राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४ राजतरंगिणी अबु रिहान ने उप्कर को बारहमूला का नगर कहा है जो नदी के दोनों तटों पर बना आबाद था। (फ्रेगमेन्ट्स आफ अरब्स पृष्ठ ११६) बारहमूला पहले वितस्ता नदी के दक्षिण तट पर आबाद था। इस समय दोनों तटों पर आबाद है। उप्कर (हुष्कर) का स्थान वितस्ता के वाम तट पर है। बारहमूला के वर्तमान नगर विकास की सीमा में उप्कर आ गया है। प्राचीन काल से ही बारहमूला नगर तथा हुष्कपुर को जोड़ने के लिए वितस्ता पर पुल बँधा है। इस समय वह पुल और विशाल तथा आधुनिक शैली का बना दिया गया है। वह पुल हिन्दुओं के तीर्थ वाराह क्षेत्र तथा बौद्धों के तीर्थ हुष्कपुर दोनो को मिलाता था। यात्री एक साथ दोनो तीर्थों की यात्रा कर सकते थे। काश्मीर में शिव, विष्णु, तथा बुद्ध तीनों की पूजा एक साथ चलती थी। इससे प्रकट होता है। बारहमूला के दक्षिण तट पर हिन्दुओं को विशेष और उत्तर तट पर बौद्धों की आबादी थी। बारहमूला का इसलिए और महत्त्व बढ़ गया था कि वह बौद्ध तथा हिन्दू दोनों का समान रूप से तीर्थ स्थान था। (जोनराज ३५६-६७) वाराह क्षेत्र माहात्म्य में वाराह क्षेत्र तथा उससे सम्बन्धित अनेक तीर्थस्थानों का उल्लेख मिलता है। कल्हण ने वाराह मन्दिर का कई बार वर्णन किया है। जनश्रुति के अनुसार बारहमूला नगर के पश्चिम, वितस्ता तटपर, कोटि तीर्थ के समीप वाराह का मन्दिर था। कोटि तीर्थ में प्राचीन काल की मूर्तियां तथा शिव लिंग मिला है। यह सब खण्डित मूर्तियां वाराह मन्दिर की रही होंगी। वाराह का मन्दिर काश्मीर के सुलतान सिकन्दर बुत शिकन (सन् १३८६-१४११ ई०) ने तुड़वाया था। उस समय इस मन्दिर के साथ ही साथ काश्मीर में मार्तण्ड, विजयेश, ईशान, चक्रभृत (चक्रधर) त्रिपुरेश्वर, शैष, सुरेश्र्वरी, के प्रसिद्ध मन्दिर भी तोडे गये थे। (जोनराज · श्लोक ६००; दत्त पृष्ठ ६०) श्री जोनराज (सन् १४४६ ई०) वाराह क्षेत्र में बडशाह जैनुल आवदीन द्वारा दान सत्र खोलने का उल्लेख करता है। (दत्त ८८) बादशाह ने वाराह क्षेत्र में इतने चावल का दान किया था कि उसके भार से अनन्त नाग का मस्तक झुक गया था। इन्द्र का मस्तक भी इस दान को देखकर लज्जा से नत हो गया था। (दत्त १३९) श्री शुक अन्तिम और चौथी राजतरंगिणी में एक अद्भुत घटना का वर्णन करता है— 'आश्विन मास लौकिक संवत् ४६३० (सन् १५५२ ई०) सुलतान इस्माइल शाह के समय में भयंकर भूकम्प आया था। लोग इतने भयभीत हो गये थे कि पुत्र, स्त्री, सज्जनों, दयालुओं तथा किसी के लिए सहानुभूति नही रह गयी थी। तथापि वाराह क्षेत्र के नागरिकों में किसी प्रकार की चिन्ता व्याप्त नहीं थी। वहाँ पर लोगों ने भूकम्प का अनुभव किया ही नहीं।' (दत्त : १८१) राज- तरंगिणी में अन्तिम बार बारहमूला का उल्लेख सम्राट् अकबर की सेना के अभियान के समय आता है। काश्मीर के सुलतान यूसुफ शाह ने मन्दिर में शरण ली थी। वितस्ता : गंगा नदी का वर्णन वेदों के केवल दो बार आया है। वितस्ता का नाम ऋग्वेद में एक बार आया है। ऋग्वेद के नदी सूक्त के प्रसंग (१०,७५,५) तथा निरुक्त (९,२६, ) में वितस्ता का उल्लेख किया गया है। वितस्ता नदी का ज्ञान वैदिक पुरुषों को था। गंगा की पूर्व दिशावर्ती नदियों का नाम वेद मे नही मिलता है। उनका ज्ञान वैदिक रचनाकारों को नहीं था। उनके वितस्ता ज्ञान तथा वर्णन से प्रकट होता है। वितस्ता का महत्त्व वैदिक युग में था। भागवत पुराण (५.१९:१८) में वितस्ता का उल्लेख मिलता है। पाणिनि की काशिका वृत्ति