राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरने में लोग होड़ लगाए थे । जब तक में वहाँ था, एक भी बीमार आदमी अच्छा होते नहीं देखा । 'वह पत्थर जो मुझे मुसलमान धर्म में दीक्षित करने के लिए वहाँ पड़ा था, उसे ११ मुल्ला घेर कर खड़े थे । वे इस प्रकार उसे घेर कर खड़े थे कि मैं कठिनता से अन्दर देख सकता था। मैंने इस धोखे की बात को किसी प्रकार देख लिया । मुल्ला लोग एक उँगली की जगह अपना अंगूठा तथा उँगलियाँ पत्थर से लगाए थे । वे उसे उठाये । वहाँ खड़े लोग चिल्लाने लगे—करामात-करामात । मैंने उन्हें एक रुपया देकर कहा । क्या ग्यारह उठाने वालों में वे मुझे भी एक शामिल कर लेंगे। उन्होंने अनिच्छा प्रकट की । परन्तु मैंने श्रद्धा भक्ति दिखाते हुए एक रुपया और दिया तो एक मुल्ला हट गया । मैंने उसमें अपनी केवल एक उँगली लगाई थी । अतएव पत्थर उठाते समय मेरी तरफ झुका जाता था । मुल्ला मेरी ओर बुरी निगाह से देखने लगे । अंत में मैंने इसमें बुद्धिमानी समझी कि उँगली तथा अँगूठा दोनों लगाया जाय । पत्थर मुश्किल से उठा । मैं भी करामात करामात कहने लगा । मैं एक रुपया और फेंककर चुपचाप वहाँ से चल दिया । मैंने कुछ जल- पान नहीं किया था। दरवेश को नर्मदा के लिए नमस्कार किया। मैंने बारहमूला का वह स्थान देखा । जहाँ तंग रास्ते से पानी बहता चला जा रहा था (पृष्ठ ५५-२१२-४१६) ।" बर्नियर ने यहाँ किसी मन्दिर आदि का वर्णन नहीं किया है । संभव है। वैरी नाग की तरह औरंगजेब के समय मन्दिर नष्ट कर दिए गये हों । संदर्भ : वाराह वैदिक देवता तथा पौराणिक अवतार है । उनका उल्लेख ऋ० १:६१:७, १:८८:५; १:२१:११; १:१४४:५; १०:८६.४' ८:७७:१०, ९:९७:७; ११०:२८:४; १०:८६:४; १०:९९:६; काठक संहिता ८:२'२५:२; मैत्रायणी संहिता ३:१४:१९, तैत्तिरीय संहिता ६:२.४:१; ७.२:५:१, तैत्तिरीय आरण्यक १:९:४; शतपथ ब्राह्मण ५.४:३:; तैत्तिरीय ब्राह्मण १:१:३; १:१:१६; १:७.९:४, में मिलता है । पुराण : मत्स्य : ४७:४७ भागवत : १:३:२७; ३:१३, लिग १.९४, वायु २:३५, हरिवंश १:४१, पद्म. उ०: ६९,२३७, वराह १३७:१४० मत्स्य १७३, तथा महाभारत : सभापर्व : २८.२९, वनपर्व ८३: ८-१९ में उल्लेख मिलता है । बारहमूला—वारिमूल : वारिमूल शब्द का अपभ्रंश बारहमूला हो सकता है । वारिमूल चाक्षुष मन्वंतर काल के एक देवता है। वारि किंवा वारि शब्द का अर्थ जल होता है । मूल शब्द का अर्थ उदगम् स्थान अर्थात् जड़ होता है । जहाँ से कोई चीज उत्पन्न होती है । काश्मीर जिस समय सतीसर के रूप में जलमय रहा होगा, उस समय इसी स्थान से जल स्रोत के रूप में जल निकाला गया होगा । उसका उद्गम अर्थात् मूल यही स्थान था । देवता तथा अलंकार दोनों दृष्टियों से इसका नाम आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व 'वारिमूल' दिया गया होगा । कालांतर में वारि शब्द वार हो गया। उसमें मूल शब्द जोड़ देने में उसका पूर्ण नाम वारमूल हो गया । वराह अवतार का नाम कालांतर में वहीं वारिमूल के साथ जोड़ दिया गया। वारिमूल वारह- मूला हो गया होगा । इसी को उलटने पर मूलवाराह नाम पकड़ लिया होगा । यह मेरा अनुमान मात्र है । इस पर और अनुसन्धान की आवश्यकता है। बारहमूला शब्द का सर्व प्रथम प्रयोग शुक ने चौथी राजतरंगिणी में किया है। उस समय काश्मीर का बादशाह फतह शाह (सन् १४८६-१५१४ई०) था । बारहमूला में मार्गश इबराहीम अपने साथी महमूद शाह के साथ सेना लेकर आया था । ( दत्त ३४५ ) बारहमूला शब्द का दूसरी बार उल्लेख भी शुक ने चक्रेश के बारहमूला से श्रीनगर जाने के प्रसंग में किया है। (दत्त ३६२) इसके पूर्व सब स्थानों पर वाराह क्षेत्र शब्द का प्रयोग किया गया है।