भारतकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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प्रथम तरंग ५५ ( १:४.३१ ) में वितस्ता का वर्णन किया गया है। अलकसुन्दर अर्थात् सिकन्दर के इतिहासकारों ने इसका नाम हदसपेश और प्तोलेमों ने इसका विदस- पेस नाम दिया है। काश्मीर में इसको विरंग, अदपल, मंदरन तथा झेलम कहते है। पाली साहित्य में वितस्ता को वितमसा की संज्ञा दी गयी है। उसकी गणना उत्तरापथ की नदियों में की गयी है। (धम्मपदट्ठकथा भाग २, पृष्ठ ११६, मिलिंद प्रश्न हि०, पृष्ठ १४४, अवदान, पृष्ठ २७७, तथा २९१ ) महाभारत कर्ण पर्व (अ० ४४) में वितस्ता का उल्लेख मिलता है। चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुरुच्चा बहिर्गिरेः । आरट्टा नाम ते देशा नष्टधर्मा न तान्त्रजेत् ॥ सभा पर्व ( ९:१९ ) में उल्लेख है कि वितस्ता वरुण की सभा में उपस्थित रहती हैं। उनकी उपा- सना करती हैं। वन पर्व ( ८२: ८६-६१ ) के अनुसार वितस्ता में स्नान करने से वाजपेय यज्ञ की फलप्राप्ति होती है। कश्मीर में नागराज तक्षक का प्रसिद्ध भवन हैं। उद्योग पर्व में वर्णन मिलता है। इसकी धारा में ब्राह्मणों के ४०० श्यामकण्ठ अश्व वह गये थे। भीष्म पर्व ( ९:१६ ) में उल्लेख मिलता है कि इसका जल भारतीय पान करते हैं। अर्थात् वह भारत में बहती है। अनुशासन पर्व ( २५: ७८ ) तथा ( १४६: १८ ) के अनुसार सात दिन इसमें स्नान करनेवाला मुनितुल्य निर्मल हो जाता है। पार्वती ने वितस्ता के संदर्भ में शंकर से स्त्री धर्म की चर्चा की थी। इसी पर्व में ( ८: ६) एक वितस्त्य ऋषि का वर्णन है। वह सार्वनस ऋषि के पुत्र थे। सोमदेव भट्ट ने कथासरित्सागर में वितस्ता को जाह्नवी के समकक्ष माना है :—"धत्ते नाम वितस्तेति वहन्ति यत्र जाह्नवी" ७:५:३७ बनिहाल गिरिथय से कश्मीर उपत्यका का सुन्दर मनोहारी, अभिराम दृश्य मिलता है। वहाँ से धुंधला बेरी नाग का अंचल दृष्टिगत होता है। बनिहाल से काश्मीर उपत्यका में उतरते ही एक पक्का अलकतरा का सुन्दर राजपथ श्रीनगर के मुख्य मार्ग को छोड़ता है। पूर्व दिशा में वेरीनाग की तरफ बढ़ना है। तिमुहानी से उतरने पर वीर नाग ग्राम पड़ता है। गांव का नाम यहाँ के निर्झर वार या बेरी के नाम पर पड़ा। 'वीर नाग' शब्द 'विरह नाग' का अपभ्रंश है। नाग का अर्थ जलस्रोत, निर्झर, झरना, चश्मा तथा सोता है। विरह का अर्थ वियोग, बिछुडना अथवा छोड़कर चले जाना हैं। विरह नाग शब्द का अपभ्रंश वीरनाग या वेरी- नाग हो गया है। वितस्ता देवी इस स्थान में जन्म लेना चाहती थीं। वहाँ शंकर विराजमान थे। उन्हें वहाँ देखकर देवी ने संतास्विनी का रूप वितस्तारा (विठवत्तुर ) ग्राम मे लिया। यह ग्राम वेरीनाग से एक मील उत्तर-पश्चिम स्थित है। इस स्थान को वितस्ता वार्तिक नाम की भी संज्ञा दी गई है। कल्हण के समय यह स्थान वितस्तारा नाम से प्रसिद्ध था। यहाँ पर अशोक ने स्तूपों का निर्माण कराया था। वर्तमान कुंड अठपहला है। प्रत्येक पहल का विस्तार ४७ फुट है। मैं यहाँ चौथी बार १९६४ में आया था। प्रथम यात्रा मैने सन् १९५६ ई० मे की थी। आज तथा उस समय के वातावरण तथा स्थिति में बहुत अन्तर हो गया है। सन् १९५७ ई० में तोरणद्वार, सन् १९६० ई० में डाक बंगला तथा अब एक प्रकार से समस्त स्थान का जीर्णोद्धार कर दिया गया है। भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा जीर्णोद्धार का कार्य उसके मूल रूप को अक्षुण्ण रखते हुए, किया गया है। संवत् १६९९ विक्रमी में कुंड के ऊपर बाम पार्श्व में खननकार्य किया गया था। यह स्थान वर्तमान प्रवेश द्वार के दक्षिण पार्श्व में ऊँचाई पर है। यहाँ प्राचीन मूर्तियाँ एक के ऊपर एक रखी और गड़ी हुई मिली थी। मूर्तियाँ पत्थर की हैं। विष्णु भगवान्