राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग ४३ कश्यपेन तदन्तःस्थं घातयित्वा जलोद्भवम् । निर्ममे तत्सरो भूमौ कश्मोरा इति मण्डलम् ॥ २७ ॥ २७ असुर जलोद्भव का वध किया गया। सतीसर के उस भूमि स्थान पर काश्मीर मण्डल की स्थापना हुई। कार कर ली थी दैव नाम नही दे सकते थे। काश्यप जो मानव जाति के आदिपुरुष माने जाते है उन्हें लाकर बारहकूला के समीप पर्वत विदारण का आख्यान रच लिया गया। सतीसर इस प्रकार 'काश्यप सर' हो गया। और कालान्तर में काश्मीर हो गया। 'प्राचीन काल के पुरातत्त्व सम्बन्धी प्रमाणों पर अपने सिद्धान्त की पुष्टि करता लेखक कहता है : 'इन्द्रने दस्युओं को काश्मीर उपत्यका में नष्ट किया। इन्द्र ने उनके ९९ दुर्गों को नष्ट किया। काश्मीर के पूंछ क्षेत्र के सोहन नदी में कहा जाता है कि इन पाषण युगीय लोगों के पाषाण यान्त्रिक उपकरण मिले हैं। उनका समय ६,००,००० वर्ष पूर्व माना जाता है। इस प्रकार आदिकालीन लोग काश्मीर उपत्यका में रहते थे इसका प्रमाण ५वें मण्डल के सूक्त ४५ ऋचा ६ पर आधारित किया है। उसमें 'विशिशिप्र' शब्द को वृत्र माना गया है। वहीं कहा गया है कि गऊ की शाला खोदी गयी है। और उससे जल बाहर निकल गया। यहाँ इन्द्र के स्थान पर माता अथवा प्रकृति के लिए कहा गया है कि प्रकृति के कारण काश्मीर उपत्यका का जल वह गया और भूमि निकल आयी। 'विशिशिप्र' शब्द महत्त्व- पूर्ण है क्योकि दस्युओं के प्रारम्भिक पाषाण युग को उपस्थित करता है। 'यह बात इससे और प्रमाणित होती है कि वृत्र तथा उसके दस्यु साथियों के लिए 'इलीविश' शब्द का प्रयोग मण्डल १ सूक्त ३३ ऋचा १२ में किया गया है। जिसका अर्थ गुहा में रहने वाले लोग होते हैं। इससे प्रकट होता है कि दस्यु लोग पाषाण युगीय गुफा में रहने वाले थे। इन बातों से प्रकट होता है कि ऋग्वेदोय आर्य उनके सम- कालीन थे।' लेखक ने श्री स्टूअर्ट पिगोट के 'प्रिहिस्टारिक इण्डिया' का उल्लेख करते हुए कहा है : 'सोअन सभ्यता सोहन नदी का उपत्यका सिन्धु, पूंछ, झेलम के समीप तथा साल्ट रेंज तक विस्तृत थी। पाठभेद : 'कश्मीर' का 'काश्मीरा' पाठभेद मिलता है। पादटिप्पणियाँ : २७ (१) जलोद्भव : नीलमत पुराण जलोद्भव गाथा का वर्णन करता है। जलोद्भव का अर्थ है, जल से उद्भव अर्थात् जन्म लेनेवाला। काश्मीर में अत्यधिक ठंड पड़ती थी। कुछ लोगों का अनुमान है। जलोद्भव शब्द का अर्थ "तैरता हुआ" हिमखंड है। नीलमत पुराण में निम्नलिखित जलोद्भवोपाख्यान का वर्णन दिया गया है : कृपया सः शिशुनागैरंगले तस्मिन्विवर्धितः । यस्मादयं जले जातस्तस्मादेष जलोद्भवः ॥ —77।११८, ११९ आराध्य तपसा लेभे वरं देवात्पिता महान् । जलेऽमरत्वं मायाञ्च विक्रमं चातुलं तथा ॥ 78।११९, १२० लब्धवायस्तु दैत्येन्द्रो भक्षयामास मानवान् । समीपे सरसस्तस्य नानादेशेव्यवस्थितान् ॥ 79।१२०, १२१ दर्भाभिसार-गान्धार-जुहुण्डर-शकान् रसान् । तंगणान्माण्डवान् मद्रा नन्तर्गिरिबहिर्गिरि ॥ 80।१२१, १२२