तमान मुलतान शब्द मूलस्थान का अपभ्रंश है । लगभग ३००० वर्ष ईसा पूर्व मुलतान का निश्चित नाम क्या था, कहना कठिन है महेनजोदारो तथा हरप्पा से इस नगर का संबंध जल और स्थल दोनों मार्गों से था । यह निर्विवाद है । मुलतान का नाम ई० पू० ६०० वर्ष मे प्रकाश में आया है । ७

[दायाँ स्तम्भ] ऊपर लिख चुका हूँ, मुलतान का प्राचीन भार- तीय नाम कश्यपपुर था । फारसी तथा प्राकृत भाषा में मुलतान को कश्यपपुर नाम से संबोधित किया गया है । हेकालोरस ने इसका यूनानी नाम 'कश- पापैरोम' दिया है । यह यूनानी शब्द निसंदेह कश्य- पुर का अपभ्रंश है । प्रसिद्ध यूनानी इतिहासकार हिरोडोटस ने 'कश- पतेरोस' नाम का उल्लेख किया है । अलकझेंद्र अर्थात् सिकंदर के ऐतिहासिको ने मुलतान को 'मोल्लियों' की राजधानी बताया है । प्तोलेमी ने 'कसपुर' नाम दिया है । यह शब्द कश्यपपुर का अपभ्रंश है । सन् ६४१ ई० में व्हेनसांग भारत आया था । पर्यटन काल में इस स्थान की यात्रा की थी । मुल- तान के विशाल सूर्य मंदिर तथा नगर का अद्भुत वर्णन करता है । आठवी शताब्दी के पश्चात् मूलस्थान का अप- भ्रंश मुलतान हो गया । एक प्राचीन गाथा है । भगवान् नरसिंह ने यहाँ अवतार लिया था । नरसिंह भगवान् ने हिरण्यकश्यप राक्षस का वध किया था । हिरण्यकश्यप राक्षसो का राजा था । हिरण्य शब्द के साथ कश्यप शब्द इस बात का बोध कराता है कि हिरण्यकश्यप का संबंध कश्यप वंश तथा कश्यप- पुर से था । कश्यप राक्षसों के आद्य पुरुष थे । हिरण्य- कश्यप का पुत्र विष्णु का उपासक था । राक्षस, पिशाच तथा नाग जाति शिव की उपासक थी । हिरण्यकश्यप संभवतः विष्णु पूजा का विरोधी था । उसका यह विरोध विष्णु भक्ति की ओर आकर्षित प्रह्लाद के प्रति उग्र हो उठा । अनुमान किया जा सकता है । नरसिंहावतार की कथा शैव तथा वैष्णव मत के संघर्ष का एक रूपक है । कश्यपपुर का नाम मूलस्थान किस प्रकार पड़ गया । विचारणीय विषय है । मैं समझता हूँ, । जहाँ भगवान् के अवतार लेने के स्थान का संकेत

५० राजतरंगिणी प्राचीन काल मे मिलता रहा होगा। उस स्थान का नाम मूलस्थान रख दिया गया। मुस्लिम काल मे प्रथम बार काशी का मंदिर जहाँ तोड़ा गया था उसी के समीप मे 'आदि विश्वेश्वर' की स्थापना हो गयो। दूसरे विश्वनाथजी के मंदिर का निर्माण अकबर काल मे हुआ था। आदि विश्वेश्वर के नाम से काशी मे एक मुहल्ला भी है। मथुरा में भगवान् श्रीकृष्ण का जिस स्थान पर जन्म हुआ था उसे जन्मभूमि कहते है। वहाँ पर इस समय मस्जिद है। मस्जिद के पृष्ठभाग मे जन्मस्थान का स्मारक निर्माण कर दिया गया है। यही बात मुलतान के विषय मे हुई होगी। आदि अर्थात् मूल मंदिर जिस स्थान पर रहा होगा उसे 'मूलस्थान' कहा गया। तीर्थस्थान होने के कारण नाम प्रचलित हो गया। हिंदू काल मे मूलस्थान तथा मुसलिम काल मे अपभ्रंश होकर मुलतान नाम पड़ गया। पुरासंस्कृत साहित्य मे मूलस्थान का उल्लेख मिलता है। रावी नदी के मध्य दो द्वीपों पर उसके बसने का वर्णन किया गया है। प्रसिद्ध चीनी पर्यटक युवान च्वांग ने इस नगर की यात्रा की थी। उसने मूलस्थान का स्थान सिंध के पूर्व ९० मील बताया है। जनरल कनिंघमने उसे मुलतान माना है। सौवीर सिंधु नदी के पूर्व तथा सिंधु और वितस्ता के मध्यवर्ती भाग को माना गया है। यह देश, प्रदेश किंवा क्षेत्र मुलतान तक विस्तृत था। सिंधु देश को युवान चांग ने सिंध नदी के पश्चिम का भूखंड बताया है। मार्कंडेय, ब्रह्मांड, वायु तथा मत्स्य पुराण के अनुसार सौवीर में मुलतान तथा झरावार क्षेत्र सम्मिलित थे । झरावार क्षेत्र वितस्ता (झेलम) तथा चंद्रभागा (चेनाव) के संगम से ५० मील अधोभाग पर स्थित था। मुलतान सौवीर प्रदेश के उत्तर मे था। स्कंदपुराण ने भारत को ९ खंड तथा ७१ विभेदों में बाँटा है। किंतु नाम ७५ का दिया है। मूलस्थान क्षेत्र की क्रमसंख्या तालिका मे ७वीं है। उसमें २५ हजार ग्राम थे। ग्रामों की संख्या स्वल्प होने के कारण अनुमान लगाया जा सकता है। मुलतान क्षेत्र बहुत बड़ा नहीं था। वाराह क्षेत्र—सोमदेव भट्ट 'कथासरित- सागर' में उल्लेख करता है कि भगवान् विष्णु ने स्वयं वाराह क्षेत्र को पवित्र किया था।—'वाराहं यच्च क्षेत्रं ये पूताश्चक्रपाणिना—।'(७.५ : ३७) क्षेमेंद्र ने लोक प्रकाश मे वाराह क्षेत्र का उल्लेख करते लिखता है 'वाराह क्षेत्र—कोट विहार समीपे—' मैं यहाँ दो शब्द वाराह क्षेत्र माहात्म्य के विषय मे लिखना चाहता हूँ। बारहकूला के 'खादनयार' गाँव के आगे से वितस्ता की धारा में तेजी आ जाती है। इसके पश्चात् वितस्ता मे नाव चलना संभव नहीं होता। इस स्थान पर दोनो पार्श्व में पर्वत हैं। पर्वतों के मध्य मध्ये अधिक संकुचित यह स्थान है। यहाँ मे वितस्ता वेगवती हो जाती है। स्पष्ट प्रतीत होता है। जल दौड़ता नीचे की ओर भागा जा रहा है। यहाँ यदि पानी रोक दिया जाय तो समस्त काश्मीर उपत्यका के पानी का स्तर ऊपर उठ जायेगा। समस्त काश्मीर मंडल पूर्वकालीन वर्णित सतीसर तुल्य हो जायगा। केवल सारिका पर्वत तथा उसका स्थान जल मे द्वीप के समान प्रकट होगा। यही पर पर्वत काटकर संकीर्ण जल मार्ग विस्तृत किया गया था। नदी की सतह की चट्टानो को खोदकर नदी का पेटा गहरा किया गया था। यही वितस्ता द्वारा पानी निकालकर काश्मीर उपत्यका सूखी भूमि बनाई गई थी। इस स्थान तथा उपत्यका का भूगोल समझ लेने पर प्राचीन कथा की सत्यता सिद्ध हो जाती है। मैने इस स्थान को देखा है। वितस्ता नदी में इस समय भी एक चट्टान जल मे टकराती, तटीय

प्रथम तरंग ५१


[बायाँ स्तम्भ]

पर्वत के वाम पार्श्व मे लगी खड़ी है। इससे कुछ आगे चलकर द्रंगबल नाला वितस्ता के दक्षिणी तट पर आकर मिलता है। नाले की दो शाखाएं हो जाती हैं। मूलत एक ही स्थान पर उनका उद्गम है। यह नाला पहाड़ से शिलाखंड, रेत तथा पंकराशि लाकर नदी के गर्त को पाटता रहता है। नदी का गर्त किंवा पेटा साफ करने के लिए यहीं पर बाढ़ विभाग की तरफ से इस समय कार्य हो रहा है। दो बुलडोजर काम कर रहे थे। नदी से पंकराशि निकाल कर बाहर फेंक रहे थे। वारहमूला में दो श्मशान भूमियां हैं। मैने यहाँ की चार बार यात्राएँ की हैं। सन् १९६० में आया था तो चिता पर शव जल रहे थे। एक सिखो का श्मशान है दूसरा हिन्दुओ का है। यदि इस संकुचित स्थान पर शिलाखंड, रेत तथा पंकराशि भर जाय तो वितस्ता की जलधारा अनायास रुक जायेगी। काश्मीर उपत्यका का जल वेग से बाहर नही निकल पायेगा। काश्मीर उपत्यका मे जल रुककर काश्मीर उपत्यका का जलस्तर ऊपर उठा देगा । वूलर तथा डल आदि सरों का जल उठकर उपत्यका को एक विशाल सर मे परिणत कर देगा। उसे आप्ला- वित करने लगेगा। एतदर्थ प्राचीन काल से इस स्थान पर विशेष ध्यान दिया जाता रहा है। नदी का जल वेग से बाहर निकलता जाय। इसके लिए समय समय पर योजनाएँ बनाई गई हैं। उनका यथास्थान वर्णन किया गया है। यहीं पर एक पुराना 'द्रंग' अर्थात् चौकी था। • स्थान इतना संकुचित है कि काश्मीर मंडल प्रवेश द्वार का कार्य करता है। सुरक्षा की दृष्टि से महत्त्व रखता है। प्राचीन द्रंग के कारण नाला का नाम द्रंगबल पड़ गया है। इस स्थान पर हिन्दू काल में द्वारपति अर्थात् उच्च सेनाधिकारी की नियुक्ति की जाती थी। काश्मीर के सैनिक इतिहास में द्वारपति का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान तथा योगदान रहा है। इसका पद सेनापति के समान समझा जाता था।


[दायाँ स्तम्भ]

नारायण स्थान : इस नाला से नदी के अधोभाग की ओर बढने पर नारायण मंदिर मिलता है। इसे नीलमत में नारायण स्थान कहा गया है। यह मंदिर वितस्ता के दक्षिण तट पर स्थित है। बारहमूला से एक मील दूर होगा। पुरानी बारहमूला मुजफ्फराबाद रोड पर है। यह पहाड़ा के मूल में है। वर्तमान यारहमूला सडक के निर्माण के पूर्व यह सड़क खूब चलती थी। मंदिर सवा तेरह वर्ग फुट में है। मंदिर में केवल एक द्वार तीन फुट चौड़ा है। मंदिर के समीप एक नाग अर्थात् जलस्रोत है। नारायण मंदिर पूर्व काल में एक सुन्दर निर्मल सरोवर के मध्य मे स्थित था। इस समय मंदिर के पृष्ठभाग का सरोवर स्थान रेत तथा पंक से पट गया है। मंदिर पूर्णतया खंडहर की हालत मे है। मंदिर का एक भाग भूमि के अंदर है। मंदिर द्वार के सम्मुख कुछ सरोवर का भाग अपनी पूर्व स्थिति का स्मरण कराता है। करुण गाथा सुनाता है। यात्रियो से अपनी दशा पर सहानु- भूति के लिए याचना करता है। जलस्रोत आँसुओं की तरह निकलता रहता है। मंदिर के पृष्ठ भाग में एक कब्रिस्तान है। कुछ दिनो में सरोवर का शेष भाग रेत और पंक से पट जायगा। मंदिर का अस्तित्व केवल पुस्तको मे शेष रहेगा। मंदिर में मूर्ति नही है। शायद कोई उठा ले गया है। किंवा कब्रिस्तान के किसी कब्र में लगी होगी। अथवा किसी के मकान की नींव में पड़ी सो रही होगी। मंदिर में लगे कुछ पत्थर ९ १/२ फुट लम्बे तथा १३ इंच मोटे हैं। मंदिर के भग्नावशेष यत्र-तत्र पड़े दिखाई देते हैं। मैं अन्तिम बार यहाँ आया था सन् १९६४ में। उस समय यहाँ के बहुत वृक्ष कट चुके थे। स्थान की अभिरामता नष्ट हो रही थी। दो, तीन सहतूत के पेड़ सरोवर के तीर पर लगे थे। उन्हे भी काटा जा रहा था। किसी समय का सुरम्य देवस्थान कब्रि-

द्वितीय तरङ्ग: प्रतापसिंह व अन्य शासक

५२ राजतरंगिणी

स्थान के सम्पर्क में रहने के कारण सचमुच श्मशान [L3_col2] वाराह अवतार—वाराह भगवान् का अवतार हो गया है। [L4_col2] मालूम होता है। इसी क्षेत्र में हुआ था। कल्हण ने इस स्थान से वितस्ता की धारा में वेग आ [L5_col2] तरंग २ के श्लोक १९२ में वराह वर्त शब्द का प्रयोग जाता है। एक मील और धारा के साथ जाने के [L6_col2] किया है। यह स्थान वर्तमान वराहगाम के समीप पश्चात् वितस्ता नदी अपना शांत स्थिर रूप त्याग [L7_col2] होना चाहिए। वराह ग्राम वोरु परगना में है। द्रंग कर हर-हर करती गर्त में प्रवेश करती है। चट्टानों [L8_col2] में तीन मील पूर्व होगा। आदिवराह का यहाँ अवतार और ढोकों से टकराती उगे तक चली जाती है। [L9_col2] लेना कहा जाता है। वारहमूला अर्थात् मूल वाराह नीलमत पुराण में नारायण स्थान का उल्लेख [L10_col2] किंवा वराह नाम से इसीलिए संबोधित किया आता है। [L11_col2] गया है। नारायणस्य च स्थानं सपुण्यं बदराश्रमम् । [L12_col2] बर्नियर का अभिभावक दानिशमंदखाँ था जिसके साथ सुगन्धां शतकुम्भां च कालिकाश्रममेव च ॥ [L13_col2] वह कश्मीर गया था। वह एक रोचक कहानी उपस्थित —४7 : १२८, १२९ [L14_col2] करता है—'दानिशमंद खाँ ने मुझे वारहमूला जाकर देवं नारायणं स्थाने पश्चिमे तु वरप्रदम् । [L15_col2] एक अलौकिक घटना देखने के लिए कहा। तात्पर्य गजेन्द्रमोक्षणं देवं वराहस्य समीपगम् ॥ [L16_col2] यह था कि मैं इस दैवी चमत्कार को देखकर अपना —1158 : १३६९, १३७० [L17_col2] धर्म परिवर्तन कर दूँ और मुसलमान हो जाऊँ। यहाँ स्नात्वा नारायणस्थाने विष्णुलोके महीयते । [L18_col2] पर एक मसजिद है। एक दरवेश की कब्र है। यह रामतीर्थे भवाब्धौ च फलमेतद् प्रकीर्तितम् ॥ [L19_col2] कब्र एक मसजिद में है। यद्यपि दरवेश मर चुके हैं। —1312 : १५२६ [L20_col2] अलौकिक ढंग से बीमार तथा पशुओं को अच्छा करते स्नात्वा नारायणस्थाने वितस्ताम्भसि पार्थिव । [L21_col2] हैं। चाहे मैं इस चमत्कार पर विश्वास न करूँ विष्णुलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ [L22_col2] परंतु यहाँ एक दूसरी चीज और है। उस दरवेश —1345 : १५६० [L23_col2] के कारण यह चमत्कार होता है। यहाँ एक गोल नीलमत पुराण में नारायण स्थल का दो स्थानों [L24_col2] पत्थर है। उसे मजबूत से मजबूत आदमी नहीं उठा पर तीर्थरूप में वर्णन किया गया है। मालूम होता [L25_col2] सकता। यदि ११ आदमी दरवेश की प्रार्थना कर है, दो नारायण स्थान थे। श्लोक संख्या १३४५, [L26_col2] अपनी एक-एक उंगली इसमे लगाकर उठाएँ तो १५६० तथा १५९८ में वाराह क्षेत्र का उल्लेख [L27_col2] वह सूखे तिनके की तरह हल्का उठ जाता है। है। परन्तु श्लोक संख्या १३१२, १५२६ में वाराह [L28_col2] 'मुझे वारहमूला अच्छा लगा। दरवेश की क्षेत्र का उल्लेख नहीं है। [L29_col2] ज़ियारत और कब्र कीमती सामान से सजी थी। उसे महाभारत वन पर्व (८३ १८-१९) में वराहा- [L30_col2] घेर कर बहुत से लोग बैठे थे। वे कहते थे कि वतार स्थान के विषय में उल्लेख मिलता है। [L31_col2] वे बीमार थे। अच्छे होने के लिए आये थे। मसजिद कुरुक्षेत्र सीमा के अन्तर्गत यह एक तीर्थ है। भगवान् [L32_col2] की बगल में एक बावर्ची खाना था। वहाँ देग चढ़ा विष्णु ने यहाँ वाराह रूप में अवतार लिया था। इस [L33_col2] था। उसमें चावल तथा गोश्त पक रहा था। मैं तीर्थ में स्नान करने पर स्नानार्थी को अग्निष्टोम यज्ञ [L34_col2] समझ गया। इस देग के चुम्बकीय भांति पदार्थ के करने का फल प्राप्त होता है। वाराह क्षेत्र के विषय [L35_col2] आकर्षण के कारण गरीब तथा बीमार एकत्र हो गये में यथा स्थानपर वर्णन किया गया है। [L36_col2] थे। मसजिद की दूसरी तरफ मुल्ला का मकान था। [L37_col2] बाग था। यहाँ में पामदानी बगता था। उसकी तारीफ

करने में लोग होड़ लगाए थे । जब तक में वहाँ था, एक भी बीमार आदमी अच्छा होते नहीं देखा । 'वह पत्थर जो मुझे मुसलमान धर्म में दीक्षित करने के लिए वहाँ पड़ा था, उसे ११ मुल्ला घेर कर खड़े थे । वे इस प्रकार उसे घेर कर खड़े थे कि मैं कठिनता से अन्दर देख सकता था। मैंने इस धोखे की बात को किसी प्रकार देख लिया । मुल्ला लोग एक उँगली की जगह अपना अंगूठा तथा उँगलियाँ पत्थर से लगाए थे । वे उसे उठाये । वहाँ खड़े लोग चिल्लाने लगे—करामात-करामात । मैंने उन्हें एक रुपया देकर कहा । क्या ग्यारह उठाने वालों में वे मुझे भी एक शामिल कर लेंगे। उन्होंने अनिच्छा प्रकट की । परन्तु मैंने श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए एक रुपया और दिया तो एक मुल्ला हट गया । मैंने उसमें अपनी केवल एक उँगली लगाई थी । अतएव पत्थर उठाते समय मेरी तरफ झुका जाता था । मुल्ला मेरी ओर बुरी निगाह से देखने लगे । अंत में मैंने इसमें बुद्धिमानी समझी कि उँगली तथा अँगूठा दोनों लगाया जाय । पत्थर मुश्किल से उठा । मैं भी करामात करामात कहने लगा । मैं एक रुपया और फेंककर चुपचाप वहाँ से चल दिया । मैंने कुछ जल- पान नहीं किया था। दरवेश को नर्मदा के लिए नमस्कार किया। मैंने बारहमूला का वह स्थान देखा । जहाँ तंग रास्ते से पानी बहता चला जा रहा था (पृष्ठ ५५-२१२-४१६) ।" बर्नियर ने यहाँ किसी मन्दिर आदि का वर्णन नहीं किया है । संभव है। वैरी नाग की तरह औरंगजेब के समय मन्दिर नष्ट कर दिए गये हों । संदर्भ : वाराह वैदिक देवता तथा पौराणिक अवतार है । उनका उल्लेख ऋ० १:६१:७, १:८८:५; १:२१:११; १:१४४:५; १०:८६.४' ८:७७:१०, ९:९७:७; ११०:२८:४; १०:८६:४; १०:९९:६; काठक संहिता ८:२'२५:२; मैत्रायणी संहिता ३:१४:१९, तैत्तिरीय संहिता ६:२.४:१; ७.२:५:१, तैत्तिरीय आरण्यक १:९:४; शतपथ ब्राह्मण ५.४:३:; तैत्तिरीय ब्राह्मण १:१:३; १:१:१६; १:७.९:४, में मिलता है । पुराण : मत्स्य : ४७:४७ भागवत : १:३:२७; ३:१३, लिग १.९४, वायु २:३५, हरिवंश १:४१, पद्म. उ०: ६९,२३७, वराह १३७:१४० मत्स्य १७३, तथा महाभारत : सभापर्व : २८.२९, वनपर्व ८३: ८-१९ में उल्लेख मिलता है । बारहमूला—वारिमूल : वारिमूल शब्द का अपभ्रंश बारहमूला हो सकता है । वारिमूल चाक्षुष मन्वंतर काल के एक देवता है। वारि किंवा वारि शब्द का अर्थ जल होता है । मूल शब्द का अर्थ उदगम् स्थान अर्थात् जड़ होता है । जहाँ से कोई चीज उत्पन्न होती है । काश्मीर जिस समय सतीसर के रूप में जलमय रहा होगा, उस समय इसी स्थान से जल स्रोत के रूप में जल निकाला गया होगा । उसका उद्गम अर्थात् मूल यही स्थान था । देवता तथा अलंकार दोनों दृष्टियों से इसका नाम आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व 'वारिमूल' दिया गया होगा । कालांतर में वारि शब्द वार हो गया। उसमें मूल शब्द जोड़ देने में उसका पूर्ण नाम वारमूल हो गया । वराह अवतार का नाम कालांतर में वहीं वारिमूल के साथ जोड़ दिया गया। वारिमूल वारह- मूला हो गया होगा । इसी को उलटने पर मूलवाराह नाम पकड़ लिया होगा । यह मेरा अनुमान मात्र है । इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है। बारहमूला शब्द का सर्व प्रथम प्रयोग शुक ने चौथी राजतरंगिणी में किया है। उस समय काश्मीर का बादशाह फतह शाह (सन् १४८६-१५१४ई०) था । बारहमूला में मार्गश इबराहीम अपने साथी महमूद शाह के साथ सेना लेकर आया था । ( दत्त ३४५ ) बारहमूला शब्द का दूसरी बार उल्लेख भी शुक ने चक्रेश के बारहमूला से श्रीनगर जाने के प्रसंग में किया है। (दत्त ३६२) इसके पूर्व सब स्थानों पर वाराह क्षेत्र शब्द का प्रयोग किया गया है।

५४ राजतरंगिणी अबु रिहान ने उप्कर को बारहमूला का नगर कहा है जो नदी के दोनों तटों पर बना आबाद था। (फ्रेगमेन्ट्स आफ अरब्स पृष्ठ ११६) बारहमूला पहले वितस्ता नदी के दक्षिण तट पर आबाद था। इस समय दोनों तटों पर आबाद है। उप्कर (हुष्कर) का स्थान वितस्ता के वाम तट पर है। बारहमूला के वर्तमान नगर विकास की सीमा में उप्कर आ गया है। प्राचीन काल से ही बारहमूला नगर तथा हुष्कपुर को जोड़ने के लिए वितस्ता पर पुल बँधा है। इस समय वह पुल और विशाल तथा आधुनिक शैली का बना दिया गया है। वह पुल हिन्दुओं के तीर्थ वाराह क्षेत्र तथा बौद्धों के तीर्थ हुष्कपुर दोनो को मिलाता था। यात्री एक साथ दोनो तीर्थों की यात्रा कर सकते थे। काश्मीर में शिव, विष्णु, तथा बुद्ध तीनों की पूजा एक साथ चलती थी। इससे प्रकट होता है। बारहमूला के दक्षिण तट पर हिन्दुओं को विशेष और उत्तर तट पर बौद्धों की आबादी थी। बारहमूला का इसलिए और महत्त्व बढ़ गया था कि वह बौद्ध तथा हिन्दू दोनों का समान रूप से तीर्थ स्थान था। (जोनराज ३५६-६७) वाराह क्षेत्र माहात्म्य में वाराह क्षेत्र तथा उससे सम्बन्धित अनेक तीर्थस्थानों का उल्लेख मिलता है। कल्हण ने वाराह मन्दिर का कई बार वर्णन किया है। जनश्रुति के अनुसार बारहमूला नगर के पश्चिम, वितस्ता तटपर, कोटि तीर्थ के समीप वाराह का मन्दिर था। कोटि तीर्थ में प्राचीन काल की मूर्तियां तथा शिव लिंग मिला है। यह सब खण्डित मूर्तियां वाराह मन्दिर की रही होंगी। वाराह का मन्दिर काश्मीर के सुलतान सिकन्दर बुत शिकन (सन् १३८६-१४११ ई०) ने तुड़वाया था। उस समय इस मन्दिर के साथ ही साथ काश्मीर में मार्तण्ड, विजयेश, ईशान, चक्रभृत (चक्रधर) त्रिपुरेश्वर, शैष, सुरेश्र्वरी, के प्रसिद्ध मन्दिर भी तोडे गये थे। (जोनराज · श्लोक ६००; दत्त पृष्ठ ६०) श्री जोनराज (सन् १४४६ ई०) वाराह क्षेत्र में बडशाह जैनुल आवदीन द्वारा दान सत्र खोलने का उल्लेख करता है। (दत्त ८८) बादशाह ने वाराह क्षेत्र में इतने चावल का दान किया था कि उसके भार से अनन्त नाग का मस्तक झुक गया था। इन्द्र का मस्तक भी इस दान को देखकर लज्जा से नत हो गया था। (दत्त १३९) श्री शुक अन्तिम और चौथी राजतरंगिणी में एक अद्भुत घटना का वर्णन करता है— 'आश्विन मास लौकिक संवत् ४६३० (सन् १५५२ ई०) सुलतान इस्माइल शाह के समय में भयंकर भूकम्प आया था। लोग इतने भयभीत हो गये थे कि पुत्र, स्त्री, सज्जनों, दयालुओं तथा किसी के लिए सहानुभूति नही रह गयी थी। तथापि वाराह क्षेत्र के नागरिकों में किसी प्रकार की चिन्ता व्याप्त नहीं थी। वहाँ पर लोगों ने भूकम्प का अनुभव किया ही नहीं।' (दत्त : १८१) राज- तरंगिणी में अन्तिम बार बारहमूला का उल्लेख सम्राट् अकबर की सेना के अभियान के समय आता है। काश्मीर के सुलतान यूसुफ शाह ने मन्दिर में शरण ली थी। वितस्ता : गंगा नदी का वर्णन वेदों के केवल दो बार आया है। वितस्ता का नाम ऋग्वेद में एक बार आया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त के प्रसंग (१०,७५,५) तथा निरुक्त (९,२६, ) में वितस्ता का उल्लेख किया गया है। वितस्ता नदी का ज्ञान वैदिक पुरुषों को था। गंगा की पूर्व दिशावर्ती नदियों का नाम वेद मे नही मिलता है। उनका ज्ञान वैदिक रचनाकारों को नहीं था। उनके वितस्ता ज्ञान तथा वर्णन से प्रकट होता है। वितस्ता का महत्त्व वैदिक युग में था। भागवत पुराण (५.१९:१८) में वितस्ता का उल्लेख मिलता है। पाणिनि की काशिका वृत्ति

प्रथम तरंग ५५ ( १:४.३१ ) में वितस्ता का वर्णन किया गया है। अलकसुन्दर अर्थात् सिकन्दर के इतिहासकारों ने इसका नाम हदसपेश और प्तोलेमों ने इसका विदस- पेस नाम दिया है। काश्मीर में इसको विरंग, अदपल, मंदरन तथा झेलम कहते है। पाली साहित्य में वितस्ता को वितमसा की संज्ञा दी गयी है। उसकी गणना उत्तरापथ की नदियों में की गयी है। (धम्मपदट्ठकथा भाग २, पृष्ठ ११६, मिलिंद प्रश्न हि०, पृष्ठ १४४, अवदान, पृष्ठ २७७, तथा २९१ ) महाभारत कर्ण पर्व (अ० ४४) में वितस्ता का उल्लेख मिलता है। चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुरुच्चा बहिर्गिरेः । आरट्टा नाम ते देशा नष्टधर्मा न तान्त्रजेत् ॥ सभा पर्व ( ९:१९ ) में उल्लेख है कि वितस्ता वरुण की सभा में उपस्थित रहती हैं। उनकी उपा- सना करती हैं। वन पर्व ( ८२: ८६-६१ ) के अनुसार वितस्ता में स्नान करने से वाजपेय यज्ञ की फलप्राप्ति होती है। कश्मीर में नागराज तक्षक का प्रसिद्ध भवन हैं। उद्योग पर्व में वर्णन मिलता है। इसकी धारा में ब्राह्मणों के ४०० श्यामकण्ठ अश्व वह गये थे। भीष्म पर्व ( ९:१६ ) में उल्लेख मिलता है कि इसका जल भारतीय पान करते हैं। अर्थात् वह भारत में बहती है। अनुशासन पर्व ( २५: ७८ ) तथा ( १४६: १८ ) के अनुसार सात दिन इसमें स्नान करनेवाला मुनितुल्य निर्मल हो जाता है। पार्वती ने वितस्ता के संदर्भ में शंकर से स्त्री धर्म की चर्चा की थी। इसी पर्व में ( ८: ६) एक वितस्त्य ऋषि का वर्णन है। वह सार्वनस ऋषि के पुत्र थे। सोमदेव भट्ट ने कथासरित्सागर में वितस्ता को जाह्नवी के समकक्ष माना है :—"धत्ते नाम वितस्तेति वहन्ति यत्र जाह्नवी" ७:५:३७ बनिहाल गिरिथय से कश्मीर उपत्यका का सुन्दर मनोहारी, अभिराम दृश्य मिलता है। वहाँ से धुंधला बेरी नाग का अंचल दृष्टिगत होता है। बनिहाल से काश्मीर उपत्यका में उतरते ही एक पक्का अलकतरा का सुन्दर राजपथ श्रीनगर के मुख्य मार्ग को छोड़ता है। पूर्व दिशा में वेरीनाग की तरफ बढ़ना है। तिमुहानी से उतरने पर वीर नाग ग्राम पड़ता है। गांव का नाम यहाँ के निर्झर वार या बेरी के नाम पर पड़ा। 'वीर नाग' शब्द 'विरह नाग' का अपभ्रंश है। नाग का अर्थ जलस्रोत, निर्झर, झरना, चश्मा तथा सोता है। विरह का अर्थ वियोग, बिछुडना अथवा छोड़कर चले जाना हैं। विरह नाग शब्द का अपभ्रंश वीरनाग या वेरी- नाग हो गया है। वितस्ता देवी इस स्थान में जन्म लेना चाहती थीं। वहाँ शंकर विराजमान थे। उन्हें वहाँ देखकर देवी ने संतास्विनी का रूप वितस्तारा (विठवत्तुर ) ग्राम मे लिया। यह ग्राम वेरीनाग से एक मील उत्तर-पश्चिम स्थित है। इस स्थान को वितस्ता वार्तिक नाम की भी संज्ञा दी गई है। कल्हण के समय यह स्थान वितस्तारा नाम से प्रसिद्ध था। यहाँ पर अशोक ने स्तूपों का निर्माण कराया था। वर्तमान कुंड अठपहला है। प्रत्येक पहल का विस्तार ४७ फुट है। मैं यहाँ चौथी बार १९६४ में आया था। प्रथम यात्रा मैने सन् १९५६ ई० मे की थी। आज तथा उस समय के वातावरण तथा स्थिति में बहुत अन्तर हो गया है। सन् १९५७ ई० में तोरणद्वार, सन् १९६० ई० में डाक बंगला तथा अब एक प्रकार से समस्त स्थान का जीर्णोद्धार कर दिया गया है। भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा जीर्णोद्धार का कार्य उसके मूल रूप को अक्षुण्ण रखते हुए, किया गया है। संवत् १६९९ विक्रमी में कुंड के ऊपर बाम पार्श्व में खननकार्य किया गया था। यह स्थान वर्तमान प्रवेश द्वार के दक्षिण पार्श्व में ऊँचाई पर है। यहाँ प्राचीन मूर्तियाँ एक के ऊपर एक रखी और गड़ी हुई मिली थी। मूर्तियाँ पत्थर की हैं। विष्णु भगवान्

५६ राजतरंगिणी

[बायाँ स्तम्भ]

भ्रादि की हैं। इस समय श्रीनगर के राज्य संग्रहालय में रखी हैं। मैं इन्हें कितनी ही बार ध्यानपूर्वक देख चुका हूँ। उन्हें देखकर न जाने क्यो मुझे रुलाई आने लगी। उनसे जैसे अपना निकटतम संबंध मालूम होता था। सोचता था। उनका क्या अपराध था ! ये खंडित कर गाड़ दी गई। केवल इसलिए कि उनकी कभी हिंदू पूजा करते थे। ये मूर्तिपूजक हिंदू अब मुसलमान हो गये हैं। मूर्तियों के शत्रु बन गये हैं। जिनको कभी पूजा करते थे। उन्हें खंडित करने लगे। धर्म की यह विचित्र विडंबना देखकर, वे किस प्रकार कभी राजकीय सम्मान पाती रही होंगी, स्मरणकर, मन अनायास भर आया। यद्यपि मूर्ति पूजा का मै कायल नही हूँ तथापि मनुष्यों की गति पर, उनकी दुर्बलता पर, मुझे ग्लानि अवश्य उत्पन्न हुई। आठपहले कुंड के आठपहल अर्थात् जलतट के पश्चात् समतल चबूतरा काफी चौड़ा है। उसके पश्चात् सन् १६२० ई० में जहाँगीर द्वारा छोटे- छोटे कोठरीनुमा बरामदे निर्माण कराये गये थे। चबूतरे से बरामदे की ऊँचाई काफी है। मध्यवर्ती महराबो पर हिंदू शैलो की पाषाण की नक्काशीदार धुडियां लगी हैं। सन् १६२७ ई० में शाहजहाँ ने यहाँ बाग लगवाया था। नहर दिका निर्माण कराया था। इस बाग में चिनार के हरे-भरे काफी ऊँचे वृक्ष लगे हैं। अनेक तरुवर अपनी अपनी हरियाली तथा छाया से स्थान की अभिरामता बढ़ाते हैं। कुंड से बाहर बाग में नहर सीधी निकलती है। नहर के दक्षिण पार्श्व में कुछ पुराना शिवालय है। कुंड स्थल में प्रवेश करते ही वाम पार्श्व में एक मिहराबदार कोठरी में देवो तथा देवताओ की मूर्तियां रखी गयी हैं। यहाँ एक पुजारी रहता है। देवी को देवी वितस्ता कहा जाता है। मन्दिर के दक्षिण पार्श्व में कुछ दूर आगे चलने पर भूमि से पानी वेगपूर्वक निकलता दिखाई पड़ता है। यह जलस्रोत मुख्य नहरवाले जलस्रोत में जाकर मिल जाता है।


[दायाँ स्तम्भ]

नीलनाग अर्थात् वैरीनाग कुंड का जल स्थिर है। उसमे जल निकलने का उस समय तक अनुभव नही होता है, जब तक कि कुंड के बाहर नहर में वेग से जल गिरता न देख लिया जाय। कुंड के जल की स्थिरता का मुख्य कारण कुंड की गहराई है। कुंड की गहराई के तीन खंड हैं। कुंड चौवन फुट गहरा है। कुंड की पहली सीढ़ी का चबूतराकुमा घेरा १८ फुट गहराई के बाद मिलता है। पुनः दूसरी गहराई पहले खंड के पश्चात् अट्ठारह फुट बाद मिलती है। वहाँ भी चारो ओर चबूतरा बना हैं। अट्ठारह फुट गहरा और जाने के पश्चात् कुंड का तीसरा खंड अर्थात् धरातल मिलता है। यही से पानी कई स्रोतो द्वारा भूमि से निकलता है। कुंड में ५४ फुट ऊँचाई का जल भार होने के कारण जलस्रोत का उफान तथा वेग दिखाई नही पड़ता। जल की गहराई के कारण जल का रंग गहरा नीला दिखाई देता है। जल जहाँ जितना गहरा होगा वहाँ उसमें उतना ही नीलापन अधिक होगा। कुंड की गहराई का कारण क्या है। विचारणीय है। मैने अभी तक कही भी इतने गहरे कुण्ड से जल निकलते नही देखा है। सभी निर्झर तथा स्रोत भूमि की सतह से निकलते दिखाई देते हैं। जहाँ जल कम निकलता है, वहाँ जल एकत्र करने के लिये तथा उपयोग निमित्त कुंड बनाकर संग्रह कर लिया जाता है। चश्मा शाही तथा अन्य पर्वतीय स्थानों के निर्झरों, स्रोतों के समीप इस प्रकार के कुंड की रचना नही की जा सकी है। काश्मीर मे एक दूसरा स्थान है। जहाँ इसी प्रकार के कुंड बने मैने देखे हैं। उसका यथा स्थान वर्णन करूँगा। पूर्व काल में किसी हिन्दू राजा ने इस कुंड का निर्माण कराया था। जहाँगीर के समय भग्ना- वस्था में था। उसका धार्मिक महत्त्व लोगों के मुसलमान हो जाने के कारण सुप्त हो गया था।