राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ राजतरंगिणी नीलेन सहितः प्रायान्नागराजमहात्मना। तौ गत्वा ब्रह्मसदनं ववन्दतुररिन्दम॥ —143।१९० देवं कमलयोनिं च संगत्यासनमास्थितौ। वासुदेवेश्वरौ देवावनन्तं च महामतिम्॥ 144।१९१, १९२ तैस्तु संपूजितौ तत्र जलोद्भवविचेष्टितम्। कथयामासतुर्भो ततो देवः पितामहः॥ 145।१९४ संचीयमाने सरसस्तु तोये चकार मायां स जलोद्भवोऽद्यः। अथान्धकारं ससृजे समन्ता- दृष्ट्टयमसीद्भुवनं नृवीर॥ —170।२२२ : २२३ जलोद्भवासृजा मत्तस्तदा चक्रः सुदर्शनः। वभ्राम देशं शून्यं तं सं च जग्राह शंकरः॥ 188।२४२ ऋषयो देवता नागा गन्धर्वाप्सरसां गणाः। द्रष्टुं सर्वे समाजग्मुर्जलोद्भवसररथ॥ 197।२५९ जलोद्भव भयंकर क्रूरकर्मा हो गया था। प्रजा- पति कश्यप तीर्थयात्रा पर निकले थे। कश्यप से कनखल मे आकर नील नाग मिला। उनकी पूजा की। काश्मीर की तीर्थयात्रा निमित्त निवेदन किया। जलोद्भव के अत्याचार की करुण कथा सुनाई। सतीसर के विमल सरोवर की तीर्थयात्रा निमित्त कश्यप उद्यत हो गये। नीलमत पुराण मे निम्न- लिखित उल्लेख इस सम्बन्ध में आता है। कश्यप महर्षि ब्रह्मलोक में नील नाग के साथ गये। वहाँ से ब्रह्मा, विष्णु, महेश के साथ सराबित नौबंधन तीर्थ की ओर प्रस्थान किये। उनका अनुकरण देवताओं ने किया। असुरो ने किया। वें अपने-अपने वाहनों के साथ चले। नौबंधन पहुंचे। केशव दृढ़तापूर्वक वहाँ स्थित हो गये। सुर और असुर दोनों की सेना नौबंधन पहुँची। इस महान् वाहिनी की तुमुल ध्वनि जलोद्भव दैत्य ने सुनी, व दहल गया। सुरक्षा निमित्त जल मे छिप गया। शत्रु दैत्य जल से बाहर नही निकल रहा था। उसे जल से बाहर निकलता नही देखकर मधुसूदन नौबंधन में प्रवेश किये। नौबंधन पहुँचकर (कासर नाग अथवा क्रमशसर के) तीनों शिखरों के मध्य मे शिव, दक्षिण हरि तथा उत्तर शिखर पर ब्रह्मा ने स्थान ग्रहण किया। नौबन्धनमथासाद्य केशवो वै व्यवस्थितः॥ देवानुयात्रनिनदं श्रुत्वा दैत्योऽपि दुर्मतिः। जले त्वव्यथ्यमानं भानं विदित्वा न विनिर्गतः॥ —162।२१३. २१४ अनिर्गतं तं च तदा विज्ञाय मधुसूदनः। नौबंध एवमुदितो विवेशाथ सुरैः सह॥ —163।२१५, नौबन्धशिखरे रुद्रो दक्षिणे शिखरे हरिः। उत्तरे शिखरे ब्रह्मा देषामनुसुरासुरः॥ —164।२१६ एवं ते विविशुः शैले ततो देवो जनार्दनः। अनन्तमाह धर्मात्मा वधार्थं दानवस्य तु॥ —165।२१७ जलोद्भव जल में था। विचलित नही हुआ। बिना जल निकले दैत्य दृष्टिगत नही हो सकता था। अतएव भगवान् अनन्त ने पर्वतराज को विदारित कर दिया। जल वेग से निकलने लगा। जल निकल जाने पर जल स्थित सभी भूत संज्ञाहीन हो गये। जलोद्भव ने अंधकार का सृजन किया। घोर अंधकार में नौबंधन आवृत हो गया। शंभु ने अपने दोनो करों में सूर्य तथा चन्द्रमा को लिया। अंधकार तिरोहित हो गया। विष्णु ने दैत्य को देखा। विष्णु और जलोद्भव का युद्ध आरम्भ हुआ। भीषण