राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ४५ मोनान का साँस लिया। आहिस्ता आहिस्ता इंसान इस सर जमीन में बसने लगे। लेकिन फिर भी काफी मुद्दत तक देवो और राक्षसों के हाथ तकलीफ उठाते रहे। इस दरमियान मे गरमियो में लोग हिन्दुस्तान से यहाँ आते। जरायत व खेती बाड़ी करते और सदियों के मौसम मे कुछ सर्दी की शिद्दत और कुछ देवों के खौफ से फिर अपने वतन को वापस लौट जाते। बिल आखीर रफ्त रफ्तः यह वला टल गई और लोगों ने मुस्तकिल तौर पर आबाद होकर हुकूमत के कवानोन और रस्म वो रवाज बना लिये।' तारीख कश्मीर हसन, पृष्ठ १०-११ स्कन्द पुराण में ७५ देशों तथा उनके ग्रामों की संख्या दी गई है। काश्मीर का नाम उन ७५ देशो की तालिका में ३२वाँ आता है। काश्मीर के ग्रामों की संख्या ६८००० दी गयी है। श्री स्टाइन ने अपने समय में काश्मीर के ग्रामो की गणना कर उनकी संख्या ६६०६३ दी है। अबुल फजल ने भी आइने अकबरी मे ग्रामसंख्या ६६१७१ दी है। इससे एक बात स्पष्ट होती है कि पुराणों मे वर्णित काश्मीर संबन्धी बातें कपोलकल्पित नहीं है। २ कश्यप—कश्यप ऋषि का उल्लेख ऋग्वेद (९:११४:२) में मिलता है। सामवेद, (१.१, २.४, १०, १:४:२:२,) में प्रजापति रूप मे उनका वर्णन किया गया है। अथर्व वेद (१:१४.४, २:३३:७, ४:२०:७ ४.२९:३, ४:३७.२) तथा मैत्रायणी संहिता एवं वाजसनेय सहिता शाखा (३:६२) में उन्हे प्राचीन पुरुष कहा गया है। ऐतरेय ब्राह्मण (८:२१) तथा शतपथ ब्राह्मण (१३:७:१:५) के अनुसार उन्होने विश्व- कर्मन् भौवन राजा का अभिषेक किया था। बृहदा- रण्यक उपनिषद् (२:२:६), जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण (४:३:१) तथा ऐतरेय ब्राह्मण (७:२७) में जनमेजय के संदर्भ में उनका उल्लेख किया गया है। बृहद्देवता कश्यप का उल्लेख (३:५७, ५:१५३ १४५), (२:१५७ और ८'१८) मे आता है। कुछ विद्वान् कश्यप का समय ईसा पूर्व ५६९६ वर्ष अर्थात् आज से ७ हजार ८ सौ वर्ष पूर्व मानते हैं। किंतु किसी ठोस प्रमाण पर यह गणना आधारित नही हैं। कश्यप का उल्लेख ऋग्वेद में है। उनका ऋग्वेदिककालीन अथवा उसमे भी पूर्वकालिक होना अनिवार्य है। कश्यप नागाओं के आदि पुरुष है। नीलमत पुराण मे कश्यप तीर्थ यात्रा का वर्णन संग्रहपुत्र जलोद्भव दैत्य वध प्रसंग मे, (श्लोक २०९ से २२७) आता है। कल्हण ने नीलमत से यह प्रसग लिया है। नील नाग ने जलोद्भव के उत्पात का वर्णन निम्नलिखित रूप से नीलमत पुराण में किया है। सद्यो लब्ध्वा वरान् पापो ब्रह्मणोऽव्यक्तयोनितः । न मां गणयति दुष्टो न चाहं तस्य निग्रहे ॥ समर्थो वरदानेन त्रैलोक्याधिपतेः प्रभोः । —137।१८०, १८१ तेनेदं सकलं शून्यं मद्देशे कृतम् प्रभो। खादता नरमांसानि दुष्टेनाकृतबुद्धिना ॥ —138।१८१, १८२ दार्वाभिसारगांधारजालन्धरशकाः खशाः । संगणामाण्डवाश्चैव अन्तर्गिरिबहिर्गिरिः ॥ —139।१८२, १८३ एते वै मुख्यतस्तेन देशाः शून्याकृताः प्रभो। निग्रहे भगवन् तस्य कुरु बुद्धिं जगद्धिताम् ॥ —140।१८३ : १८४ एवमुक्त्वा सथेत्युक्त्वा स्नात्वा तीर्थेषु कृत्स्नतः। आजगाम सतां देशं विमलं तन्त्सरोत्तमम् ॥ —141।१८४, १८५ तत्र स्नात्वा जगामासौ ब्रह्मलोकं सदानतम्। पद्भ्यां च क्रमणं त्यक्त्वा स्वशक्त्यैव नरोत्तमः ॥ —142।१८६, १८९