राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५६ राजतरंगिणी
[बायाँ स्तम्भ]
भ्रादि की हैं। इस समय श्रीनगर के राज्य संग्रहालय में रखी हैं। मैं इन्हें कितनी ही बार ध्यानपूर्वक देख चुका हूँ। उन्हें देखकर न जाने क्यो मुझे रुलाई आने लगी। उनसे जैसे अपना निकटतम संबंध मालूम होता था। सोचता था। उनका क्या अपराध था ! ये खंडित कर गाड़ दी गई। केवल इसलिए कि उनकी कभी हिंदू पूजा करते थे। ये मूर्तिपूजक हिंदू अब मुसलमान हो गये हैं। मूर्तियों के शत्रु बन गये हैं। जिनको कभी पूजा करते थे। उन्हें खंडित करने लगे। धर्म की यह विचित्र विडंबना देखकर, वे किस प्रकार कभी राजकीय सम्मान पाती रही होंगी, स्मरणकर, मन अनायास भर आया। यद्यपि मूर्ति पूजा का मै कायल नही हूँ तथापि मनुष्यों की गति पर, उनकी दुर्बलता पर, मुझे ग्लानि अवश्य उत्पन्न हुई। आठपहले कुंड के आठपहल अर्थात् जलतट के पश्चात् समतल चबूतरा काफी चौड़ा है। उसके पश्चात् सन् १६२० ई० में जहाँगीर द्वारा छोटे- छोटे कोठरीनुमा बरामदे निर्माण कराये गये थे। चबूतरे से बरामदे की ऊँचाई काफी है। मध्यवर्ती महराबो पर हिंदू शैलो की पाषाण की नक्काशीदार धुडियां लगी हैं। सन् १६२७ ई० में शाहजहाँ ने यहाँ बाग लगवाया था। नहर दिका निर्माण कराया था। इस बाग में चिनार के हरे-भरे काफी ऊँचे वृक्ष लगे हैं। अनेक तरुवर अपनी अपनी हरियाली तथा छाया से स्थान की अभिरामता बढ़ाते हैं। कुंड से बाहर बाग में नहर सीधी निकलती है। नहर के दक्षिण पार्श्व में कुछ पुराना शिवालय है। कुंड स्थल में प्रवेश करते ही वाम पार्श्व में एक मिहराबदार कोठरी में देवो तथा देवताओ की मूर्तियां रखी गयी हैं। यहाँ एक पुजारी रहता है। देवी को देवी वितस्ता कहा जाता है। मन्दिर के दक्षिण पार्श्व में कुछ दूर आगे चलने पर भूमि से पानी वेगपूर्वक निकलता दिखाई पड़ता है। यह जलस्रोत मुख्य नहरवाले जलस्रोत में जाकर मिल जाता है।
[दायाँ स्तम्भ]
नीलनाग अर्थात् वैरीनाग कुंड का जल स्थिर है। उसमे जल निकलने का उस समय तक अनुभव नही होता है, जब तक कि कुंड के बाहर नहर में वेग से जल गिरता न देख लिया जाय। कुंड के जल की स्थिरता का मुख्य कारण कुंड की गहराई है। कुंड की गहराई के तीन खंड हैं। कुंड चौवन फुट गहरा है। कुंड की पहली सीढ़ी का चबूतराकुमा घेरा १८ फुट गहराई के बाद मिलता है। पुनः दूसरी गहराई पहले खंड के पश्चात् अट्ठारह फुट बाद मिलती है। वहाँ भी चारो ओर चबूतरा बना हैं। अट्ठारह फुट गहरा और जाने के पश्चात् कुंड का तीसरा खंड अर्थात् धरातल मिलता है। यही से पानी कई स्रोतो द्वारा भूमि से निकलता है। कुंड में ५४ फुट ऊँचाई का जल भार होने के कारण जलस्रोत का उफान तथा वेग दिखाई नही पड़ता। जल की गहराई के कारण जल का रंग गहरा नीला दिखाई देता है। जल जहाँ जितना गहरा होगा वहाँ उसमें उतना ही नीलापन अधिक होगा। कुंड की गहराई का कारण क्या है। विचारणीय है। मैने अभी तक कही भी इतने गहरे कुण्ड से जल निकलते नही देखा है। सभी निर्झर तथा स्रोत भूमि की सतह से निकलते दिखाई देते हैं। जहाँ जल कम निकलता है, वहाँ जल एकत्र करने के लिये तथा उपयोग निमित्त कुंड बनाकर संग्रह कर लिया जाता है। चश्मा शाही तथा अन्य पर्वतीय स्थानों के निर्झरों, स्रोतों के समीप इस प्रकार के कुंड की रचना नही की जा सकी है। काश्मीर मे एक दूसरा स्थान है। जहाँ इसी प्रकार के कुंड बने मैने देखे हैं। उसका यथा स्थान वर्णन करूँगा। पूर्व काल में किसी हिन्दू राजा ने इस कुंड का निर्माण कराया था। जहाँगीर के समय भग्ना- वस्था में था। उसका धार्मिक महत्त्व लोगों के मुसलमान हो जाने के कारण सुप्त हो गया था।