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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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४४ राजतरंगिणी

ते हन्यमानाः पांक्तं देशान् संप्रायुवन् भयात् । शून्येषु तेषु देशेषु विससार स निर्भयः ॥ ४।१३२, १३३ भवदन्वितितं सर्वं यथारूपं मया विभो । पालितः संप्रहसुतो दैत्यो नाम्ना जलोद्भवः ॥ १३०।१७५

जलोद्भव असुर का वर्णन वामनपुराण (८०।१८-३३) में दिया गया है। ब्रह्मा के वर- लाभानन्तर गर्वतापहारी असुर जलोद्भव का वध शिव तथा विष्णु के द्वारा हुआ था। यह कथा नीलमत पुराण में वर्णित कथा से मिलती है । शक्र सरोवर पर पौलोमी क साथ क्रीडारत थे । परमदुर्जय संग्रह नामा दैत्येन्द्र वहीं रहता था । शची को देखते ही काममोहित दैत्य का रेतस् सलिलाशय में पतित हो गया । कामोन्मत्त दैत्य ने शची के अपहरण की लालसा की । शक्र तथा संग्रह में तुमुल युद्ध प्रारम्भ हो गया । इन्द्र का युद्ध एक वर्ष तक चलता रहा । सङ्ग्रह युद्ध में हत हो गया ।

उस दुरात्मा के रेतस् से जलोद्भव शिशु उत्पन्न हुआ । जलोद्भव का नागो ने कृपापूर्वक विवर्धन किया । जल से उत्पन्न होने के कारण उसका नाम जलोद्भव पड़ा ।

जलोद्भव देश का वर्णन महाभारत में आया है । हिमालय समीपस्थ इस देश का होना मिलता है । इस देश पर भीमसेन ने विजय प्राप्त की थी । मैं समझता हूँ कि वह देश काश्मीर है । (सभा पर्व : ३० । ४)

पितामह ब्रह्मा की तपस्या तथा आराधना द्वारा जलोद्भवने तीन वर प्राप्त कर लिये थे । जल में अमरत्व, अतुलनीय विक्रम तथा मायाशक्ति की प्राप्ति । उस दैत्येन्द्र ने समीपवर्ती दार्वाभिसार, गाधार, जहूंडर, शक, खस, तगण, माडव, मद्र, अंतर्गिरि और बहिर्गिरि के निवासियों का भक्षण आरम्भ कर दिया । काश्मीर के समीपवर्ती सीमांत देशों को शून करने लगा । उस पापी के कारण देश जनशून्य हो गया । वह निर्भय हो गया (नीलमत पुराण श्लोक 76-81 ११८-१२२)

वाग्भट वाग्मीरी में कहते हैं : 'जलोद्भव के कारण काश्मीर जनशून्य हो गया था। एक समय मरीचि के पुत्र काश्यप ने जिन्हें कुछ लोग ब्रह्मा का पौत्र कहते हैं, काश्मीर की यात्रा की । कुछ काल तक पवित्र सुमेरु पर्वत पर निवास करने के पश्चात् काश्मीर भूमि की दुरावस्था को देखकर उनका ध्यान आकृष्ट हुआ । उन्होंने दुरावस्था का कारण पूछा । लोगों ने कहा 'जलदेव' 'सतीसर' में निवास करता है। वह हम लोगों को नष्ट करता रहा है।

'काश्यप का हृदय करुणापूर्ण हो गया। वह हरीपुर के समीप नौबंधन में निवास करने लगा । वहाँ उन्होंने एक सहस्र वर्ष तक घोर तपस्या की । महादेव प्रकट हुए। जलदेव को मारने की प्रार्थना स्वीकार की । महादेव ने विष्णु और ब्रह्मा को जलदेव को हटाने के लिये भेजा। विष्णु और जलदेव का छह सौ वर्षों तक संघर्ष होता रहा ।

'विष्णु ने देखा कि जलदेव जल तथा पंक में रहकर अपनी रक्षा करता है । उन्होंने बारामूला के समीप एक जलप्रणाली बनवायी । जल निकल गया। दैत्य दृष्टिगोचर होने लगा । वह खड्गकर मार डाला गया । प्रदेश आबाद हो गया । इस लिये काश्मीर को 'कश्यपसर' कहते हैं।'

रत्नाकर पुराण का अनुवादकर्ता लिखता है,- 'पहले वक्तों में चमनजार काश्मीर में देव और राक्षस वास किया करते थे । इनमे से एक देव जलोद्भव नामी था । वह बडा जालिम और सरकश था । बहुत अरसा तक उसकी लडाइयाँ तीन कारणों यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ रहीं । उसके फना होने के बाद मखलूक खुदा ने इस-